भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 160 में से

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प्रथमोऽध्यायः ७ जल में १४ गुण हैं ॥ २ ॥ उक्त १४ जल के गुणों में से १ स्नेह को छोड़ कर शेष १३ और १४ वां गन्ध; ये १४ पृथिवी में गुण हैं। बुद्धि आदि ६ (बुद्धि १ सुख २ दुःख ३ इच्छा ४ द्वेष ५ और प्रयत्न ६) और संख्यादि ५ सब ११ तथा १२ भावना ॥ ३ ॥ १३ धर्म १४ अधर्म; ये १४ गुण आत्मा (जीवात्मा) के हैं। संख्या आदि ५ काल और दिशा के गुण हैं। तथा संख्यादि ५ और ६ शब्द, ये ६ आकाश के गुण हैं ॥ ४ ॥ संख्यादि ५ बुद्धि ६ इच्छा ७ और यत्न ८ ये ईश्वर में गुण हैं। १ परत्व २ अपरत्व ३-७ तक संख्यादि पांच और ८ वां वेग; ये मन में गुण हैं ॥ ५ ॥ कोई लोग शक्ति को भी गुण कहते हैं, कोई उस को एक प्रकार का द्रव्य कहते हैं। परन्तु वैशेषिक के अपने मत में तो जिस पदार्थ की जो शक्ति है, वह उस का स्वरूप ही है, भिन्न कुछ नहीं ॥ कोई लोग लघुत्व को एक पृथक् गुण बताते हैं, यह ठीक भी जान पड़ता है, क्योंकि जैसे संयोग और विभाग एक दूसरे के विरोधी समझ कर पृथक् २ गिने गये, इसी प्रकार गुरुत्व का विरोधी लघुत्व (भारी का विरोधी हलका) भी पृथक् गिनाने योग्य जान पड़ता है, परन्तु और गहरी बुद्धि से विचार करें तो लघुत्व (हलकापन) भी गुरुत्व के अन्तर्गत है, क्योंकि हलकी से हलकी वस्तु में भी कोई बोझ (भारीपन वा गुरुत्व) अवश्य है, तब गुरुत्व ही तो अपेक्षाकृत लघुत्व भी हुआ, भिन्न नहीं ॥ तथा मृदुत्व=नर्मी, कठिनत्व=सख़्ती=कड़ापन, ये दोनों गुण इस लिये नहीं गिनाये गये कि अवयवों के संयोगविशेषरूप हैं, पृथक् नहीं ॥ शूरता, उदारता, दया, चातुर्य, उद्यता इत्यादि अन्य गुण भी प्रयत्नादि के अन्तर्गत होने से पृथक् नहीं गिनाये गये। क्योंकि बलवान् शत्रु के भी पराजय करने को यत्न करना शूरता है, जो यत्न के अन्तर्गत हुई। सदा सन्मार्ग में रहने वाली बुद्धि ही उदारता है। पराये दुःख दूर करने की इच्छा ही दया है। तत्त्व के भीतर प्रवेश करने वाली बुद्धि ही चातुर्य है। अपने में उद्धत की बुद्धि ही उद्यता है। इस प्रकार देखा जावे तो शूरतादि सब प्रय- त्नादि से पृथक् गिनाने योग्य नहीं ॥ ६ ॥ अब कर्म के विभाग कहे जाते हैं- ७-उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि ॥ ७ ॥

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