वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (द्रव्यनित्यत्वात्) द्रव्य के नित्य होने से (अप्सु) जल के परमाणुओं में (तेजसि) अग्नि के परमाणुओं में (च) और (वायौ) वायु के परमाणुओं में (नित्याः) गुण भी नित्य हैं ॥ जल के परमाणुओं में रस, रूप और स्पर्श; अग्नि के परमाणुओं में रूप और स्पर्श, वायु के परमाणुओं में स्पर्श गुण नित्य हैं, ऐसा शङ्कर मिश्रादि व्याख्यान करते हैं परन्तु परमाणु रूप नित्यद्रव्यों में अनित्यद्रव्यों के गुण संभव नहीं, इस लिये हमारे मत में सूत्र का यही अभिप्राय है कि जलपरमाणुओं में रस, अग्निपरमाणुओं में रूप और वायुपरमाणुओं में स्पर्श; केवल यही नित्य गुण हैं ॥ इस सूत्र में पृथिवी के परमाणुओं का गन्ध गुण नित्य कहने से न जाने क्यों छोड़ दिया गया, इस विषय पर प्रायः सभी टीकाकार बिना किसी तर्क के चुपचाप इस शङ्का की ओर ध्यान नहीं लाये ॥ ४ ॥ २६४-अनित्येष्वनित्या द्रव्याऽनित्यत्वात् ॥ ५ ॥ (द्रव्यानित्यत्वात्) द्रव्यों के अनित्य होने से (अनित्येषु) अनित्य कार्य द्रव्यों में (अनित्याः) गुण भी अनित्य हैं ॥ ५ ॥ २६५-कारणगुणपूर्वकाः पृथिव्यां पाकजाः ॥ ६ ॥ (पृथिव्यां) कार्य रूप पृथिवी में (पाकजाः) अन्य द्रव्यों के साथ पकने से उत्पन्न हुए रस रूप और स्पर्श गुण (कारणगुणपूर्वकाः) अपने २ कारणों के गुणों से आये हुए होते हैं ॥ पृथिवी में केवल गन्ध गुण तो अपना है और रूपादि गुण अग्नि आदि अन्य द्रव्यों के साथ पकने से उत्पन्न होजाते हैं ॥ ६ ॥ क्योंकि- २६६-एकद्रव्यत्वात् ॥ ७ ॥ प्रत्येक गुण का केवल एक ही द्रव्य होने से ॥ ७ ॥ २६७-अणोर्महतश्चोपलब्ध्यनुप- लब्धी नित्ये व्याख्याते ॥ ८ ॥ (अणोः) अणु की (च) और (महतः) महत् की (उपलब्ध्यनुपलब्धी) अनुपलब्धि और उपलब्धि (नित्ये) नित्य (व्याख्याते) कहीं समझनी चाहिये॥