वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५१६ )
किसीका जूठा खाँप, पर खी-गमन करें, तो उन्हें पाप ज़रूर लगेगा ; क्योंकि उन्हें सब तरहका ज्ञान होता है और लोग भी उनसे घृणा करते हैं। आचार्य-कोटिमें बही ज्ञानी है, जो उन कामोंको नहीं करता, जिनके शास्त्रोंमें मनाही है और उन कामोंको करता है, जिनके शास्त्रोंमें आज्ञा है। किन्तु जिन कामोंको करता है, उनको निष्काम होकर अनासक्ततासे श्रेष्ठ आचारके लिये करता है अथवा निषिद्ध और विहित दोनों कर्म नहीं करता ; यानी जिनकी शास्त्रोंमें आज्ञा है और जिनकी मनाही है, दोनों ही प्रकारके काम नहीं करता ; केवल आत्म-चिन्तन ही करता है, वह आचार्य-कोटिमें है।
( ५० ) प्र०—मुक्त कित्से कहते हैं ?
उ०—जिस पुरुषका मोक्षमें अभिमान है, देहादिकोंमें ममता है, वह न योगी है और न ज्ञानी ; पर जो किसी की निन्दा करता है और न स्तुति ; न किसीको देता है और न किसी से लेता है ; जो सर्वत्र राग-रहित है, यानी जिसे किसी भी पदार्थ—छी-पुत्र धन-जायदाद प्रभृति से राग नहीं—किसी में भी ममता नहीं—वही मुक्त है। जिसका मन अपने तर्ह चाहने वाली छीको सामने देखकर अथवा मौतको सामने देख कर भी व्याकुल नहीं होता, वही मुक्त है।
( ५१ ) प्र०—क्या आत्मा ऊँच और नीच नहीं होता ?
उ०—आत्मामें भविष्यत्ता और नोचता नहीं। एक ही आत्मा ऊँच-नीच सब शरीरों में है। शरीरोंके गुण-दोषोंसे