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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५११ )

ब्रह्मज्ञान नहीं उद्भवता । जो मनुष्य ब्रह्मज्ञान-शून्य होता है ; वह कीड़े मकोड़ोंकी योनि पाता है । इन शरीरोंको पाकर फिर वह नरकसे नहीं निकल सकता ; इसलिये स्त्रियोंका सङ्ग नहीं करना चाहिये ।

( ४३ ) प्र०—सच्चा ज्ञानी कैसा होता है ?

उ०—जिसका किसी पदार्थमें राग न हो, यहाँ तक कि स्त्री पुत्र प्रभृतिमें भी राग न हो । अगर संन्यासी हो तो मठ, खेलों और धन प्रभृतिमें राग न हो, शत्रु-मित्र आदि सब जीवोंको एक नज़रसे देखे-किसीको अपना और किसीको पराया न समझे ; किसीको भी जिससे भय न हो और किसीसे भी जिसे भय न हो ; जो आत्माको असर और अविनाशी तथा शरीरसे अलग समझता हो ; जो सब प्राणियोंमें एक आत्मा-को देखता हो ; जो ईश्वर और जीवमें भेद न समझता हो ; जो नष्ट हुए, मरे और बीतों बातका शोक न करता हो, यानी सर्वस्व नाश हो जाने और पुत्र तथा स्त्री तकके मर जाने पर भी, नाम मात्रको भी रक्ष न करता हो, वही सच्चा ज्ञानी है । किन्तु जो ज्ञानीकी सी वार्ते तो वधारता ही पर वैराग्यसे शून्य हो, वह बन्ध्यज्ञानी है ।

( ४४ ) प्र०—चित्तकी शुद्धिका साधन क्या है ।

उ०—शुद्ध अन्न ।

( ४५ ) प्र०—शुद्ध अन्न कैसा होता है ?

• उ०—जो सत्य धर्मसे कंमाया जाता है, वही शुद्ध द्रव्य