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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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रहा ; लेकिन ज्योंही उन्हें मालूम हुआ कि, वह पर-पुरुषरता है ; यह कुलटा है और अश्वपालसे प्रीति रखती है, उन्हें संसारसे विरक्ति हो गई। वे राजपाट धन-दौलत सबको त्याग संन्यासी हो गये।

( ३७ ) प्र०—क्या गृहस्थाश्रममें वैराग्य हो सकता है ?

उ०—सबकी पैदायश ही गृहस्थाश्रमसे है। गृहस्थीमें सदा सुख ही रहे, ऐसा हो नहीं सकता। इसमें एक-न-एक दुःख बना ही रहता है। कभी लड़का मरता है, कभी स्त्री मरती है, कभी धन नाश हो जाता है, कभी ऋण-भार सिर पर चढ़ता है, कभी शत्रु सताते हैं ; अतः मनुष्यको जरा-बहुत वैराग्य होता ही रहता है ; पर यह मन्द वैराग्य होता है। जब मनुष्य पर कष्ट आता है, उसे वैराग्य होता है ; पर ज्योंही दुःख टल कर सुखकी बड़ी आती है, उसका वैराग्य नहीं रहता पर वैराग्यका मूल कारण है गृहस्थाश्रम ही। रामचन्द्रजी और वशिष्ठजी प्रभृति महापुरुषोंको गृहस्थीमें ही वैराग्य हुआ था। जनक प्रभृतिको गृहस्थाश्रममें ही ज्ञान हुआ था। जनक महा-राज गृहस्थीमें रहकर भी सच्चे त्यागी थे और उन्हें लोग विदेह कहते थे। ज्ञानका कारण वैराग्य है। जिसे गृहस्थाश्रममें वैराग्य है, वह ज्ञानी है ; पर जिसे संन्यासाश्रममें भी राग है, वह अज्ञानी है। खूब याद रक्खो, बिना वैराग्य ज्ञान नहीं होता और बिना ज्ञानके मोक्ष नहीं होती। जो मनुष्य गृहस्थीमें रहकर भी उसमें कमलको तरह रहता है, उसकी