वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ अथ सप्तमोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् द्रव्यों और कर्मों की परीक्षा हो चुकी तथा बीच में श्रौतधर्मों की भी परीक्षा की गई । अब क्रमानुसार सप्तमाध्याय में गुणों की परीक्षा करेंगे, इस लिये गुण जो प्रथमाध्याय प्रथम आह्निक के छठे सूत्र में कहे थे, वह प्रकरण अब बहुत दूर हो गया है, इस लिये आचार्य उस दूरस्थ प्रकरण को स्मरण कराते हैं कि- २६०-उक्ता गुणाः ॥ १ ॥ ( गुणाः ) गुण ( उक्ताः ) १।६ में कहे गये थे ॥ १ ॥ २६१-पृथिव्यादिरूपरसगन्धस्पर्शाः द्रव्यानित्यत्वादनित्याश्च ॥ २ ॥ ( पृथिव्यादि-स्पर्शाः ) पृथिवी आदि द्रव्यों के रूप, रस, गन्ध और स्पर्श, गुण ( द्रव्यानित्यत्वात् ) द्रव्य की अनित्यता से ( अनित्याः ) अनित्य ( च ) भी हैं ॥ अर्थात् अनित्य पृथिवी का गुण गन्धादिक भी अनित्य है, इसी प्रकार अनित्य अग्नि का गुण रूप भी अनित्य है । अनित्य जल का गुण रस भी अनित्य है । अनित्य वायु का गुण स्पर्श भी अनित्य है ॥ २ ॥ पृथिवी आदि द्रव्य कार्य कारण भेद से अनित्य और नित्य भी होते हैं । उन में से अनित्य द्रव्यों के गुणों को इस सूत्र में अनित्य कहा गया । आगे नित्य द्रव्यों के गुणों को नित्य समझना चाहिये सो कहते हैं:- २६२-एतेन नित्येषु नित्यत्वमुक्तम् ॥ ३ ॥ ( एतेन ) पूर्वोक्त कथन से ही ( नित्येषु ) नित्य द्रव्यों में (नित्यत्वम्) गुणों की भी नित्यता ( उक्तम् ) कही गई ॥ ३ ॥ २६३-अप्सु तेजसि वायौ च नित्या द्रव्यनित्यत्वात् ॥ ४ ॥