वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तमाऽध्याय २.आह्निक १२१ रूपादिक उपलक्षणमात्र हैं, उन से अन्य गुणों का भी ग्रहण करना चाहिये । एकत्व भी उपलक्षणमात्र है, उस से द्वित्व त्रित्व आदि का भी ग्रहण करना चाहिये । एक घट, दो मठ, तीन वस्त्र, चार पुस्तक, पांच तत्त्व, छः ऋतु, सात छन्द, जिस प्रकार संख्यावान् हैं, इसी प्रकार एक ब्रह्म, एक आकाश, चार दिशा, बहुत जीव, इत्यादि प्रकार से निर्गुण पदार्थों में भी संख्या रहती है, इसी लिये संख्या एक भिन्न गुण हैं, जो रूपादि गुणों के अन्त- र्गत नहीं हो सकती ॥१॥ और भी- २८६-तथा पृथक्त्वम् ॥२॥ ( तथा ) इसी प्रकार ( पृथक्त्वम् ) पृथक्त्व गुण भी रूपादि से भिन्न है ॥ जैसे एक घट दूसरे घट से पृथक् है तब घट का एक होना और दूसरे घट से पृथक् होना रूपादि गुणों के अन्तर्गत नहीं हो सकता ॥ २ ॥ २८७-एकत्वैकपृथक्त्वयोरेकत्वैकपृथक्त्वा- भावोऽणुत्वमहत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ ३ ॥ ( एकत्वैकपृथक्त्वयोः ) एकत्व और एकपृथक्त्व में ( एकत्वैकपृथक्त्वाभावः ) दूसरे एकत्व और दूसरे एकपृथक्त्व का अभाव है, जो ( अणुत्वमहत्त्वाभ्याम् ) अणुत्व और महत्त्व के साथ व्याख्यातः) वर्णन किया गया-एकत्व में दूसरा एकत्व और पृथक्त्व में दूसरा पृथक्त्व नहीं होता। जैसे अणुत्व में दूसरा अणुत्व और महत्त्व में दूसरा महत्त्व नहीं होता, जिस का व्याख्यान ७।१।१४ में हो चुका है ॥३॥ यदि कहो कि उत्क्षेपणादि कर्मों और रूपादि गुणों में द्वित्वादि संख्या न सही परन्तु सब को मिलाकर एकत्व तो है ? तो उत्तर- २८८-निःसंख्यत्वात्कर्मगुणानां सर्वैकत्वं न विद्यते ॥ ४ ॥ ( कर्मगुणानाम् ) कर्मों और गुणों के (निःसंख्यत्वात् ) संख्यारहित होने से (सर्वैकत्वम् ) सब का एक होना ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता ॥ कर्म और गुणों को मिलाकर सब को एकत्व संख्या में भी अन्तर्गत नहीं कर सकते क्योंकि कर्म और गुण संख्या से भिन्न पदार्थ हैं ॥ ४॥ यदि कहो कि कर्मों और गुणों में संख्या का व्यवहार तो पाया जाता है, जैसा कि एक काम तुम करो, दूसरा मैं करता हूं, एक रूप को तुम देखो, दूसरे को मैं देखता हूं, इत्यादि ? तो उत्तर- १६ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection