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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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जाता है; तब उस निर्मल और खाली मनमें परमेश्वर बैठ सकता है। अतः परमेश्वरके दर्शन चाहनेवालेको पहले वैराग्य द्वारा अपना मन शुद्ध करना चाहिए।

( ४० ) प्रश्न—संसारमें सर्पसे भी भयङ्कर कौन है?

४०—स्त्री सर्प भी से भयंकर है। सर्पके विषसे मनुष्य एक बार ही मरता है; पर स्त्रीके विषसे बार-बार मरता है; यानी वासना बनी रहनेसे, वह बार-बार जन्म लेता और मरता है।

( ४१ ) प्रश्न—स्त्री-रूपी सर्पके विषसे बचनेका क्या उपाय है?

४०—स्त्रीकी याद न करना और उसे कभी न देखना। उसकी छायासे भी दूर रहना।

( ४२ ) प्र०—स्त्री-सङ्गसे क्या हानि है?

४०—जिसमें जिसकी वासना रहती है, वह स्वप्नमें भी दीखता है; इसी तरह मरण-कालमें जब पुख्णकी वासना स्त्रीमें रहती है; तब उसको प्रात करनेके लिये वह फिर शरीर धारण करता है। मरते समय विशेष कर स्त्रीमें मन रहता ही है। इससे ज्ञानी लोग पहले ही स्त्रीसे अलग हो जाते हैं; जिससे मरण-कालमें उसमें वासना न रहे। इसके सिवा कामी पुख्ण और स्त्रियोंके सङ्गसे पुख्ण कामी हो जाता है और दूसरा जन्म लेनेपर क्रोधी और मोही होता है। काम क्रोध और मोह प्रभृतिसे मन अशुद्ध हो जाता है। अशुद्ध मनमें

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