भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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११४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद २५३--सुखाद्रागः ॥ ११ ॥ ( सुखात् ) सुख से ( रागः ) आसक्ति वा फंसना होता है ॥ इसी से यह भी समझना चाहिये कि दुःख से द्वेष होता है ॥ ११ ॥ २५४--तन्मयत्वाच्च ॥ १२ ॥ ( तन्मयत्वात् ) तन्मय हो जाने से ( च ) भी राग और द्वेष होते हैं ॥ निरन्तर सुख ही सुख का ध्यान करते रहने से मन सुखिया होजाता है तब उस को सुख में राग होजाता है, इसी प्रकार निरन्तर दुःख ही दुःख का ध्यान करते रहने से मन दुखिया होजाता है तब उस से द्वेष होता है ॥ १२ ॥ २५५--अदृष्टाच्च ॥ १३ ॥ ( अदृष्टात् ) पूर्व जन्म के प्रारब्ध कर्मों से ( च ) भी राग और द्वेष होते हैं ॥ १३ ॥ २५६-जातिविशेषाच्च ॥ १४ ॥ ( जातिविशेषात् ) विशेष जाति से ( च ) भी राग और द्वेष होते हैं ॥ जैसे मनुष्य जाति का दुग्ध, फल, पुष्पादि से राग तथा नकुल का सर्प से और घोड़े का भैंसे से जातिकृत द्वेष होता है ॥ १४ ॥ २५७-इच्छाद्वेषपूर्विका धर्माधर्मप्रवृत्तिः ॥ १५ ॥ ( धर्माधर्मप्रवृत्तिः ) धर्म और अधर्म में प्रवृत्ति ( इच्छाद्वेषपूर्विका ) राग पूर्वक और द्वेषपूर्वक होती है ॥ १५ ॥ २५८-तत्सयोगो विभागः ॥ १६ ॥ (ततः) उस धर्माधर्म प्रवृत्ति से (संयोगः) जन्म (विभागः) और मृत्यु होते हैं ॥ १६ ॥ २५९-आत्मर्म्मसु मोक्षो व्याख्यातः ॥ १७ ॥ (आत्मकर्मसु) आध्यात्मिककर्मों के करने पर (मोक्षः) मोक्ष ( व्याख्यातः ) वेद में कहा गया है ॥ १७ ॥ इति षष्ठाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥ इति श्री तुलसीरामस्वामीकृते वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे श्रौतधर्माध्यायः षष्ठः समाप्तः ॥ ६ ॥