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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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महाराज भर्तृहरि जीने मनुष्यका नाटकके स्टेज-पेकूरसे खूबही अच्छा मिलान किया है। सचमुच ही मनुष्य नाटकके पेकूरका साही काम करता है।

थियेटरमें जिस तरह एक ही ऐकूर कभी बालक, कभी जवान, कभी बूढ़ा, कभी धनी, कभी निर्धन, कभी राजा, कभी फ़कीर, कभी साधु, कभी असाधु तथा कभी रोगी और निरोगी, त्यागी और अत्यागी, भोगी और योगी, गृहस्थ और संन्यासी बन कर, तरह-तरहके तमाशे दिखाता और शेषमें नाटकके पर्देके पीछे छिप जाता है ; उसी तरह मनुष्य बालक और जवान, धनी और निर्धन प्रभुतिके स्वाँग भर और दिखाकर, अन्तमें जीवन-नाटकका आखिरी सीन—बुढ़ापेका रूप—दिखा कर, यमपुरी-रूपी पर्देकी ओटमें जाकर छिप जाता है ; यानी इस दुनियासे कूच कर जाता है।

छप्पय।

छिनमें बालक होत, होत छिनहींमें यौवन।

छिन हीमें धनवन्त, होत छिन हीमें निर्धन ॥

होत छिनकमें वृद्ध, देह जर्जरता पावत।

नट ज्यों पलटत श्रंग, स्वाँग नित नये दिखावत ॥

यह जीवनाच नाना रचत, निचल्यो रहत न एकदम।

करके कनात संसारकी, कौतुक निरखत रहत यम ॥११२॥

112. A man is like a stage-actor. He is a child for a short space of time and then becomes young enjoying lustful pur-

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