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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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वह गुण-दोषवाला नहीं होता। एक ही आकाश मन्दिरमें भी है, पाखाने में भी है, भंगी-चमार के घरों में भी है; उत्तमोत्तम मूर्तियों में भी है, मल मूत्रकी बाहिट्यों में भी है, परन्तु अति सूक्ष्म होनेके कारण, उसका उपाधियोंसे कोई सम्बन्ध नहीं; वही बुढ़ी-भली उपाधियोंके कारण बुरा भला भी नहीं होता। यही बात आत्माके सम्बन्धमें हैं। आत्मा तो आकाश से भी सूक्ष्म है, ; अतः वह असंग और निलंघ है।

(५२) प्र०—संसार में कितने प्रकारके मनुष्य हैं और उनमें से कौनसे परमात्माके दर्शन करते हैं?

उ०—संसार में तीन तरहके मनुष्य हैं :—(१) कृपण और आलसी, (२) विषय-भोगी, (३) उदार और उद्योगी। इनमें से पहले प्रकार के कङ्कूस और आलसी तो कभी परमात्मा तक पहुँच ही नहीं सकते; क्योंकि वह हाथोंसे दान नहीं करते और पैरोंसे महात्माओं तक नहीं पहुँचते। दूसरे प्रकारके—विषय-भोगी अन्धे हैं। उन्हें न परमार्थ दीखता है और न परमेश्वर; इसलिये वह परमेश्वर का भजन-पूजन नहीं कर सकते। तीसरे प्रकार के लोग उद्योगी और दाता हैं। वे हाथोंसे दान करते और पैरोंसे चल कर महात्माओंकी सेवामें पहुँच जाते हैं; अतः सत्सङ्गके कारण उन्हें ज्ञान हो जाता है। उनका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है; इसलिये वह परमेश्वरके दर्शन पाते हैं।

• जो पुरुष रात-दिन स्त्री-पुत्रोंकी सेवामें लगे रहते हैं, रात