वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंओ३म् अथ षष्ठोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् इस वैशेषिकदर्शन में प्रथमाध्याय के तृतीय सूत्र में कहा गया था कि 'धर्म का प्रतिपादक होने से वेद को प्रामाणिकता है' इस लिये कर्म की परीक्षा के पश्चात् वेद का प्रामाण्य सिद्ध करने के लिये कहते हैं कि- २२७-बुद्धिपूर्वा* वाक्यकृतिर्वेदे ॥ १ ॥ (वेदे) वेद में (वाक्यकृतिः) वाक्यरचना (बुद्धिपूर्वा) बुद्धिपूर्वक है अर्थात् वेदों में कोई वाक्य ऐसा नहीं है, जो बुद्धि के विपरीत हो, जैसा कि मनुष्यों की वाक्यरचना में कभी २ हो जाता है ॥ १ ॥ २२८-ब्राह्मणे संज्ञाकर्म सिद्धिलिङ्गम् ॥ २ ॥ (ब्राह्मणे) ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थ में (संज्ञाकर्म) संज्ञापूर्वक कर्मानुष्ठान (सिद्धिलिङ्गम्) प्रथम सूत्रोक्त विषय की सिद्धि का चिन्ह है। अर्थात् ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थों में वेदोक्त पदार्थों की संज्ञा जानकर जो कर्मानुष्ठान बताया है वह कर्मानुष्ठान और उस का ठीक २ फल इस बात की सिद्धि में पहचान है कि वेदों की वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक है ॥ २ ॥ और भी- २२९-बुद्धिपूर्वो ददातिः ॥ ३ ॥ (ददातिः) दानक्रिया (बुद्धिपूर्वः) बुद्धिपूर्वक पाई जाती है ॥ वेदों में जिस प्रकार दान का वर्णन है, उस से पाया जाता है कि वेदों की वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक है। वेद के प्रकाशक ईश्वर ने उस को बुद्धिपूर्वक प्रकाशित किया है। जैसेः- दक्षिणाश्वं दक्षिणा गां ददाति दक्षिणा चन्द्रमुत यद्धि- रण्यम्। दक्षिणाऽन्नं वनुते यो न आत्मा दक्षिणां वर्म कृणुते विजानन् ॥ ऋ० । १० । १०७ । ७ ॥
- किसी २ पुस्तक में वाक्प्रकृति और किसी २ में वाक्कृति पाठ पाया जाता है, परन्तु अर्थ सब का एक है ॥