वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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वे भङ्गी चमार और ब्राह्मण सबका भूटा नहीं खाते, क्योंकि उन्हें वर्णाश्रम-धर्मका ज्ञान है। सब तरहके व्यवहार और वर्णाश्रम-धर्मको समझनेवाला यदि सबके साथ खावे पीवेगा, तो उसे दोष लगेगा। जो पागलोंकी तरह होता है, जिसे क्या करना चाहिये और क्या न करना चाहिये; क्या विधि है और क्या निषेध है; इन बातोंका ज्ञान नहीं होता, उसे दोष नहीं लगता। सब किसीसे समान वस्त्रांव करने या हर किसीके साथ खाने-पीनेसे कोई ज्ञानी नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता, तो भंगी चमार, जो सबका भूटा खाते हैं, ज्ञानी कहलाते। ज्ञानी वही है, जिसमें राग-द्वेष आदि नहीं हैं तथा जो आत्मानन्दसे आनन्दित है; पर जिसमें राग-द्वेष हैं, जो विषय-भोगोंमें आनन्द मानता है, वह ज्ञानी नहीं—अज्ञानी है।
पाप-पुण्य उसे लगते हैं, जिसे ज्ञान होता है। बालकको धर्म-अधर्म और पुण्यपापका ज्ञान नहीं होता, इसीसे उसे पाप-पुण्य नहीं लगते। बालकको आचारका ज्ञान नहीं होता। वह ऊपर मुँहसे रोटी खाता जाता है और नीचेसे मलमूर्त्र त्याग करता जाता है। लोगोंको उसकी इस क्रिया पर ग्लानि नहीं होती। इसी तरह जीवन्मुक्तको पाप-पुण्य नहीं लगते, वह चाहे जो करे, क्योंकि उसे ज्ञान ही नहीं। उसके भले-बुरे कामोंको देखकर कोई उसे भला-बुरा भी नहीं कहता। किन्तु आचार्य कोटिके ज्ञानी यदि मांस-मदिरा खेवन करें, हर