वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जब आत्मा में कोई विशेष प्रयत्न होता है तब उस प्रयत्न से मन में, मन से हाथ में, और हाथ से मूसल में प्रेरणा उत्पन्न होती है तब मूसल तिरछा वा ऊपर को चलता है और प्रेरणा नहीं होती तब नहीं चलता ॥९॥ प्रश्न-अच्छा, विशेष प्रयत्न से विशेष प्रेरणा होती है सही परन्तु भारी द्रव्य के ऊपर को वा तिरछा चलने में क्या कहा गया ? उत्तर-यह कहा गया है कि- १६२-नोदनविशेषादुदसनविशेषः ॥ १० ॥ (नोदनविशेषात्) विशेष प्रेरणा से (उदसनविशेषः) विशेष उछाल होता है ॥ अर्थात् जैसी प्रेरणा होती है वैसा उछाल होता है। दूर फेंकने की प्रेरणा हो तो दूर तक उछाल होता है और अति दूर फेंकने की प्रेरणा हो तो अति दूर तक उछाल होता है। उछाल में ही तिरछा फेंकना भी अन्तर्गत समझना चाहिये ॥१०॥ प्रश्न-यदि प्रेरणा विशेष से विशेष उछलना होता है तो फिर खेलते हुए बालक के हाथ पांव चलना न होना चाहिये क्योंकि बालक में कोई प्रेरणा विशेष नहीं होती तो भी इधर उधर हाथ पांव चलते हिलते देखे जाते हैं ? उत्तर- १६३-हस्तकर्मणा दारककर्म व्याख्यातम् ॥ ११ ॥ (हस्तकर्मणा) हाथ की क्रिया से (दारककर्म) बालकों की क्रिया (व्याख्यातम्) व्याख्या की गयी ॥ कन्दुक आदि फेंकने के समय आत्मा का संयोग और प्रयत्न मन की सहायता से हाथ में पहुंचता है, उस से हाथ चलता है, उस के साथ अन्य अङ्गों में भी क्रिया उत्पन्न हो जाती है ॥ ११ ॥ प्रश्न-क्या कोई और भी ऐसा कर्म है जो विशेष प्रेरणा के बिना ही प्रेरणा मात्र से उत्पन्न हो जाता हो ? उत्तर, हां- १६४-तथा दग्धस्य विस्फोटने ॥ १२ ॥ (तथा) इसी प्रकार (दग्धस्य) फुंकी हुई वस्तु के (विस्फोटने) फोड़ने में॥ जैसे कन्दुक आदि फेंकने में बालकों के हाथ आत्मा और मन के प्रयत्न से चलते हैं और उस से अन्य अङ्गों में क्रिया उत्पन्न हो जाती है। इसी