भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 160 में से

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१२७ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद सूत्र में १७ वा १८ तत्त्वों का लिङ्ग शरीर, कहा है और वे सभी तत्त्व उत्पत्ति- मान् हैं और कोई उत्पत्ति-वाला पदार्थ न अणु हो सकता, न महान् हो सकता किन्तु परमाणु और जीवात्मा अणु हैं और परमात्मा महान् है, ये ही पदार्थ अजन्मा हैं । शेष सब जन्म हुए होने से मध्यमपरिमाण हैं । छान्दोग्य ६।५।४ में लिखा है कि "अन्नमयं हि सोम्य मनः" अर्थात् मन अन्न से बनता है, तब वह अणु कैसे हो सकता है ? मुण्डक २।१।३ में भी लिखा है कि "एतस्मात् प्रजायन्ते मनः सर्वेन्द्रियाणि च" । इस में भी मन की उत्पत्ति लिखी है और उत्पत्ति वाला कोई पदार्थ न अणु हो सकता, न नित्य हो सकता । इस लिये इस सूत्र में 'मनः' शब्द से मन का सहचारी जीवात्मा ही समझना चाहिये ॥ २३ ॥ २८३—गुणैर्दिग्व्याख्याता ॥ २४ ॥ (गुणैः) गुणों के साथ (दिक्) दिशा (व्याख्याता) व्याख्यात हो चुकी ॥ परत्व अपरत्व आदि गुणों के समान दिशा का भी व्याख्यान समझना चाहिये ॥ २४ ॥ २८४—कारणेन कालः ॥ २५ ॥ (कारणेन) कारण से (कालः) काल का व्याख्यान होगया ॥ जितने पदार्थ उत्पत्तिमान् हैं सब की उत्पत्ति में काल निमित्त कारण है, इस लिये समझना चाहिये कि काल सामान्य विभु पदार्थ है ॥ २५ ॥ इस प्रथम आह्निक में रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, चार प्रकार का परिमाण, गुणों का स्मरण कराकर परीक्षापूर्वक वर्णन किया गया ॥ इति सप्तमाध्यायस्य प्रथमाह्निकम् —:०*०:— अथ द्वितीयमाह्निकम् परिमाण की परीक्षा कर चुके, अब संख्या की परीक्षा करना चाहते हैं । इस लिये प्रथम संख्या को रूपादि गुणों से भिन्नवस्तुता सिद्ध करते हैं कि- २८५—रूपरसगन्धस्पर्शव्यतिरेकादर्थान्तरमेकत्वम् ॥ १ ॥ (रूपरसगन्धस्पर्शव्यतिरेकात्) रूप, रस, गन्ध और स्पर्शादि से अति- रिक्त होने से (एकत्वम्) एकत्व आदि संख्या (अर्थान्तरम्) अन्य वस्तु है ॥

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