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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५१४ )

है, तो फिर ज्ञानी सबके साथ खान-पानादि क्यों नहीं करता ?

३०—ज्ञानी दो तरहके होते हैं।

( ४६ ) (क) जीवन्मुक्त, जिन्हें अपनी देहकी भी सुख नहीं होती। वे राजा जनककी तरह विदेह और अजगर वृत्तिवाले होते हैं। वे न किसीसे भिक्षा माँगते और न कहीं जाते हैं। अगर कोई उन्हें खिला देता है, तो खा लेते हैं ; कोई जल पिखा देता है, तो जल पी लेते हैं। कोई धूपमें बिठा देता है, तो वहीं बैठे रहते हैं और कोई वर्षामें पटक देता है, तो वहीं पड़े रहते हैं। उन्हें धूप, छाया और वर्षा सब समान हैं। वह आत्मानन्दमें डूबे रहते हैं। उनको जगत् नहीं दीखता। उन्हें सर्वत्र आत्मा ही आत्मा दीखता है। उनकी नजरमें न कोई ब्राह्मण हैं और न भंगी बमार ; उनको तो आत्मा ही आत्मा दीखता है ; अतः उनके मुँहमें ब्राह्मण अन्न डाल दे तो वैसा ही, भंगी अन्न डाल दे तो वैसा ही ; उनको दोष नहीं लगता। दोष उन्हें लगता है, जिन्हें वर्णाश्रम-धर्मका ज्ञान होता है। वह तो सब तरह निर्दोष हैं। वेदादिक शास्त्रोंकी आज्ञा भी उन पर नहीं चलती, क्योंकि वह तो ब्रह्मरूप हैं और महान सुख में डूबे रहे हैं। ऐसे महापुरुष जीवन्मुक्त हैं।

( ख ) दूसरे प्रकारके ज्ञानियोंकी गिन्ती आचार्य-कोटिमें है। वे भी सब प्राणियोंमें एक ही आत्मा देखते हैं, इसीसे वे किसीसे राग-द्वेष नहीं रखते ; परन्तु वे समवर्त्ती नहीं होते।

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