वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७ अध्याय १ आह्निक १९९ २७७–अनित्येऽनित्यम् ॥ १८ ॥ (अनित्ये) अनित्य द्रव्य में (अनित्यम्) यह चारों परिमाण अनित्य होते हैं ॥ १८ ॥ और– २७८–नित्ये नित्यम् ॥ १९ ॥ (नित्ये) नित्य द्रव्य में (नित्यम्) परिमाण भी नित्य होते हैं ॥ १९॥ उदाहरण– २७९–नित्यं परिमण्डलम् ॥ २० ॥ (परिमण्डलम्) परमाणु का परिमाण (नित्यम्) नित्य है ॥ जैसे परमाणु द्रव्य नित्य है, वैसे उस का परिमाण भी नित्य है ॥ २०॥ प्रश्न–इस का कैसे निश्चय हो कि परमाणु में भी परिमाण है ? उत्तर– २८०--अविद्या च विद्यालिङ्गम् ॥ २१ ॥ (अविद्या) अविद्या (च) भी (विद्यालिङ्गम्) विद्या की पहचान है ॥ अविद्या से विद्या पहचानी जाती है क्योंकि अविद्या में विद्या का निषेध है। इसी प्रकार स्थूल पदार्थों के महत्त्व और दीर्घत्व परिमाण से परमाणु का अणुत्व और ह्रस्वत्व भी पहिचाना जाता है ॥ २१ ॥ परमाणु का नित्य परिमाण उदाहरण में दिया गया, अब आगे पर- मात्मा और आकाश का महत्त्व परिमाण नित्य है, यह दूसरा उदाहरण देते हैं– २८१–विभवान्महानाकाशस्तथा चात्मा ॥ २२ ॥ (विभवात्) व्यापक होने से (आकाशः) आकाश (च) और (आत्मा) परमात्मा (महान्) महत्त्वपरिमाणयुक्त हैं ॥ व्यापक होने से नित्य द्रव्य आकाश और परमात्मा का महत्त्व परिमाण भी नित्य है ॥ २२ ॥ २८२–तदभावादणु मनः ॥ २३ ॥ (तदभावात्) सर्वव्यापक न होने से (मनः) मन वाला आत्मा– जीवात्मा (अणु) अणुत्व परिमाण वाला है ॥ शङ्कर मिश्रादि टीकाकार इस सूत्र का यह अर्थ करते हैं कि "व्यापक न होने से मन अणु है"। यह कथन सर्वशास्त्रविरुद्ध है क्योंकि मन लिङ्ग शरीर का एक अवयव है, जैसा कि “सप्तदशैकं लिङ्गम् । सांख्य ३। ९” इस