वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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३०—बेशक, शरीर और आत्मा दो अलग-अलग पदार्थ हैं। शरीर जड़ और नाशमान् है ; किन्तु आत्मा चेतन और अविनाशी है। शरीर रहने का घर और आत्मा उसमें रहनेवाला है।
( ४ ) प्र०—जीवन और मरण अथवा जन्म और मृत्यु कित्ते कहते हैं ?
३०—शरीर और आत्मा के संयोग को जीवन और इनके वियोग को मरण कहते हैं। जब आत्मा नये शरीर में प्रवेश करके संसारमें आता है, तब कहते हैं कि जन्म हुआ और जब आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर चल देता है, तब कहते हैं कि मृत्यु हुई।
( ५ ) प्र०—क्या यह शरीर ही आत्मा नहीं है ?
३०—नहीं, यह देह या शरीर या चोला मनुष्य नहीं है। इस देह को धारण करनेवाला अथवा इस देह में बसनेवाला एक सूक्ष्म से भी सूक्ष्म पदार्थ है, जो हृदय के अन्दर रहता है, उसे ही मनुष्य, जीवात्मा, देही या शरीरी कहते हैं।
( ६ ) प्र०—बचपन, जवानी और बुढ़ापा,—ये अवस्थायें किस की होती हैं, आत्माकी या शरीर की ?
३०—बचपन, जवानी और बुढ़ापा,—ये अवस्थायें शरीरकी होती हैं, आत्माकी नहीं। शरीर की अवस्थायें बदलती रहती हैं, मगर शरीर के अन्दर रहनेवाला जीवात्मा सदा जैसा का तैसा बना रहता है। शरीरकी अवस्था बदलने पर, उसकी अवस्था में कुछ भी फेरफार नहीं होता। बचपन के
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शरीर में आत्मा जैसा रहता है, जवानी और बुढ़ापे के शरीर में भी वैसा ही रहता है। मतलब यह, आत्मा सदा एक सा रहता है, वह न कभी बच्चा होता है, न बूढ़ा और जवान।
( ७ ) शरीरके साथ जो आत्मा या चेतन वस्तु पैदा होती है, वह क्या शरीरके साथ ही नाश नहीं हो जाती ?
३०—शरीरके साथ जो चेतन वस्तु या आत्मा पैदा होती है, वह शरीरके नाश होने पर नाश नहीं हो जाती। शरीर नष्ट हो जाता है, पर उसके अन्दर रहनेवाला आत्मा नाश नहीं होता; वह अपने कर्मानुसार फिर नया शरीर पाता है। हम लोग जिस तरह आज हैं, उसी तरह पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। हमने अब तक अनगिन्ती जन्म लिये हैं और आगे भी, जब तक मोक्ष न हो जायगी, इसी तरह जन्म लेते और मरते रहेंगे। देखनेमें आता है, कि माँके पेटसे निकलते ही बालकको हर्ष, शोक और भय आदि होने लगते हैं। हालके पैदा हुए बालकको अपने पहले जन्मकी हर्ष, शोक और भय पैदा करनेवाली बातें याद होती हैं, इसीसे वह हँसता डरता और रोता है। अगर हालके जन्मे बालकने पहले कभी जन्म-न लिया होता, तो वह पैदा होते ही, अपनी भूख शान्त करनेके लिए, माँके स्तनोंको खोज कर उनसे लग्न जाता। बालकने पहले अनेक जन्म लिये हैं और प्रत्येक बार माताओंके स्तन-पान किये हैं; इस बार भी उसे पहले जन्मकी बात याद है, उसे स्तन-पानका अनुभव है, दूध पीनेके लाभका
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ज्ञान है ; इसीसे वह इस जन्ममें, पैदा होते ही, बिना किसीके सिखाये, स्तन पीने लगता है। इससे साफ मालूम होता है कि हालके जन्मे वन्धेके मीतर चैतन्य वस्तु—आत्मा है और वह पहले जन्ममें भी था। उसी आत्माने अपना पहला शरीर छोड़ कर, इस नये शरीरमें प्रवेश किया है। उस बालकका पहला शरीर नाश हो गया है, पर उसके अन्दर रहनेवाला आत्मा ज्यों का त्यों है ; वह पुराने शरीरोंको त्याग-त्याग कर नये-नये शरीर धारण करता है। शरीर नाश होते जाते हैं, मगर आत्मा कभी नाश नहीं होता। इसीसे शास्त्रोंमें आत्माको अमर और अविनाशी तथा नित्य या सदा-सर्वदा रहनेवाला कहा है।
(८) प्रश्न—शरीर और आत्माका मुकाबला करो।
उ०—शरीरमें रहनेवाला आत्मा नित्य, अविनाशी, अक्षय, निराकार, निर्विकार, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अजर और अमर है ; किन्तु शरीर अनित्य, नाशमान्, घटने-बढ़नेवाला, साकार, विकारवान्, शूल और बूढ़ होने तथा मरनेवाला है।
आत्मा कभी मरता नहीं, सदा रहा आता है, इसीसे उसे नित्य कहते हैं। आत्माका कभी नाश नहीं होता, कोई भी उसका नाश नहीं कर सकता। मनुष्यकी तो बात ही क्या है, स्वयं जगदीश परम परमात्मा भी, आत्माका नाश नहीं कर सकता ; क्योंकि आत्मा स्वयं ही ब्रह्म है, कोई भी, अपना नाश आप नहीं कर सकता। आग आत्माको जला
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नहीं सकती, जल डुबा या गला नहीं सकता और हवा सुखा नहीं सकती ; अतः आत्माके अविनाशी होनेमें कोई सन्देह नहीं । आत्मा निराकार है ; यानी उसके आकार या अङ्ग प्रत्यङ्ग नहीं ; इसीलिये वह घटना-बहुता नहीं ; बस, इसी वजहसे उसे अक्षय भी कहते हैं । पैदा होना, अस्तित्व, बढ़ना, घटना, रूपान्तर होना और नाश होना—ये छः “भाव विकार” हैं । ये छः देहके धर्म हैं । शरीर पैदा होता है, घटना-बहुता है, शरीरमें ही जवानी और बुढ़ापा प्रभृति रूपान्तर या फेरफार होते हैं तथा शरीरका नाश होता है ; यानी शरीरको ये छः अवस्थाये होती हैं ; किन्तु आत्मा इन छहों विकारोंसे अलग रहता है । न वह पैदा होता है, न घटना-बहुता है, न उसमें रूपान्तर होते हैं और न उसका नाश होता है ; इसीसे उसे निर्विकार कहते हैं । आत्मा सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है, इसलिये वह बुद्धि वगैरःसे जाना भी नहीं जा सकता । आत्मा न बूढ़ा होता है और न मरता है ; इसीसे उसे अजर और अमर कहते हैं ।
( ६ ) प्रश्न—क्या स्त्री और पुरुषमें आत्मा अलग-अलग होते हैं ?
जिस तरह बालकपन, जवानी और बुढ़ावस्वार्के शरीरमें एक ही आत्मा होता है ; उसी तरह स्त्री, पुरुष और नपुंसक प्रभृतिमें एकही आत्मा होता है । आत्मा जैसे-जैसे शरीरोंको धारण करता है ; वैसे-ही-वैसे हो जाता है । शरीर स्त्री या
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पुरुष होता है ; आत्मा नहीं । एक ही आत्मा दो तरहके शरीरोंमें रहनेसे स्त्री और पुरुष कहलाता है । स्त्रोंके शरीरमें रहनेवाला आत्मा, जब पुरुषके शरीरमें आ जाता है ; तब पुरुष कहलाता है और पुरुषके शरीरमें रहनेवाला आत्मा, जब स्त्रोंके शरीरमें आ जाता है ; तब स्त्री कहलाता है । आत्मा स्त्री पुरुष नहीं होता ; किन्तु शरीर स्त्री पुरुष होता है ।
( १० ) प्रश्न—मरनेके बाद इन्द्रियाँ अपना-अपना काम क्यों नहीं करती ?
उ०—शरीर जड़ है और आत्मा चेतन है । शरीर घर है और आत्मा दीपक है । जिस तरह घरमें दीपकका प्रकाश रहता है ; उसी तरह शरीर रूपी घरमें आत्मा रूपी दीपकका प्रकाश रहता है । यह चेतन आत्मा ही सारी इन्द्रियोंके गुणोंका प्रकाशक है । चेतन आत्माकी रोशनीसे ही इन्द्रियाँ अपना-अपना काम करती हैं । जब आत्मा शरीर-रूपी घरको छोड़ जाता है ; तब शरीर—घरमें अँधेरा हो जाता है । इन्द्रियाँ जो आत्माकी उद्योतिसे अपना-अपना काम करती थीं ; उसके शरीरमें न रहनेसे बे-काम हो जाती हैं ।
( ११ ) प्रश्न—क्या ईश्वर और आत्मा भिन्न-भिन्न हैं ?
उ०—नहीं ; ईश्वर और आत्मा बिल्कुल एक ही हैं । इनमें कुछ भेद नहीं ।
( १२ ) प्रश्न—ईश्वर सर्ववज्र और सर्वशक्तिमान् है ; पर
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जीवात्मा तो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् नहीं ; तब दोनों एक कैसे हुए ?
उ०—जीवात्माकी उपाधि अन्तः कारण है और ईश्वरकी उपाधि माया है। जीवात्माकी उपाधि छोटीसी है ; पर ईश्वर की उपाधि माया सारे ब्रह्माण्डमें फैल रही है ; इसीसे ईश्वर में सर्वज्ञता आदि धर्म रहते हैं ; पर जीवात्मामें नहीं। परन्तु सुखरुपता दोनोंमें समान है तथा नित्यत्व और चेतनत्व धर्म भी दोनोंमें बराबर हैं। इससे स्पष्ट है कि, ईश्वर और आत्मा में भेद नहीं ; उपाधिके छोटेपन और बड़ेपनके कारण दोनोंमें भेद जान पड़ता है।
यही सवाल किसी आदमीने एक महात्मासे किया था। महात्माने कहा—“मुझे प्यास जोरसे लगी है, अतः पहले गङ्गाजोसे एक तूम्बी जल भर लाओ।” वह आदमी एक तूम्बी गङ्गा-जल भर लाया और महात्माके सामने रख दिया। महात्माने कहा—“यह तो गङ्गाजल नहीं है। गङ्गाजलमें तो सेकड़ों नाव और अगन बोट आदि चलते हैं, बड़े बड़े मगर और घड़ियाल तथा मछलियाँ तैरती हैं, किनारे पर घाट बने हैं, लोग स्नान करते हैं ; पर इसमें तो इनमेंसे एक भी नहीं, फिर मैं इसे कैसे गङ्गाजल समझूँ ?” उस जल लाने वालेने कहा—“महाराज ! वह गङ्गाका बड़ा भारी प्रवाह है, जिसके किनारे पर्वत और वृक्षद्विक हैं तथा जिसमें जहाज चलते और मनुष्य नहाने हैं ; और यह उसी प्रवाहका एक छोटासा अंश है।
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इसमें वे सब कैसे रह सकते हैं ? पर इसके गङ्गा-जठ होनेमें जरा भी शक नहीं ; जो मधुरता आदि गुण उसमें हैं, वे ही सब इसमें भी हैं। यह सुनते ही महात्माने कहा—“वस, तेरा सवाल हल होगया। यही बात ईश्वरात्मा और जीवात्मामें है। दोनों एक ही हैं। ईश्वर नित्य और चेतन है ; आत्मा भी नित्य और चेतन है। वह सुख-रूप है और यह भी सुखरूप है। आत्माको उपाधि अन्तःकरण है और ईश्वरकी उपाधि माया है। आत्माकी उपाधि छोटीसी है, उसका दायरा छोटा है ; इसीसे आत्मामें सर्वज्ञता आदि नहीं ; पर ईश्वरकी उपाधि माया सारे विश्वमें व्याप रही है, उसका दायरा बहुत बड़ा है ; इसीसे उसमें सर्वज्ञता आदि धर्म हैं।
( १३ ) प्रश्न—क्या ईश्वर सर्वव्यापक है ? अगर ईश्वर सर्वज्ञ है, तो वह दीक्षता क्यों नहीं ?
उ०—जिस तरह दूधमें मक्खन, दहीमें घी, तिलोंमें तेल, पहाड़ी भरनोंमें जल और अरणीमें अश्विनी ज्योति है ; उसी तरह परमात्मा सर्वज्ञ है। जिस तरह तिलोंमें तेल है, पर दीक्षता नहीं ; दूधमें मक्खन है, पर दीक्षता नहीं ; ईधमें रस हैं, पर दीक्षता नहीं ; उसी तरह आत्मा सब शरीरोंमें है, पर दीक्षता नहीं।
( १४ ) प्र०—क्या सबमें एक ही आत्मा है ? अगर सबमें एक ही आत्मा है, तो अलग-अलग क्यों दीक्षता है ?
उ०—निश्चय ही सारे विश्वमें अथवा संसारके सभी
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शरीरोंमें एक ही आत्मा है। खी, पुख, गाय, भैंस, घोड़ा, गधा, हाथी, ऊँट, कुत्ता और बिल्ली प्रभृति संसारके सभी प्राणियोंमें एक ही आत्मा है। इन सबमें अलग-अलग आत्मा नहीं हैं; पर भ्रमवश या अज्ञानसे जिस तरह एक ही सूर्य अनेक जलसे भरे हुए घड़ोंमें अनेक सूर्योंकी तरह दीखता है। उसी तरह एक ही आत्मा अनेक शरीरों में अनेक आत्माओं की तरह दीखता है। बुद्धिमान् समझता है कि, सूरज एक है, पर अनेक घड़ोंमें अनेकों सूरजों की तरह दीखता है; उसी तरह ज्ञानी समझता है कि, सारे संसार में एक ही आत्मा व्याप रहा है; पर अनेकों शरीरों में अनेकों आत्माओं की तरह दीखता है।
(१५) प्र०—अगर जगत् के सभी शरीरोंमें एक ही आत्मा है, तो एक के सुखी होनेसे सभी सुखी क्यों नहीं होते और एक के दुखी होनेसे सभी दुखी क्यों नहीं होते और एक के मरनेसे सभी मर क्यों नहीं जाते इत्यादि ?
उ०—एक शरीरमें हाथ, पैर, नाक, कान अंगुली प्रभृति अनेक अवयव हैं, पर उस शरीरके सारे अवयवों में एक ही आत्मा है। इतने पर भी, पैरमें दर्द होनेसे हाथमें दर्द नहीं होता; नाकमें सुख होनेसे कानमें सुख नहीं होता और एक अङ्गके दूट जानेसे सारे अङ्ग दूट नहीं जाते। मतलब यह है कि जिस तरह एक शरीर के अवयवोंमें एक आत्मा होनेसे सबमें सुख-दुःख नहीं होता, उसी तरह ब्रह्माण्डके शरीरमें एक आत्मा
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हैं और संसारके सारे शरीर उसके अवयव हैं। एक शरीरके सुखी-दुखी होनेसे विराटके और शरीर सुखी-दुखी नहीं होते ; क्योंकि वे सब शरीर विराटके अवयव मात्र हैं। और भी खुलासा यों है कि, जिस तरह हमारे इस शरीरके हाथ पैर आदि अवयव हैं ; हमारे एक अवयव को कष्ट होनेसे दूसरे अवयव को कष्ट नहीं होता ; उसी तरह हम सारे ही प्राणी उस विराट-शरीरके अवयव हैं। हम में से एक के दुःखी होनेसे दूसरा दुःखी नहीं होता और सुखी होनेसे दूसरा सुखी नहीं होता।
आत्मासे सुख-दुःख आदिका कोई सम्बन्ध नहीं है। सुख-दुःख आदिका सम्बन्ध अन्तःकरण से है। गरमी-सरदी, सुख-दुःख आदि आत्माको नहीं मालूम होते ; किन्तु अन्तःकरणको मालूम होते हैं। सब अलग-अलग शरीरोंमें आत्मा तो एक ही है ; मगर अन्तःकरण अलग-अलग हैं। इसी कारण एक को सुख होनेसे सब को सुख और एक को दुःख होनेसे सबको दुःख नहीं होता। “एकोदेवः सर्वभूत्रेषु गृहः” इत्यादि श्रुतियोंसे साफ मालूम होता है कि, आत्मा सारे शरीरोंमें एक ही है। इच्छा संकल्प संशय, लज्जा, भय आदि मनसे सम्बन्ध रखते हैं। जी पेंसी समझते हैं कि, आत्माको सुख होता है, आत्मा को दुःख होता है तथा शरीर-शरीरमें अलग-अलग आत्मा हैं, वे सब भ्रूत करते हैं ; वे नादान और अज्ञानी हैं।
एक बात और है,—आत्मा नित्य और आदि-अन्त रहित है,
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उसका विनाश कभी नहीं होता, इसलिये आने वाले और जाने वाले, पैदा होनेवाले और नाश होनेवाले सुख-दुःखोंका सम्बन्ध आत्मासे नहीं हो सकता। दो समान पदार्थोंका सम्बन्ध होता है, यही नियम है। अन्तःकरण और सुख-दुःख आदि दोनों हो उत्पत्ति और विनाशमें समान हैं; अतः अन्तःकरण को ही दुःख-सुख मालूम होते हैं। निर्गुण, निराकार, नित्य और विकार-रहित आत्मा को अनित्य (सदा न रहने वाले) सुख-दुःख नहीं घेर सकते। सुख-दुःख अनित्य हैं और अन्तःकरण भी अनित्य है। अनित्यका अनित्यके साथ ही मेल हो सकता है; नित्य और अनित्य का संयोग कभी हो नहीं सकता। अब साफ तौरसे समझमें आ जायगा कि, सुख-दुःख का सम्बन्ध अन्तःकरण से है, आत्मा से उनका कुछ भी सरोकार नहीं। आत्माको कभी कोई दुःख नहीं होता। अज्ञान से आत्माका बन्धन मालूम होता है। अभिमानके कारण या विषयों और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे सुख-दुःख आदि पैदा होते हैं और वह अन्तःकरण को मालूम होते हैं; आत्माका उनसे कोई सरोकार नहीं। बस, यही वजह है कि सब शरीरमें एक आत्मा होने पर भी, अन्तःकरणोंके अलग होनेसे, एक को सुख होनेसे दूसरेको सुख और एक को दुःख होनेसे दूसरेको दुःख नहीं होता।
( १६ ) प्र०—मनुष्य बन्धन-मुक्त कैसे हो सकता है ?
• उ०—जिस तरह मरुभूमिमें भ्रमसे जल दीख पड़ता है, पर
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वास्तवमें वहाँ जलका नाम भी नहीं—मरुभूमि ही है ; उसी तरह यह जगत् जैसा दीखता है, वैसा नहीं है ; भ्रमसे वैसा दीखता है। असलमें मिथ्या प्रपञ्च है। यह मेरी स्त्री है, यह मेरा पुत्र है, यह मेरा धन है, यह मेरा घर है—यह सब वासना के खेल है ; यानी वासनासे ही संसार दीखता है। असलमें, न कोई किसीका पुत्र है और न पिता, न पुत्री। वासनाके कारण ही यह जीव बन्धनमें बँधता है। वासनाके कारण ही यह नाना प्रकारके कष्ट भोगता है। वासनाके त्यागसे ही परमानन्दकी प्राप्ति होती है और जीव ज्ञानी हो जाता है। हृदयमें कामनाओंका होना ही संसार है और कामनाओंका सब तरहसे नाश हो जाना ही मोक्ष है। जो बन्धनसे छूटना चाहें, वे वासना या कामना त्यागें।
( १७ ) प्र०—क्या पुत्र पौत्रोंके होनेसे गति हो जाती है ?
उ०—नहीं ; यह अज्ञानियोंका भ्रम है। पुत्र तो कुत्ते बिल्लो और सूअरोंके भी होते हैं, क्या उनकी गति हो जाती है ? हरगिज़ नहीं। पुत्रसे न तो किसीकी गति हुई और न होगी। गति अपने पुरुषार्थसे होती है। अगर पुत्रोंसे गति होती, तो पहलेके मोक्ष चाहनेवाले अपने पुत्रोंको क्यों त्याग जाते ? जो पुत्रसे गति होना मानते हैं, वे मोहान्ध हैं।
( १८ ) प्र०—क्या तीर्थयात्रसे भी मुक्ति नहीं हो सकती ?
उ०—जिन पुरुषोंके मन और बाणी आदि शुद्ध हैं, उनके यद-पदमें तीर्थ है ; किन्तु जिनके मन मलिन हैं, उनके लिये
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गङ्गा भी कीकट देशके समान है, यह बात "देवी भागवत"में कही है।
"कपिल गीता" में कहा है—यह तीर्थ है, वह तीर्थ है, ऐसा समझ कर अज्ञानी मारे-मारे फिरते हैं, क्योंकि उन्हें आत्मा रूपी तीर्थका हाल मालूम नहीं।
"गीता" में कहा है—जिसकी आत्मामें प्रोति है, जो आत्मानन्दसे तृप्त है या जो आत्मासे सन्तुष्ट है, उसे कुछ भी नहीं करना है; यानी उसके लिये तोर्थोंमें भटकने या और काम करनेकी जरूरत नहीं।
जिस तरह तालाबके निर्मल और ठहरे हुए जलमें सूर्यका बिम्ब-अक्षर—दीखता है; उसी तरह शुद्ध मन वालेको परमेश्वर दीखता है। जिसका मन स्थिर और शुद्ध है, उसके चरणोंमें तीर्थ हैं। किसीने कहा है—
दिल बदस्त आर्बुद कि हज्जे अकबर अस्त।
अज हजारों कांवा एक दिल बेहतर अस्त ॥
( १६ ) प्र०—महात्माओंने पुत्रोंको दुःखदायी और शत्रु क्यों कहा है ?
उ०—पुत्र सचमुच ही शत्रु होते हैं। पुत्र इस जन्म ही में माता-पिताको दुःखसे नहीं छुड़ा सकते, तब मरनेपर क्या सुखी करेंगे ? पुत्र तो केवल धनके साथी हैं। वे पूर्व जन्मके ठेनदार हैं। अपना ऋण चुकनेको पुत्ररूपमें जन्म छेते हैं। असलमें, पुत्रका नाम ही दुःखोंकी खानि है। जितने पुत्र नहीं होता, वे
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पराये पुत्रोंको देखकर मनमें कुड़-कुड़ कर मरते हैं। हाय ! हमारे धनका कौन मालिक होगा ? गुरीबोंको पुत्र न होनेसे इतना दुःख नहीं होता, जितना धनियोंको होता है। अगर किसीके पुत्र होकर घर जाता है, तो वह जीते जी ही मर जाता है। अगर पुत्रकी शादी हो जाती है और फिर वह मर जाता है, तो माता-पिताके जलनकी स्वीमा नहीं रहती ; पुत्र-बधूको देख-देख कर रात-दिन रोते-कलपते हैं। अगर पुत्र कुपुत्र निकल जाता है, तब तो माता-पिताको पद-पद पर जलना और कुड़ना पड़ता है। उनको पुत्र न होनेवालों से भी अधिक सन्ताप होता है। अगर पुत्र सुपुत्र होता है, तो उसके जीनेकी चिन्ता रहती है, फिर उसके शादी विवाह की फिक रहती है और औलाद हो जानेपर उसकी औलादकी चिन्ता रहती है। खारांश यह, पुत्रवानों को सदा चिन्ताश्रि में जलना पड़ता है और शेषमें पुत्रसे कोई लाभ भी नहीं। मरने पर पुत्र धनका मालिक हो जाता है और पिताका नाम भी नहीं लेता। अगर कोई श्राद्ध बगैरः करता है, तो वह अपने नाम और लोक-लाजको करता है ; पिताकी आत्माकी शान्तिके लिये नहीं करता। इसीसे तत्वज्ञानी लोग पुत्रकी इच्छा नहीं रखते और पुत्रको ऐसा शत्रु कहते हैं, जो ऊपर से मित्र मालूम होता है ; पर वास्तवमें पक्का शत्रु होता है। अनेक पुत्र दण्डित्वा पिताको मारते-पीटते हैं। उसे दहलीज में टूटीसी खाट पर पटक कर बासी-कूसी खाना देते और
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अनेक दुर्गति करते हैं। आश्चर्य है, फिर भी मोहान्म अज्ञानी पुत्र ही पुत्र चिह्नया करते हैं।
( २० ) प्र०—ज्ञान, ध्यान, ज्ञान और शौच किसे कहते हैं ?
उ०—आत्माको सब प्राणियोंमें एक रूपसे देखना ही "ज्ञान" है। मनका विषयोंसे रहित हो जाना ही "ध्यान" है। मनके मैलोंको दूर करना ही 'ज्ञान' है और इन्द्रियोंके निग्रह करने को ही "शौच" कहते हैं।
( २१ ) प्र०—संसार-बन्धनसे किस तरह छुटकारा मिल सकता है ?
उ०—विषयोंमें लगे हुए चित्तको, विषयोंसे हटाकर, ब्रह्म में लगा देनेसे संसार-बन्धनसे छुटकारा हो सकता है।
( २२ ) प्र०—आत्माके साक्षात्कारमें बाधक कौन है ? परमात्माका स्पष्ट दर्शन कब होता है ?
उ०—आँख, कान, नाक प्रभृति इन्द्रियाँ और रूप, शब्द, गन्ध, स्पर्श आदि विषय अन्तर्थाकी जड़ हैं। इन्द्रियाँ सदा विषयोंकी ओर पुरुषको ले जाती हैं और विषय विष की तरह घातक हैं। विषयासक्तोंको आत्मा या परमात्माका दर्शन नहीं होता।
विषय और इन्द्रियाँ पैदा होनेवाले और नाश होनेवाले हैं ; किन्तु आत्मा अजन्मा और अविनाशी है ; अतः उसका और इनका मेल नहीं, क्योंकि मेल समान-समानका होता है ; नाशमान और अविनाशीका मेल हो नहीं सकता। आत्मा इन
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से परे और सबका साक्षी है। उस आत्माकी प्राप्ति सत्यसे होती है। सत्यसे ही मनका निरोध होता है। मनका निरोध होते ही आत्मा साफ दीखता है ; यानी शुद्ध साफ और निर्मल मनमें ही आत्मा दीखता है, जिस तरह साफ दर्पणमें चेहरा दीखता है। अशुद्ध मनमें आत्मा नहीं दीखता। अशुद्ध मन बन्धनका कारण और शुद्ध मन मोक्षका कारण है। मनके शुद्ध हो जानेसे चुरे भले कर्मोंका नाश हो जाता है। कर्मोंके नाश हो जानेसे पुरुष जीवन्मुक्त हो जाता है। मतलब यह है कि, आत्मा या परमात्माके दर्शन चाहनेवालोंको, इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर, मनको शुद्ध करना जरूरी है। जिस तरह लकड़ियोंके न रहनेसे अग्नि अपने कारणमें लय हो जाती है ; यानी बुझ जाती है ; उसी तरह वृत्तियोंसे रहित हुआ मन भी अपने कारणमें लय हो जाता है ; यानी शान्त हो जाता है। जब मन शान्त हो जाता है, उसको चञ्चलता नाश हो जाती है, वह स्थिर हो जाता है ; तब आत्माका दर्शन होने लगता है। जिस तरह चञ्चल हवासे हिलते हुए मैठे गवले जलमें सूरजका विम्ब या अक्स नहीं दीखता ; उसी तरह अशुद्ध, मैठे और चञ्चल चित्तमें आत्मा नहीं दीखता। अतः मनकी चञ्चलता और उसकी गन्दीगो की दूर करना जरूरी है।
( २३ ) प्रश्न—परमेश्वर कहाँ है ? उसका ध्यान कैसे करना चाहिए ?
उ०—यह जो हमारा शरीर है, यही उस देवता—परमेश्वर
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के रहनेका मन्दिर है। इसीमें जो चेतन जीव है, वही केवल “शिव” है। मनुष्यको हृदय-कमलमें परमेश्वरका ध्यान करना चाहिए। चञ्चल या चलायमान चित्तसे वह नहीं दीखता है।
( २४ ) प्रश्न—सारे दुःखोंका मूल कारण क्या है ?
उ०—तृष्णा—इच्छा। जिसके मनमें तृष्णा है, उसका मन सदा इधर-उधर भटकता रहता है, वह कभी शान्त नहीं होता। मनके शान्त हुए बिना प्राणीको सुख नहीं ; अतः तृष्णाको त्यागना चाहिए ; किसी भी वस्तुकी इच्छा न रखनी चाहिए। यहाँतक कि, स्वर्ग और मोक्षकी भी इच्छा न रखनी चाहिए।
( २५ ) प्रश्न—अगर यह जगत् जड़ है, तो यह चेष्टा कैसे करता है ?
उ०—वेशक यह जगत् जड़, नाशमान और दुःख-रूप है ; किन्तु ब्रह्म चेतन, नित्य और सुख-रूप है। जिस तरह बुम्बक पत्थरकी विलक्षण शक्तिसे लोहा चेष्टा करने लगता है ; उसी तरह ब्रह्मचेतन की विलक्षण शक्तिसे यह जगत् भी चेष्टा करता है।
( २६ ) प्र०—ईश्वर और जीव की एकता प्रमाणित् कुम्भो ।
उ०—ईश्वर और जीवमें भेद नहीं है। जैसे ब्रह्म निरवयव है और निराकार है ; वैसे ही जीव भी निरवयव और निराकार है। एक ही चेतन अन्तःकरण रूपी उपाधिोंके अन्तर्गत तो
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जिन्दगी भी सदा नहीं रहती। मनुष्य पानीके बुल-बुलेको तरह पैदा होता और सड़ ही बिलाय जाता है। धन और प्रभुता भी सदा नहीं रहते। जो आज राजा है, कल वह फ़कीर हो जाता और दरदर मारा-मारा फिरता है। अतः इन पर फूटना—अभिमान करना, अज्ञानियोंका काम है।
(३२) प्र०—मनुष्यका सबसे बड़ा कर्तव्य—फ़र्ज़ क्या है ?
उ०—ईश्वर-भजन करना ; क्योंकि वह स्वामी है। स्वामी ध्यान दे, चाहे न दे ; पर सेवक को अपने कर्तव्य-पालन या फ़र्ज़ अदा करनेमें न चूकना चाहिए। जो उग्र विषय-भोगोंमें लुंधा बीत गई सो बीत गई ; पर जो वाकी रही है, उसका क्षण-क्षण परमात्माके भजनमें लगाना चाहिए, क्योंकि कौन जाने यह श्वास बाहर निकल कर भीतर न आवे।
किसीने कहा है :—
अरे भज हरेनाम क्रेमधाम कृणे—कृणे । वहिसरति निःश्वासे विश्वासः कः प्रवर्तने ॥
अरे जीव ! हरिके नामको क्षण-क्षण भज, हरिका नाम कल्याण का घर है। जो श्वास बाहर चला जाता है, उसके भीतर आनेका कौन विश्वास ? आवे और न आवे।
ऐसी ही बात कबीरदासने कही है :—
नव द्वारेका पींजरा, तामें पंखी पौन । रहने का आश्चर्य है, गमे अचम्मा कौन ॥
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मनुष्य शरीर नौ दरवाजोंका पींजरा है। इसमें दो दरवाजे हैं, दो आँखोंमें, दो नाकमें, दो कानोंमें, एक मुँहमें, एक गुदमें और एक गुप्त इन्द्रियमें। इस तरह नौ द्वार हैं। इसी नौ द्वारके पींजरमें पवन-रूपी पक्षी—जीव रहता है। इतने द्वार होने पर भी, वह इस पींजरे में रहता है, यही आश्चर्य की बात है। इतने द्वारोंसे निकल जानेमें क्या आश्चर्य? तात्पर्य यह कि, जीव न जाने कब इस शरीरको छोड़ भागे। जब तक जीव इस शरीरमें है, तभी तक हरि-भजन या मोक्ष लाभ करनेकी तदबीरें की जा सकती हैं। जीवके इस शरीरसे निकल भागनेके बाद, यह मौका हाथसे निकल जायगा। जीव इस शरीरको त्यागते ही कीड़े, मकोड़े, साँप, छहूँ दर, बिल्लो, कुत्ते, गवे, घोड़े प्रभृतिकी योनियें जन्म ले लेगा। उन योनियोंमें ज्ञान-शक्ति नहीं होती; अतः उन शरीरोंमें जाकर मोक्ष-लाभ हो नहीं सकता। मनुष्य-शरीरसे ही मोक्ष मिल सकती है, पर मनुष्य-शरीर बार बार नहीं मिलता। ८४ लाख योनियाँ भुगत लेने पर मनुष्य-जन्म मिलता है; अतः इस सुअवसरको हाथसे गँवाना भारी अज्ञानता है। जो इसमें चूकेगा, लाखों-करोड़ों वर्ष तक पछतावेगा अतः जब तक जीवन है, मनको सब ओर-से शोक कर, विषयोंको विषवत् त्याग कर, हरिका भजन करो।
( ३३ ) प्र०—दैराग्य पैदा होने और पापोंसे बचनेका मूल कारण क्या है?
( ५०६ )
३०—मृत्युको याद रखना। मौतको याद रखनेसे पाप नहीं होते और वैराग्य उत्पन्न होता है। श्मशान-घाट पर जानेसे ही मनुष्यके बित्तमें वैराग्य उत्पन्न हो उठता है, पर वह घर आकर सब भूल जाता है, फिर विषयोंमें लग जाता है। एक बादशाहने पाप और अन्यायसे बचनेके लिये ही अपने दरबारमें, सामने ही, एक कूब्र बनवा रखी थी, कि कूब्रको देखते रहनेसे मुझसे अन्याय-कर्म न होंगे। मृत्यु अटल है। और सब टल जायँ, पर मृत्यु टल नहीं सकती, वह अवश्य आवेगी; चाहे आज आवे और चाहे कल। जिसने जन्म लिया है, उसे मरना ही होगा। जो मरनेकी बात भूल जाते हैं, जिन्हें यह याद नहीं रहता कि, हम दो दिन या दश दिनमें मरेंगे, वही पाप-कर्म करते हैं और उन्हें ही संसारसे विरक्ति नहीं होती। जिनको हर क्षण मौत दीखती है, उनका मन विषय-भोगों या स्त्री-पुत्र धन-दौलत प्रभृतिमें नहीं लगता। संसारसे मनके हटनेका ही नाम "वैराग्य" है।
( ३४ ) प्र०—कौन किसीका भी बुरा नहीं चाहता ?
३०—जो वैराग्यवान है, जिसे संसारकी असलियतका पता है, जिसे अपने जीवनका क्षण-मरका भी भरोसा नहीं है, जो धन-यौवन, शरीर और भोगोंको नाशमान् समझता है, जो सबके अन्दर एक चेतन आत्माको देखता है, वह भूल कर भी किसीका बुरा नहीं चाहता।
( ३५ ) प्र०—दुःखाँ और सुखाँका हेतु क्या है ?
( ५०७ )
३०—संसारके भोगोंमें राग ही दुःखोंका और इनमें वैराग्य ही सुखोंका कारण है। दूसरे शब्दोंमें यों समझिये—जो संसारमें ममता रखता है, वह नाना प्रकारके दुःख भोगता है और जो संसारमें ममता नहीं रखता, संसारको त्याग देता है, वह परम सुख पाता है। वैराग्यके सिवा, संसारमें और कहीं सुख है ही नहीं, यह निश्चय है।
( ३६ ) प्र०—राग और वैराग्यका क्या कारण है ?
३०—विषयोंमें सुख मालूम होना ही रागका कारण है और इनमें दुःख मालूम होना ही वैराग्य का कारण है। जब मनुष्य धन और स्त्री पुत्र आदिसे सुखी होता है, तभी उसे इन सबमें राग या प्रीति होती है ; पर जब उसे इनसे दुःख होता है, तब उसे वैराग्य होता है। किसीको स्त्री खूब प्यार करती है, उसे अच्छी तरह आलिङ्गन करती है, उसको सेवामें हरदम खड़ी रहती है, उसके सिवा और किसी पुरुषको नहीं चाहती, तब मनुष्यका मन स्त्रीमें और भी फँसता है,—वही राग है। पर यदि स्त्री पुरुषको प्यार नहीं करती, उसके घरमें आते ही कलह करती है, कड़े शब्द कहती है, हर तरह तंग करती है, मीठी बातें नहीं बोलती, पर-पुरुषको चाहती है ; तब उसका मन स्त्रीसे हट जाता है, वह उसे बुढ़ी-मालूम होती है, अतः उसे वैराग्य हो जाता है। महाराजा भर्तृहरिको जबतक यह मालूम था कि, पिंगला मुझे खूब चाहती है, अष्ट बहर मेरा ही भजन करती है, तब तक उनका मन उसीमें फँसा