भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चमाऽध्याय २ आन्हिक १०७ (गुणैः) गुणों से (दिक् ) दिशा का (व्याख्याता) व्याख्यान हो चुका ॥ जिस प्रकार अमूर्त्त होने से कर्मों का समवायी कारण गुण नहीं होते, इसी प्रकार अमूर्त्त होने से पूर्वादि दिशाऐं भी सूर्योदयादि क्रियाओं का समवायी कारण नहीं हैं किन्तु क्रियाओं का आधार होने से उपचार की रीति पर उन में क्रिया कही जाती है, वास्तव में नहीं । जैसे 'चटाई पर भोजन करता हूं' इस कथन में यद्यपि चटाई भोजन क्रिया का आधार है, परन्तु समवायी कारण नहीं ॥ २५ ॥ तथा- २२६-कारणेन कालः ॥ २६ ॥ (कारणेन) निमित्त कारण होने से (कालः) काल का व्याख्यान भी हो चुका ॥ अर्थात जिस प्रकार वस्त्र की उत्पत्ति में सूत के डोरे तो समवायी कारण हैं परन्तु तुरी वेमादि अथवा तन्तुवाय=जुलाहा समवायी कारण नहीं किन्तु निमित्त कारण है, इसी प्रकार काल भी किसी क्रिया का समवायी कारण नहीं किन्तु निमित्त कारण है, इस लिये उस को सक्रिय नहीं कह सकते ॥२६॥ पञ्चमाध्याय के इस द्वितीय आन्हिक में पृथिवी आदि के कर्म और प्रसङ्गवश अन्यद्वार का वर्णन किया गया ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥ इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे पञ्चमः कर्माध्यायश्च समाप्तः ॥ ५ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.