भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 160 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ११२ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद २४४-अभिषेचनोपवास, ब्रह्मचर्य, गुरुकुलवास, वानप्रस्थ, यज्ञ, दान, प्रोक्षण, दिक्, नक्षत्र, मन्त्र, काल, नियमाश्चादृष्टाय ॥ २ ॥ (अभि०-नियमाः) मन्त्रपूर्वक सिर पर जल छिड़कना=अभिषेचन, भोजन न करना=उपवास, भूमिशयनादि ब्रह्मचारी के नियमों का पालन=ब्रह्मचर्य, साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़ने के लिये गुरु के समीप रहना=गुरुकुलवास, गृहस्थ को त्यागकर वन में रहकर वेदोक्त कर्म करना=वानप्रस्थ, अग्निहोत्रादि कर्म= यज्ञ, गौ आदि पदार्थों का सत्पात्रों को देना=दान, यज्ञ के स्रुवादि पदार्थों को जल से शुद्ध करना=प्रोक्षण, पूर्वादि दिशाओं में नियतरूप से यजमानादि का बैठना=दिक्, पुष्य आदि विहित नक्षत्रों में संस्कारादि कर्म करना= नक्षत्र, "ओं भूर्भुवः स्वः द्यौरिव भूम्ना०" इत्यादि मन्त्र पढ़कर अग्न्याधानादिकर्म करना=मन्त्र, उत्तरायण आदि समय विशेष में कर्म करना=काल, ये नियम (अदृष्टाय) अदृष्ट फल के लिये (च) और दृष्ट फल के लिये हैं॥ २॥ तथा- २४५-चातुराश्रम्यमुपधा अनुपधाश्च ॥ ३ ॥ (चातुराश्रम्यम्) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास इन चार आश्रमों में विहित कर्म का अनुष्ठान (उपधाः) उपधायें (च) और (अनु- पधाः) अनुपधायें भी विहित हैं॥ उपधा और अनुपधा का अर्थ अगले सूत्र में आचार्य ने स्वयम् कहा है ॥ ३॥ यथा- २४६-भावदोष उपधाऽदोषोऽनुपधा ॥ ४ ॥ (भावदोषः) श्रद्धा का दोष (उपधा) उपधा कहाता है (अदोषः) श्रद्धा में दोष न होना (अनुपधा) अनुपधा कहाता है ॥ ४ ॥ २४७-यदिष्टरूपरसगन्धस्पर्शं प्रोक्षितमभ्युक्षितञ्च तच्छुचि ॥५॥ (यत्) जो पदार्थ (इष्टरूपरसगन्धस्पर्शम्) मनभावने रूप, रस, गन्ध और स्पर्श वाला, (प्रोक्षितम्) मन्त्रपूर्वक जल से शुद्ध किया हुआ (च) और (अभ्युक्षितम्) विना मन्त्र के धोया हुआ है (तत्) वह (शुचि) शुद्ध है ॥५॥और- २४८-अशुचीति शुचिप्रतिषेधः ॥ ६ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.