वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १०२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद स्थान में रहता है, जैसे कि प्रजाओं में स्वतन्त्र असृत सर्वत्र वर्त्तमान है (वह अग्नि है) ॥ इसी प्रकार- “ गर्भो अस्योषधीनां गर्भोहिमवतामुत । गर्भोविश्वस्य भूतस्येमं मे अगदं कृधि ” ॥ ( अथर्व ६ । १० । ५३ । ३ ) अर्थ-( अग्नि ) ओषधियों का गर्भ है और बर्फीले पर्वतों का गर्भ है। सब भूतमात्र का गर्भ है, ( वह ) इस मेरे नैरोग्य को करे ॥ तथा- “ अग्निमूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपां रेतांसि जिन्वति ” ॥ ( साम उ० १ । ३ । ९) अर्थ-यह अग्नि ऊपर को जाने वाला द्युलोक की टाट है तथा पृथिवी और जलों के कणों को जोड़ता और पिंघलाता है ॥ इस प्रकार वेद में अन्य भी अनेक मन्त्र हैं जो जल के जमने और पिंघलने में दिव्य और लौकिक अग्नि को कारण बताते हैं ॥ १० ॥ आगे बिजली की चमक का कारण बतलाते हैं- २११-अपां संयोगाद्विभागाच्च स्तनयित्नोः ॥ ११ ॥ ( अपाम् ) तेज को गर्भ में लिये हुए जलों के ( संयोगात् ) संयोग से ( च ) और ( विभागात् ) विभाग से ( स्तनयित्नोः ) बिजली की उत्पत्ति चमक और कड़क होती है ॥ आकाश में बिजली की चमक और कड़क का कारण मेघस्थ जलों, बिजलियों और वायुओं की आपस में रगड़ है ॥ ११ ॥ आगे अग्नि और वायु की क्रियाओं की परीक्षा को पृथिवी की क्रिया की परीक्षा में अन्तर्गत होना कहते हैं- २१२-पृथिवीकर्मणा तेजःकर्म वायुकर्म च व्याख्यातम् ॥ १२॥ (पृथिवीकर्मणा) पृथिवी की क्रिया के साथ (तेजःकर्म) तेज की क्रिया (च) और (वायुकर्म) वायु की क्रिया का ( व्याख्यातम् ) व्याख्यान हो चुका समझो ॥ प्रजिस कार पृथिवी में प्रेरणा बादि से क्रिया उत्पन्न होती है इसी CC-0. Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.