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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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समझना चाहिए, और कुशलसे बचना चाहिए। क्योंकि उस से चित्त अशुद्ध हो जाता है।

( ४७ ) प्र०—क्या चित्तकी शुद्धिका और भी कोई उपाय है ?

उ०—हाँ, परोपकार या दूसरों पर दया करने से भी चित्त शुद्ध हो जाता है। दयालुचित्त मनुष्य ही दूसरोंका भला करते हैं। असलमें चित्त-शुद्धिका “दया” मुख्य साधन है। जो मनुष्य-शरीर पाकर उपकार नहीं करता, वह पशुओंसे भी गया-बीता है। ईश्वरने मनुष्य-शरीर परोपकारके लिये ही दिया है। शास्त्रोंमें लिखा है—“धन और प्राणोंसे परोपकार करना चाहिये ; क्योंकि परोपकारके बराबर सौ यज्ञोंका भी पुण्य नहीं है। जो परोपकारहीन है, उसका जीना वृथा है। जानवरोंका चमड़ा भी पराये काम आता है। अपने लिये कौन नहीं जीता ? जो पराये लिये जीता है, वही जीता है। वृक्ष अपने लिये फल नहीं देते, नदियाँ अपने लिये नहीं बहतीं, शेषजीने पृथ्वी परोपकारके लिये ही अपने खिर पर धर रखी है। भगवान् कृष्ण पराये कामके लिये ही सारथी बने थे। सन्त लोग परोपकारके लिये ही शरीर धारण करते हैं ; अतः मनुष्यका सबसे बड़ा कर्तव्य परोपकार या दया करना है। इससे चित्त शुद्ध हो जाता है और शुद्ध चित्तमें परमात्माके दर्शन हो जाते हैं।

• ( ४८ ) प्रश्न—ज्ञानवानकी नज़रमें सबमें एक ही आत्मा

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