वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठाऽध्याय. १ .आह्निक १११ (तथा) उसी प्रकार (विरुद्धानाम्) धर्मविरो धियों का (त्यागः) प्रतिग्रह त्याग देना कहा है ॥ १३ ॥ २४०--हीने परे त्यागः ॥ १४ ॥ (परे) यदि दाता (हीने) धर्मानुष्ठान में अधम हो तो (त्यागः) दान लेना त्याग दे ॥ १४ ॥ २४१-समे आत्मत्यागः परत्यागो वा ॥ १५ ॥ (समे) यदि दाता मध्यम धार्मिक हो तो (आत्मत्यागः) चाहे प्रति- ग्रहीता अपने ग्राह्य पदार्थ का त्याग कर दे (वा) अथवा (परत्यागः) दाता त्याग कर देवे ॥ १५ ॥ और- २४२-विशिष्टे आत्मत्याग इति* ॥ १६ ॥ (विशिष्टे) यदि दाता अपने से उत्तम धार्मिक हो तो (आत्मत्यागः) प्रतिग्रहीता अपने आप त्याग देवे ॥ हम को बड़ा आश्चर्य होता है कि शङ्कर मिश्रादि टीकाकारों ने और उन की देखा देखी वर्तमान काल के संस्कृत और भाषा के टीकाकारों ने १४ से १६ तक सूत्रों के अर्थ में दान और प्रतिग्रह के प्रकरण से विरुद्ध शत्रु के मारने और न मारने का अर्थ अकारण क्यों उपजा लिया ? ॥ १६ ॥ इति षष्ठाध्यायस्य प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥ ─:*:─ अथ द्वितीयमाह्निकम् २४३-दृष्टादृष्टप्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोजनमभ्युदयाय ॥१॥ (दृष्टादृष्टप्रयोजनानाम्) दृष्ट और अदृष्ट प्रयोजन वाले कर्मों में (दृष्टाभावे) दृष्ट के अभाव में (प्रयोजनम्) प्रयोग = अनुष्ठान (अभ्युदयाय) परलोक के सुख के लिये है ॥ अर्थात् वेद में दो प्रकार के कर्मानुष्ठान हैं। कुछ कर्मों का फल दृष्ट है, जो इस ही जन्म में होता देखा जाता है और दूसरे कर्मों का फल अदृष्ट है, जो जन्मान्तर में मिलता है, उसी के लिये ऐहिकफल के अभाव में अनुष्ठान बतलाये गये हैं ॥ १ ॥ जैसेः-
- कितनी ही पुस्तकों में 'इति' शब्द नहीं है, परन्तु यह शब्द आह्निक की समाप्ति में और अर्थ की समाप्ति में होने से सार्थक जान पड़ता है ॥