भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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आकाश से जमे हुए पानी के ओले वर्षने में अथवा बर्फ़ जमाने की कलों में पानी के जमजाने में कारण दिव्य तेज का संयोग है और फिर बर्फ़ से वा ओले से गलकर पानी होजाने का कारण लौकिक गर्मी का संयोग है ॥८॥ २०९-तत्र विस्फूर्जथुलिङ्गम् ॥ ९ ॥ ( तत्र ) उस मेघमण्डल में ठहरे हुए जलों के जमाव में ( विस्फूर्जथुः ) बिजली की चमक और कड़क ( लिङ्गम् ) तेज की पहचान है ॥ यदि मेघ में दिव्यतेज का संयोग न होता तौ बिजली की चमक और कड़क न पाई जाती । पाई जाती है, इस से जाना जाता है कि मेघस्थ जलों में दिव्यतेज बिजली का संयोग है, जो जल के पतला रहने के कारण लौकिक गर्मी को बल से बाहर फेंक देता है और जल को जमा देता है, जिस से सघन जल के संयोग से पाषाणतुल्य कठिन शिला सी बन जाती हैं और वे ही टूट २ कर ओले के रूप में वर्षती हैं । यही कारण बर्फ़ की कलों में है । फिर जब बिजली का प्रभाव बर्फ़ में से निकलता जाता है और उस के स्थान में लौकिक गर्म वायु घुसता जाता है तब बर्फ़ पिघल कर फिर पतला पानी हो जाता है ॥ ९ ॥ तथा- २१०-वैदिकञ्च ॥ १० ॥ ( च ) और ( वैदिकम् ) वेद का भी यही सिद्धान्त है ॥ “ गर्भोऽस्योषधीनां गर्भोवनस्पतीनाम् । गर्भोविश्वस्य भूतस्याग्ने गर्भो अपामसि ” ॥ ( यजुः १२-३७ ) अर्थ-अग्नि ओषधियों का गर्भ है, वनस्पतियों का गर्भ है, सब भूत मात्र का गर्भ है ( और ) “ जलों का गर्भ= भीतर रहने वाला है ” ॥ इसी प्रकार- “गर्भोयो अपां गर्भोवनानां गर्भश्च स्थातां गर्भश्चरथाम् । अद्रौ चिदस्मा अन्तर्दुरोणे विशां न विश्वो अमृतः स्वाधीः” ॥ ( ऋ० १ । ७० । २ ) अर्थ-जो जलों के गर्भ में रहता है, वनस्थ वनस्पतियों के गर्भ में रहता है और स्थावर जङ्गम के गर्भ में रहता है और पहाड़ों के नीचे दुर्गम छिपे