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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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होता है। उस शुद्ध दृश्यसे जो खाने पीनेके पदार्थ खरीदे जाते हैं, वही शुद्ध कहे जाते हैं। वैसे शुद्ध पदार्थोंके खानेसे मन शुद्ध हो जाता है ; क्योंकि अन्नके द्वारा सत्य-धर्मका असर चित्त पर भी होता है। शुद्ध चित्तमें ही वैराग्य और विवेक आदि पैदा होते हैं। असलमें सत्य बोलना सर्वोपरि है। सत्यसे योही चित्त शुद्ध हो जाता है और इससे अन्न भी शुद्ध होता है ; इसलिये हमेशा सत्यके आश्रय रहो ; सत्यको न त्यागो। सत्यके समान जगत्में कोई दूसरा धर्म या भक्ति-उपासना नहीं है।

( ४६ ) प्र०—चोर और दुष्टोंको भी साधु बनाने वाला क्या है ?

उ०—“सत्सङ्ग ।” सत्सङ्गकी महिमा शेष शारदा भी नहीं गा सकती। कमल पर स्थित जलकी बूँद भी मोती-जैसी लगती है। लोहा काठके सङ्गमें रहनेसे जलमें नहीं डूबता। नदी-नालोंका जल भी गङ्गाजलके सङ्ग मिल कर गङ्गाजल हो जाता है। नागरपानके सङ्ग ढाकका पत्ता भी राजा तक पहुँच जाता है। चींटी फूलमें बैठकर महादेवजीके सिर पर चढ़ जाती है। चन्दनके साथ नीम भी चन्दन हो जाता है। पारस-एश्वरको छू जानेसे लोहा कुन्दन हो जाता है। बाँस मिश्रीके साथ मिलकर उसीके साथ तुलता है। सत्सङ्गसे ही घोर बनमें जाकर डाकूपना करनेवाले भोल बाबूजीकीजिगी महषि हो गये ; अतः सत्सङ्गको चित्तकी शुद्धिका मुख्य उपाय