वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठाध्याय २ आह्निक । १९३ ( शुचि प्रतिषेधः ) जो शुद्ध न हो, उस को ( अशुचि ) अशुद्ध ( इति ) ऐसा कहते हैं ॥ ६ ॥ और— २४६-अर्थान्तरञ्च ॥ ७ ॥ ( अर्थान्तरम् ) विधान किये हुए पदार्थ से भिन्न दूसरा पदार्थ ( च ) भी अशुद्ध है ॥ जैसे जिस वर्ण को जिस सूत का यज्ञोपवीत धारण करना कहा है, उसी के लिये वह शुद्ध है किन्तु एक के लिये दूसरे का अशुद्ध है ॥ ७ ॥ प्रश्न-तो क्या शुचिभोजन सब किसी से लेकर भोज्य है ? उत्तर-नहीं, क्योंकि— २५०-अयतस्य शुचिभोजनादभ्युदयो न विद्यते नियमाभावात् ॥ ८ ॥ ( नियमाभावात् ) नियम के न रखने से ( अयतस्य ) अहिंसादि यमों के पालन न करने वाले का (शुचिभोजनात्) शुद्ध भोजन करने से (अभ्युदयः) लोक परलोक का कल्याण ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता ॥ जो पुरुष अहिंसादि व्रतों का पालन नहीं करता उस म्लेच्छादि का दिया हुवा शुद्ध भोजन भी संसर्गदोष से दूषित है, इस लिये कल्याणकारी नहीं ॥ ८ ॥ २५१—विद्यते वार्थान्तरत्वाद् यमस्य ॥ ९ ॥ ( वा ) अथवा ( यमस्य ) अहिंसादि यम का ( अर्थान्तरत्वात् ) अन्य अर्थ होने से (विद्यते ) शुचिभोजन से लोक परलोक का कल्याण होता भी है ॥ पूर्व सूत्र में अहिंसादि नियमों से रहित म्लेच्छादि के दिये सब प्रकार के संसर्ग का शुद्धभोजन में भी बचाव कहा था, इस सूत्र में दूसरा पक्ष करते हैं कि अथवा यदि यह विचार किया जाय कि यम=अहिंसादि का पालन दूसरी बात है और शुचि भोजन दूसरी बात है, इस लिये जब हिंसकादि का दिया भी शुचिभोजन हिंसादिदोषदूषित न हो तो लोक परलोक के अभ्युदय का बाधक नहीं है ॥ ९ ॥ और भी एक कारण है किः— २५२--असति चाभावात् ॥ १० ॥ (असति) शुद्ध भोजन में हिंसादि दोष के न होने पर (च) और (अभावात्) हिंसादि दोष न होने से लोक परलोक के कल्याण में बाधा नहीं ॥ १० ॥ कर्म की परीक्षा हो चुकी । अब दोष की परीक्षा का आरम्भ करते हैंः— १५ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.