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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५१६ )

( ५६ ) प्र०—परमेश्वर कहाँ रहता और वह किस तरह मिलता है ?

उ०—परमेश्वर इसी कायामें रहता है। जब तक जीव उसे बाहर खोजता फिरता है, वह नहीं मिलता ; लेकिन जब वह उसे इस कायामें ही खोजता है तब वह मिल जाता है और प्रसन्न होकर पिताकी तरह पुत्रको मोक्ष-रूपी महान फल देता है। असलमें ईश्वर इसी कायामें रहता है ; पर सूक्ष्म लोग उसे काशी, द्वारका, रामेश्वर आदिमें खोजते फिरते हैं। ऐसे अज्ञानी भटकते-भटकते मर जाते हैं। पर ईश्वर नहीं मिलता। वे लोग—“छोरा बगलमें दिंदोरा शहरमें” वाली कहावत खरिताथे करते हैं।

( ५७ ) प्र०—किनका अधिकार मोक्षमें है और किनका कर्ममें ?

उ०—जो पुरुष कर्म करते हुए भी अपने तई कर्मोंका करने वाला और उनके फल भोगने वाला नहीं मानते, अपने तई असंग और सच्चिदानन्द स्वरूप समझते हैं, वे ही ज्ञान और मोक्षके अधिकारी हैं ; किन्तु जो समझते हैं कि, हम इस कामको करते हैं और हम ही इसका फल भोगेंगे, उनका कर्ममें अधिकार है, उनकी मोक्ष हो नहीं सकती ; ईसीलिहे भगवान्ने कहा है—कर्म करो, पर निष्काम होकर करो ; यानी फल-प्राप्तिकी इच्छासे कर्म मत करो। यदि कोई पुरुष इस विचारसे ईश्वर भजन करेगा कि, मुझे इसके फल-स्वरूप