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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५१८ )

दिन उनके ही सुख-चैनकी फिक रखते हैं, वह कभी सत्सङ्ग नहीं करते ; इसलिये वह स्त्री-पुत्रोंको फिक करते-करते ही मर जाते हैं और फिर जन्म लेते और मरते हैं। उनकी मोक्ष नहीं होती।

जो पुरुष वेद-शास्त्रोंमें लिखे हुए कर्म करते रहते हैं, वह कभी आत्माका झयाल भी नहीं करते ; वह कर्म करते-करते ही मर जाते हैं। उनकी भी मोक्ष नहीं होती।

जो पुरुष वेद-शास्त्रोंकी परवा न करके, आत्मविचार छोड़ कर और किसी ओर ध्यान ही नहीं देते, उनको परमानन्द या मोक्ष की प्राप्ति होती है।

( ५३ ) प्र०—सब वेद-शास्त्रोंका सार क्या है?

उ०—ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है, जीव ब्रह्मरूप है और दूसरा कोई नहीं—यही सब शास्त्रोंका सारतत्व है।

( ५४ ) प्र०—प्राणी-बन्धनसे कब छूटता है?

उ०—जब मनुष्य इस बातको समझ लेता है कि, आत्मा असङ्ग, अकर्ता, अभोक्ता और चैतन्य स्वरूप है ; तभी वह बन्धनसे छूट जाता है ; अर्थात् अपने असली स्वरूपका ज्ञान हो जाना ही मुक्तिका हेतु है।

( ५५ )—जीव और ईश्वरका मेल कब होता है।

उ०—जब अविद्या और माया त्याग दी जाती हैं ; तब ईश्वर और जीवका मेल हो जाता है। इन दोनोंके मेलमें “अविद्या और माया” वाचक हैं।