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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५०६ )

मुक्ति हो जाती है। यद्यपि कमल जलमें रहता है, पर पानी उस पर नहीं ठहरता; इसी तरह जो गृहस्थीमें रहता है, गृहस्थीके सब काम विषय-भोगादि करता है; पर उनमें ममता या आसक्ति नहीं रखता, वह जीवन्मुक्त है। राजा जनक, गृहस्थीमें रहकर क्या नहीं करते थे? पर उनकी आसक्ति या ममता किसी भी पदार्थमें नहीं थी।

( ३८ ) प्र०—संसारमें कौन है और पुरुष कौन है?

उ०—जो पुरुष अपने हृदयमें रहनेवाले पुरुषरूप स्वप्रकाश आनन्द-रूप आत्माको नहीं जानता, वह कौ है; क्योंकि जैसे स्त्रीका पति उससे अलग होता है; उसी तरह उस आत्माको न जाननेवालेने भी अपनेसे अलग पति मान रक्खा है। मतलब यह, जिसमें वैराग्य और आत्म-विचार नहीं, वह स्त्री है।

( ३९ ) प्रश्न—ईश्वरके भजन-स्मरणमें वैराग्यकी क्या ज़रूरत है।

उ०—बिना वैराग्यके पुरुषका मन ईश्वर-भजनमें नहीं लगता, इसलिये वैराग्यकी ज़रूरत है। मन एक है। जब तक वह विषय-भोगोंमें लगा रहता है, तब तक वह ईश्वरमें नहीं लग सकता; लेकिन जब वह विषय-भोगोंसे हट जाता है, तब वह ईश्वरमें लग जाता है। जब मनमें विषय-भोगोंकी भाव-बनी रहती है, जब यह विषय-भोगोंकी लाटलासे भरा रहता है, तब उसमें ईश्वरके लिये जगह नहीं रहता; लेकिन जब वह विषय-भोगोंसे खाली हो जाता है; यही शुद्ध और साफ हो

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