भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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छष्ठाऽध्याय १ आन्हिक १८५ इस में वर्णन किया गया है कि दान करने से घोड़ा, गौ, आदि पशु, चांदी सोना आदि रत्न और अन्न जिस से हमारा जीवन है, मिलता है। इस लिये बुद्धिमान् मनुष्य दान=दक्षिणा को अपनी रक्षा के लिये कवचरूप से धारण करता है ॥ यह समस्त सूक्त दान के माहात्म्य में कथन किया गया है, जिस के पढ़ने से वेदों के प्रकाशक ईश्वर की चमत्कारिणी बुद्धिपूर्वक रचना का पता लगता है ॥ ३ ॥ और- २३०-तथा प्रतिग्रहः ॥ ४ ॥ (तथा) इसी प्रकार (प्रतिग्रहः) किये हुए दान को ग्रहण करने [का वर्णन भी बुद्धिपूर्वक है ] ॥ ४ ॥ २३१-आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् ॥ ५ ॥ (आत्मान्तरगुणानाम्) अन्य आत्मा के गुणों को (आत्मान्तरे) अन्य आत्मा में (अकारणत्वात्) कारण न होने से ॥ वेद में दान का फल दाता को और प्रतिग्रह का फल लेने वाले को बतलाया गया है और यही बुद्धिपूर्वक है क्योंकि एक आत्मा के अनुष्ठान किये हुये कर्म का फल दूसरे आत्मा को नहीं मिलना चाहिये किन्तु दाता को दान का फल और प्रतिग्रहीता को ग्रहण का फल मिलना चाहिये क्योंकि दाता दान क्रिया का कर्त्ता है और ग्रहीता ग्रहण क्रिया का कर्त्ता है ॥ ५ ॥ २३२-तद् दुष्टभोजने न विद्यते ॥ ६ ॥ (तत्) वह फल (दुष्टभोजने) दुष्टभोजन में (न) नहीं (विद्यते) है ॥ यदि दाता दुष्टभोजन का दान करे और प्रतिग्रह लेने वाला दुष्ट अन्न का भोजन करे तो वेद कहता है कि उन दोनों को शास्त्र में बताया फल नहीं होगा ॥ ६ ॥ प्रश्न-दुष्टभोजन किसे कहते हैं ? उत्तर- २३३-दुष्टं हिंसायाम् ॥ ७ ॥ (हिंसायाम्) हिंसा में (दुष्टम्) भोजन दुष्ट होता है ॥ किसी प्राणी को दुःख देकर वा मारकर जो भोजन सिद्ध किया जावे वा जो भोजन दिया जावे वे दोनों भोजन दुष्ट हैं । चोरी से वा अन्याय से अथवा सब से बड़े अन्याय=प्राण लेकर जो दाता दान करता है और जो प्रतिग्रहीता उस दान को लेता है वे दोनों ही वेदोक्त फल नहीं पाते ॥ ७ ॥