वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ५१४ )
है, तो फिर ज्ञानी सबके साथ खान-पानादि क्यों नहीं करता ?
३०—ज्ञानी दो तरहके होते हैं।
( ४६ ) (क) जीवन्मुक्त, जिन्हें अपनी देहकी भी सुख नहीं होती। वे राजा जनककी तरह विदेह और अजगर वृत्तिवाले होते हैं। वे न किसीसे भिक्षा माँगते और न कहीं जाते हैं। अगर कोई उन्हें खिला देता है, तो खा लेते हैं ; कोई जल पिखा देता है, तो जल पी लेते हैं। कोई धूपमें बिठा देता है, तो वहीं बैठे रहते हैं और कोई वर्षामें पटक देता है, तो वहीं पड़े रहते हैं। उन्हें धूप, छाया और वर्षा सब समान हैं। वह आत्मानन्दमें डूबे रहते हैं। उनको जगत् नहीं दीखता। उन्हें सर्वत्र आत्मा ही आत्मा दीखता है। उनकी नजरमें न कोई ब्राह्मण हैं और न भंगी बमार ; उनको तो आत्मा ही आत्मा दीखता है ; अतः उनके मुँहमें ब्राह्मण अन्न डाल दे तो वैसा ही, भंगी अन्न डाल दे तो वैसा ही ; उनको दोष नहीं लगता। दोष उन्हें लगता है, जिन्हें वर्णाश्रम-धर्मका ज्ञान होता है। वह तो सब तरह निर्दोष हैं। वेदादिक शास्त्रोंकी आज्ञा भी उन पर नहीं चलती, क्योंकि वह तो ब्रह्मरूप हैं और महान सुख में डूबे रहे हैं। ऐसे महापुरुष जीवन्मुक्त हैं।
( ख ) दूसरे प्रकारके ज्ञानियोंकी गिन्ती आचार्य-कोटिमें है। वे भी सब प्राणियोंमें एक ही आत्मा देखते हैं, इसीसे वे किसीसे राग-द्वेष नहीं रखते ; परन्तु वे समवर्त्ती नहीं होते।
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वे भङ्गी चमार और ब्राह्मण सबका भूटा नहीं खाते, क्योंकि उन्हें वर्णाश्रम-धर्मका ज्ञान है। सब तरहके व्यवहार और वर्णाश्रम-धर्मको समझनेवाला यदि सबके साथ खावे पीवेगा, तो उसे दोष लगेगा। जो पागलोंकी तरह होता है, जिसे क्या करना चाहिये और क्या न करना चाहिये; क्या विधि है और क्या निषेध है; इन बातोंका ज्ञान नहीं होता, उसे दोष नहीं लगता। सब किसीसे समान वस्त्रांव करने या हर किसीके साथ खाने-पीनेसे कोई ज्ञानी नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता, तो भंगी चमार, जो सबका भूटा खाते हैं, ज्ञानी कहलाते। ज्ञानी वही है, जिसमें राग-द्वेष आदि नहीं हैं तथा जो आत्मानन्दसे आनन्दित है; पर जिसमें राग-द्वेष हैं, जो विषय-भोगोंमें आनन्द मानता है, वह ज्ञानी नहीं—अज्ञानी है।
पाप-पुण्य उसे लगते हैं, जिसे ज्ञान होता है। बालकको धर्म-अधर्म और पुण्यपापका ज्ञान नहीं होता, इसीसे उसे पाप-पुण्य नहीं लगते। बालकको आचारका ज्ञान नहीं होता। वह ऊपर मुँहसे रोटी खाता जाता है और नीचेसे मलमूर्त्र त्याग करता जाता है। लोगोंको उसकी इस क्रिया पर ग्लानि नहीं होती। इसी तरह जीवन्मुक्तको पाप-पुण्य नहीं लगते, वह चाहे जो करे, क्योंकि उसे ज्ञान ही नहीं। उसके भले-बुरे कामोंको देखकर कोई उसे भला-बुरा भी नहीं कहता। किन्तु आचार्य कोटिके ज्ञानी यदि मांस-मदिरा खेवन करें, हर
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किसीका जूठा खाँप, पर खी-गमन करें, तो उन्हें पाप ज़रूर लगेगा ; क्योंकि उन्हें सब तरहका ज्ञान होता है और लोग भी उनसे घृणा करते हैं। आचार्य-कोटिमें बही ज्ञानी है, जो उन कामोंको नहीं करता, जिनके शास्त्रोंमें मनाही है और उन कामोंको करता है, जिनके शास्त्रोंमें आज्ञा है। किन्तु जिन कामोंको करता है, उनको निष्काम होकर अनासक्ततासे श्रेष्ठ आचारके लिये करता है अथवा निषिद्ध और विहित दोनों कर्म नहीं करता ; यानी जिनकी शास्त्रोंमें आज्ञा है और जिनकी मनाही है, दोनों ही प्रकारके काम नहीं करता ; केवल आत्म-चिन्तन ही करता है, वह आचार्य-कोटिमें है।
( ५० ) प्र०—मुक्त कित्से कहते हैं ?
उ०—जिस पुरुषका मोक्षमें अभिमान है, देहादिकोंमें ममता है, वह न योगी है और न ज्ञानी ; पर जो किसी की निन्दा करता है और न स्तुति ; न किसीको देता है और न किसी से लेता है ; जो सर्वत्र राग-रहित है, यानी जिसे किसी भी पदार्थ—छी-पुत्र धन-जायदाद प्रभृति से राग नहीं—किसी में भी ममता नहीं—वही मुक्त है। जिसका मन अपने तर्ह चाहने वाली छीको सामने देखकर अथवा मौतको सामने देख कर भी व्याकुल नहीं होता, वही मुक्त है।
( ५१ ) प्र०—क्या आत्मा ऊँच और नीच नहीं होता ?
उ०—आत्मामें भविष्यत्ता और नोचता नहीं। एक ही आत्मा ऊँच-नीच सब शरीरों में है। शरीरोंके गुण-दोषोंसे
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वह गुण-दोषवाला नहीं होता। एक ही आकाश मन्दिरमें भी है, पाखाने में भी है, भंगी-चमार के घरों में भी है; उत्तमोत्तम मूर्तियों में भी है, मल मूत्रकी बाहिट्यों में भी है, परन्तु अति सूक्ष्म होनेके कारण, उसका उपाधियोंसे कोई सम्बन्ध नहीं; वही बुढ़ी-भली उपाधियोंके कारण बुरा भला भी नहीं होता। यही बात आत्माके सम्बन्धमें हैं। आत्मा तो आकाश से भी सूक्ष्म है, ; अतः वह असंग और निलंघ है।
(५२) प्र०—संसार में कितने प्रकारके मनुष्य हैं और उनमें से कौनसे परमात्माके दर्शन करते हैं?
उ०—संसार में तीन तरहके मनुष्य हैं :—(१) कृपण और आलसी, (२) विषय-भोगी, (३) उदार और उद्योगी। इनमें से पहले प्रकार के कङ्कूस और आलसी तो कभी परमात्मा तक पहुँच ही नहीं सकते; क्योंकि वह हाथोंसे दान नहीं करते और पैरोंसे महात्माओं तक नहीं पहुँचते। दूसरे प्रकारके—विषय-भोगी अन्धे हैं। उन्हें न परमार्थ दीखता है और न परमेश्वर; इसलिये वह परमेश्वर का भजन-पूजन नहीं कर सकते। तीसरे प्रकार के लोग उद्योगी और दाता हैं। वे हाथोंसे दान करते और पैरोंसे चल कर महात्माओंकी सेवामें पहुँच जाते हैं; अतः सत्सङ्गके कारण उन्हें ज्ञान हो जाता है। उनका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है; इसलिये वह परमेश्वरके दर्शन पाते हैं।
• जो पुरुष रात-दिन स्त्री-पुत्रोंकी सेवामें लगे रहते हैं, रात
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दिन उनके ही सुख-चैनकी फिक रखते हैं, वह कभी सत्सङ्ग नहीं करते ; इसलिये वह स्त्री-पुत्रोंको फिक करते-करते ही मर जाते हैं और फिर जन्म लेते और मरते हैं। उनकी मोक्ष नहीं होती।
जो पुरुष वेद-शास्त्रोंमें लिखे हुए कर्म करते रहते हैं, वह कभी आत्माका झयाल भी नहीं करते ; वह कर्म करते-करते ही मर जाते हैं। उनकी भी मोक्ष नहीं होती।
जो पुरुष वेद-शास्त्रोंकी परवा न करके, आत्मविचार छोड़ कर और किसी ओर ध्यान ही नहीं देते, उनको परमानन्द या मोक्ष की प्राप्ति होती है।
( ५३ ) प्र०—सब वेद-शास्त्रोंका सार क्या है?
उ०—ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है, जीव ब्रह्मरूप है और दूसरा कोई नहीं—यही सब शास्त्रोंका सारतत्व है।
( ५४ ) प्र०—प्राणी-बन्धनसे कब छूटता है?
उ०—जब मनुष्य इस बातको समझ लेता है कि, आत्मा असङ्ग, अकर्ता, अभोक्ता और चैतन्य स्वरूप है ; तभी वह बन्धनसे छूट जाता है ; अर्थात् अपने असली स्वरूपका ज्ञान हो जाना ही मुक्तिका हेतु है।
( ५५ )—जीव और ईश्वरका मेल कब होता है।
उ०—जब अविद्या और माया त्याग दी जाती हैं ; तब ईश्वर और जीवका मेल हो जाता है। इन दोनोंके मेलमें “अविद्या और माया” वाचक हैं।
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( ५६ ) प्र०—परमेश्वर कहाँ रहता और वह किस तरह मिलता है ?
उ०—परमेश्वर इसी कायामें रहता है। जब तक जीव उसे बाहर खोजता फिरता है, वह नहीं मिलता ; लेकिन जब वह उसे इस कायामें ही खोजता है तब वह मिल जाता है और प्रसन्न होकर पिताकी तरह पुत्रको मोक्ष-रूपी महान फल देता है। असलमें ईश्वर इसी कायामें रहता है ; पर सूक्ष्म लोग उसे काशी, द्वारका, रामेश्वर आदिमें खोजते फिरते हैं। ऐसे अज्ञानी भटकते-भटकते मर जाते हैं। पर ईश्वर नहीं मिलता। वे लोग—“छोरा बगलमें दिंदोरा शहरमें” वाली कहावत खरिताथे करते हैं।
( ५७ ) प्र०—किनका अधिकार मोक्षमें है और किनका कर्ममें ?
उ०—जो पुरुष कर्म करते हुए भी अपने तई कर्मोंका करने वाला और उनके फल भोगने वाला नहीं मानते, अपने तई असंग और सच्चिदानन्द स्वरूप समझते हैं, वे ही ज्ञान और मोक्षके अधिकारी हैं ; किन्तु जो समझते हैं कि, हम इस कामको करते हैं और हम ही इसका फल भोगेंगे, उनका कर्ममें अधिकार है, उनकी मोक्ष हो नहीं सकती ; ईसीलिहे भगवान्ने कहा है—कर्म करो, पर निष्काम होकर करो ; यानी फल-प्राप्तिकी इच्छासे कर्म मत करो। यदि कोई पुरुष इस विचारसे ईश्वर भजन करेगा कि, मुझे इसके फल-स्वरूप
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राज्य-सुख और लोपुशदि मिलें', तो उसे मरकर जन्म लेना होगा और वह इच्छित फल उसे भोगने होंगे। लेकिन जो, बिना किसी कामनाको मनमें रखे, ईश्वर-भजन करेगा, उसे फल भोगनेको जन्म न लेना होगा ; यानी उसकी मोक्ष हो जायगी।
( ५८ ) प्र०—जीव डरता क्यों है ?
उ०—जीव अज्ञानसे डरता है। वास्तवमें उसे किसीका भय नहीं। जब मन किसी दूसरेकी कल्पना करता है, तभी उसे भय लगता है। असलमें, एक अपने आत्माके सिवा दूसरा कोई है ही नहीं, फिर डर और भय किसका ? असलमें सब आफूतोंकी जड़ यह मन है। वास्तवमें न बन्धन है न मोक्ष। बन्धन और मोक्ष मनके सङ्कल्प मात्र हैं। मनके शान्त होनेपर वे शान्त हो जाते हैं। जिस तरह बच्चा अपनी ही परछाहीं से डरता है ; उसी तरह यह जीव अपने संकल्पोंसे डरता है।
( ५९ ) प्र०—क्या आत्मा सचमुच अजर और अमर है ?
उ०—बेशक ; आत्मा अनादि, अजर और अमर है। यह जीव अज्ञानके कारण अपने अजर अमर आत्मामें जन्म और मरण आदि मानता है। जब इसे किसी सत्पुरुषका उपदेश मिलता है, तब इसे होश होता है। उस समय यह अपने तर्ज अजर और अमर समझकर, जन्म-मरणसे रहित हो जाता है। जिस तरह एक बनियेको, गेह-घुले लोटेके जलसे आबद्धस्त लेने
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पर, गुदेा द्वारा खून गिरनेका भ्रम हो गया था ; उसी तरह जीवको अपने स्वरूपमें भ्रम हो रहा है ।
( ६० ) प्र०—इस जीवको सुख कब मिलता है ?
उ०—जब यह जीव अहङ्कार और ममताको त्याग देता है । जबतक मनुष्यके मनमें “मैं और तू” का भगड़ा रहता है, जब तक उसकी ममता खी-पुत्र और घर-मकान आदिमें रहती है, तब तक उसे सुख नहीं होता ।
( ६१ ) प्रश्न—यह संसार असार और महा मलिन है ; फिर लोग इसकी मोह-ममतामें क्यों फँसे हैं ? इसे त्यागते क्यों नहीं ?
उ०—जो लोग मोह-ममतामें फँसे हैं, उन्हें मलिन वस्तुओंसे भी घृणा नहीं होती । जिस तरह भङ्गीको मैलेके देखने या उठानेसे नफ़रत नहीं होती ; उसी तरह मोह-ममतामें फँसे हुए गृहस्थोंको ऐसे गृहस्थभ्रमसे भी घृणा नहीं होती, जो महागन्द्गीका स्थान और दुःख-शोकका भण्डार है । कहीं गृ पड़ा है, कहीं वमन पड़ी है, कहीं रहट पड़ा है, कहीं शूक और खलार पड़ा है, कहीं कोई रोता है, और कहीं कोई हाय-हाय करता है । वजह यह है कि, उनका खभाव ही भङ्गीकी तरह वैसा ही हो जाता है । उनका दिमाग गन्दा हो जाता है । घर-गृहस्थीकी मलिनता और गन्द्गी प्रभृति उनके दिमागमें समा जाती है । कृसाईखानेकी दुर्गन्ध कृसाईयों के दिमागमें समा जाती है । मोचीखानेकी बदबू मोचियोंके भीयमें समा जाती है ।
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तात्पर्य यह है, जिनके अन्तःकरण मोह और ममतासे मैले हो गये हैं, उनको गृहस्थीके नाना प्रकारके दुःख देखकर भी गृहस्थीसे घृणा नहीं होती ; किन्तु जिनके अन्तःकरण सत्सङ्ग से शुद्ध हो जाते हैं, उनको गृहस्थीसे नफ़रत होने लगती है । उन्हें गृहस्थी जञ्जाल मालूम होती है । बाज़-बाज़ लोग बेगारमें पकड़े हुओंकी तरह गृहस्थीमें काम करते हैं और ज्योंही मौका पाते हैं त्योंही छोड़ भागते हैं ।
( ६२ ) प्र०—गृहस्थीमें भी किले विशेष नहीं होता ?
उ०—जिसमें ममता नहीं, उसे विशेष क्यों होने लगा ? जो ममता त्यागकर गृहस्थीके काम करता है, उसे विशेष नहीं होता । जिले संसारी विषय-भोगोंमें ममता नहीं, वह घरमें रहता हुआ भी सुखी है । जिसमें ममता है, वह गृहत्यागी भी दुःखी है ।
( ६३ ) प्र०—मनके निरोधके साधन क्या हैं ?
उ०—वैराग्य और अभ्यास । मनुष्य या देवताकी मूर्ति या सूरज चन्द्रमा प्रभृति जो अपनेको प्यारे लगते हों, उनमें मनको लगाकर मनका निरोध करना चाहिए । पहले मनको स्थूल पदार्थोंमें लगाना चाहिए । जब मन स्थूलमें लगने लगता है, तब धीरे-धीरे अभ्यासले सूक्ष्ममें जाकर उहर जाता है । बिना स्थूल पदार्थोंमें लगे, सूक्ष्ममें मन लग नहीं सकता । बिना मनके एक जगह उहर, परमात्मन् मिल ही नहीं सकता । मतलब यह है, मन के रोकने या उहरानेमें ही परम सुख है और
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उस के इधर-उधर भटकानेमें घोर दुःख है। मूर्त्ति-पूजा इसी लिये जारीकी गई थी, कि लोग् स्थूल मूर्त्ति का ध्यान करते-करते सूक्ष्म आत्माके ध्यान करने योग्य हो जायँ। जब स्थूल स्थूल मूर्त्ति में ही मन न लगेगा, तब सूक्ष्म आत्मा में कैसे लगेगा? भूगोल या जुगराकिया पढ़ने वाले पहले नक़शा देखते हैं। नक़शा देखते-देखते फिर सारे पहाड़ और देश तथा नगर प्रभुति उनकी नज़रमें जम जाते हैं। नक़शा सामने न होने पर भी, सारा नक़शा उनको अपने नेत्रोंके सामने दीखने लगता है। उसी तरह मूर्त्तिपर ध्यान जमाने वालोंका, पीछे, अभ्याससे बिना मूर्त्ति, ध्यान जमने लगता है। मूर्त्ति में भगवान् नहीं हैं, मूर्त्ति खाली ध्यान जमानेका साधन-मात्र है। जो मूर्त्ति को ही भगवान् मान लेते हैं, वे अज्ञानी हैं।
जो लोग कहा करते हैं कि, मूर्त्तिपूजा से ईश्वर नहीं मिलता उन्हें महाकवियों के निम्नलिखित वाक्यों पर ध्यान देना चाहिये :—
( १ )
आखिर को इश्वके कुक से ईमान हो गया ।
मैं बुत-परस्तियों से सुसन्मान हो गया ॥१॥
मैं मूर्त्तिपूजा करते-करते ईश्वर-भक्त हो गया । प्रतीक के द्वारा ही मुझे ईशप्रप्ति हुई । मुझे अस्तंत से सत्तकी प्राप्ति हुई ।
( ५२४ )
काबे जाना भी तो बुतखानेसे होकर आहिद ।
दूर इस राह से अल्लाह का घर कुछ भी नहीं ॥ २ ॥
भक्त महाशय ! अगर काबे जाना हो तो जाओ ; पर मन्दिर में हो कर भी एक राह उधरको जाती है। सब तो यह है, कि उस मार्गसे अल्लाहका घर कुछ भी दूर नहीं है। मूल्चिपूजा से भी ईश-प्राप्ति अनायास हो जाती है।
तेरी सूरत को देखता हूँ मैं ।
उसकी सूरत को देखता हूँ मैं ॥३॥
तेरी सूरतमें मुझे ईश्वर की माया दीखती है। तेरा चेहरा उसको स्ष्टि का बढिया नमूना है।
तेरी खूबसूरती को देखकर मेरा दिल कठेजसे निकला पड़ता है, तो तेरा गढ़ने वाला तो तुम्हें से भी बढ़कर होगा ; अतः मैं तुझे छोड़, उस से ही प्रेम क्यों न करूँ ? बहुत से लोग ईश्वरकी कुदरतके नमूने या प्राकृतिक शोभा देख-देख कर सच्चे ईश्वर-भक्त बन गये हैं।
( २ )
( ६४ ) ईश्वर सर्व व्यापक कहलाता है, पर वह दीखता क्यों नहीं ? उसे कैसे देख सकते हैं ?
उ०—हाँ, ईश्वर सर्वत्र है। जमीन, आस्मान, सूरज, चाँद, समुद्र, नदी, पशु, पक्षी और मनुष्य सबमें ईश्वर है। उसे देखने के लिये उत्तुङ्ग रहो, उसके प्रेममें डूब जाओ, वह दीखेगा। पर
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यह भी याद रखो, कि वह इन चमड़ेकी आँखोंसे नहीं दूखता, वह ज्ञान की आँखों से दीखता है।
महा कवि दाग कहते हैं :—
यहाँ भी तू वहाँ भी तू जूसी तेरी फलक तेरा । कहीं हमने पतापाया न हरगिज आजतक तेरा ॥
यहाँ भी तू है और वहाँ भी तू है। ये जमीन आस्मान सब तेरे ही हैं। फिर भी तेरा पता नहीं मिलता। कहीं तेरी सर्वव्यापकता ही तो तेरे गुप्त होनेका कारण नहीं ?
रहिए सुरताक जलव-ये दीदार । हमने माना नजर नहीं आता ॥
रसके दर्शनोंके लिये इच्छुक रहनेकी आवश्यकता है। यह दूसरी बात है कि, वह दिखाई न दे।
देख गर देखना है जौं कि वह परदानशी । दीदये रोजने दिलसे है दिखाई देता ॥
अगर तू उस पर्दानशीन यार को सम्मुख ही देखना चाहता है, तो उसे मानस चक्षुओं से देखने की कोशिश कर, क्योंकि चर्मचक्षुओं से वह नहीं दीखता।
कृष्ण भगवान् स्वयं गीतामें कहते हैं :—
“विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषां” मूढ़ लोग ईश्वर को नहीं देख सकते। सिर्फ वही देख सकते हैं, जिनके
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ज्ञानके नेत्र हैं ; यानी ईश्वर ज्ञानकी आँखों से दीखता है, चमड़ेको आँखोंसे नहीं दीखता ।
कहाकबि गालिब कहते हैं :—
असले शहद शाहिदो मशहद एक हैं ।
हैरों हूँ फिर मुशाहिदा है किस हिसाब में ॥
जब देखने वाला, दृश्य और दर्शक एक ही हैं । जब सब में एक ईश्वर है ; तब फिर किसका दर्शन किया जाय ? सारे संसार में ब्रह्म व्यापक है और वह मैं ही हूँ, "सोऽहं भाव" दिखाया है ।
और भी—
कतरेमें दजला दिखाई न दे और जुजब में कुल ।
खेल लडकोंका हुआ दीदये बीना न हुआ ॥
वूँ दमें जिसने समुद्रको न देखा और व्यष्टिमें सप्तष्टि को-तो वह ज्ञान-वशु ही क्या हुए ? आत्मसाक्षात्कार कोई लड़कों का खेल थोड़े ही है । इसमें शुद्ध अद्भुतवाद है ; यानी जीव ब्रह्म सब एक ही हैं और एक ब्रह्म के लिवा दूसरा और कोई नहीं है ।
उस्ताद जौक कहते हैं :—
दाना खिरमन है हमें, कतरा है दरिया हमको ।
आये हैं जुजमें नजर कुलका तमाशा हमको ॥
( ५२७ )
हम दाने में डेर और बूँदमें समुद्र देखते हैं। हम व्यष्टि में समष्टि का तपाशा देखने वाले हैं ; तङ्ग-नञ्जर नहीं हैं।
महाकवि ज़ौक कहते हैं—
वह पहलूमें बैठे हैं और वद-गुमानी ।
लिये फिरती सुस्को कहीं-का-कहीं है ॥
वह ईश्वर पहलू-बगल में बैठा है ; पर अम-वश में उसे जहाँ-तहाँ खोजता फिरता हूँ ।
जहाँके आईनेसे दिलका आईना है जुदा ।
उस आईनेमें हम आईनेगरको देखते हैं ॥
संसारके दर्पणसे दिल का दर्पण अलग है। दिलके दर्पणमें हम दर्पण बनाने वाले—ईश्वरको देखते हैं।
( ६५ ) ईश्वरको सेवा से क्या फल मिलता है ?
महाकवि गालिब कहते हैं :—
तेरी बन्दानवाज़ी हफ़त क़िश्वर बख़ूफ़ा देती है ।
जो तू मेरा जहाँ मेरा अरब मेरा अजम मेरा ॥
तेरी सेवा निष्कल नहीं जाती। तेरी सेवा करनेसे सातों विद्यायतका राज्य मिल जाता है। अगर तू मेरा हो ढ़ाय, तो संसार मेरा, अरब मेरा और अजम मेरा।
मनुष्यकी सेवामें कुछ लाभ नहीं ; लाभ है जगदीश की सेवा में ; उसकी कृपा होनेसे फिर कोई अभाव नहीं रहता।
( ६६ ) ईश्वर कैसा है ?
( ५२८ )
३०—महाकवि दागा कहते हैं :—
सिफातो जातमें यकता है तू ऐ वाहिदे मुतलक़ ।
न कोई तेरा सानी है न कोई मुश्तरक तेरा ॥
हे त्रिविध भेद-शून्य परमात्मा ! तू अद्वितीय है, तेरा, जोड़ा नहीं है और कोई तेरा शरीर या साक्षी भी नहीं है ।
( ६७ ) मनुष्य देवताओं से कब बढ़ सकता है ?
३०—अगर मनुष्य किसी भी चीज़की इच्छा न रखे, उसमें मोह-ममता और वासना न हो ; तो वह देवताओं से भी बढ़कर हो है ।
उस्ताद ज़ौक कहते हैं :—
जिस इन्हीं को सगे दुनिया न पाया ।
फरिश्ता उसका हमपाया न पाया ॥
जो मनुष्य संसार का कुत्ता नहीं-संसार का दास नहीं, वह देवताओंसे बढ़ कर है ।
हमारे यहां भी शुक्रदेवजी ने कहा है :—
इन्द्रोऽपि न सुखी तादृश्यादृमिन्मुखु निःस्पृहः ।
लोऽन्यः स्यादिह संसारे त्रिलोकी विभवे सति ॥
निस्पृह-इच्छारहित भिक्षु जैसा सुखी है ; वैसा सुखी इन्द्र भी नहीं । जब त्रिलोकिका विभव होने पर भी, निःस्पृह भिल्लारीके समान इन्द्र सुखी नहीं है, तब और कौन हो सकता
( १०० )
है। उपन्यास तो आपने बहुतेरे देखे होंगे ; लेकिन हम दावेके साथ कहते हैं, कि ऐसा एक भी उपन्यास आपने देखा न होगा। इसकी भाषा इतनी आसान है, कि बच्चे भी आसानीसे समझ सकते हैं। आदमी के साही गुमगीन क्यों न हो ; कोई कितना ही गम्भीर क्यों न हो ; इस उपन्यास की दो-चार सतरें पढ़ते ही सारी गुमगीनी और गम्भीरता भाग जाती है। मुहर्दमी सूरत भी मारे हँसके लोटन-कबूतर हो जाती है। इस उपन्यासका विषय बड़ा ही रोचक और शिक्षाप्रद है। थोड़ा पढ़ते ही आँखों और छातीसे विमट जाता है। जबतक यह उपन्यास समाप्त नहीं होता, तबतक अपने पढ़नेवालोंका खाना, पीना और सोना भुलाये रहता है।
भारत की लाटगीरी करनेसे पहले लार्ड कर्जनेने इसे सम्पादित कर यूरोपमें बड़ा नाम पाया था। इसकी खूबसूरती आपके मकान की शोभा बढ़ाने लायक है। सब मिलाकर, इसमें चौबीस हाफटोन तस्वीरें दी गई हैं। हर तस्वीर ऐसी है, कि देखिये तो देखते ही रहिये। मोटे कागज़ पर बड़े ही साफ अक्षरोंमें पुस्तक छापी गयी है। रेशमी चमचमाती जिल्द है। लेकिन पृष्ठके इस मोटे उपन्यासका दाम सिर्फ साढ़े तीन रुपये। के जिल्दके तीन रुपये। डाक-महसूल दस आने।
पता—हरिदास एगड़ कम्पनी,
२०१, हरिसन रोड, कलकत्ता।
( १ )
ऐसा था बाँसुरीके बजैयाका बालपन । क्या-क्या कई मैं कृष्ण कन्हैयाका बालपन ॥२॥
आपने प्रेम-सम्बन्धी पुटककर शोरोंके सिवा “पेट,” “मनुष्य” “बचपन,” “बुढ़ापा,” “रोटी,” “संसार मिथ्या” बजारा नामा प्रभृति पर भी बड़ी ही मनोहर कवितायें लिखी हैं। आपकी ब्रह्मानन्द-सम्बन्धी कविता इसी पुस्तकके अन्तमें देखें। इस पुस्तकके प्रकाशित होनेके पहले शौक्रान आपकी कविताओं को तरसते थे। जब से यह पुस्तक छपी है, घड़ा-घड़ बिक रहो है। आप इसे अवश्य देखें। दाम १)
श्रियायत ।
जो सज्जन दाग, जोड़, गालिब और नज़ीर-चारों पुस्तके एक साथ माँगायेंगे, उन्हें ३) देने होंगे। डाकमहसूल १ पार्श्व न देना होगा।
उपन्यास-सम्राट्
हाजीबाबा ।
सम्पादक
भूतपूर्व वाइसराय लार्ड कर्जन महोदय ।
पृष्ठ-संख्या ३५०
चित्र-संख्या २४
यह रहस्य-पूर्ण उपन्यास हाल ही में छप कर तैय्यार हुआ