वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद २८९-भ्रान्तं तत्॥ ५ ॥ (तत्) वह (भ्रान्तम्) भ्रान्तियुक्त है ॥ कर्म और गुण में रहने वाली संख्या को कर्मरूप वा गुणरूप समझना भ्रान्ति है किन्तु वास्तव में जैसे द्रव्यों में रहने पर भी गुण स्वयं द्रव्यरूप नहीं किन्तु भिन्न पदार्थ हैं, ऐसे ही संख्या को भी समझना चाहिये ॥ ५ ॥ २९०-एकत्वाभावाद्भक्तिस्तु न विद्यते ॥ ६ ॥ (एकत्वाभावात्) एकत्व न होने से (तु) तो (भक्तिः) समान धर्म (न) नहीं हो सकता ॥ अर्थात् यदि संख्या को सर्वत्र भ्रान्त मानकर केवल भाक्त जानें तो भी ठीक नहीं क्योंकि यदि संख्या कोई मुख्य पदार्थ न हो तो उस का भाक्त= गौण प्रयोग भी न होसके परन्तु होता है, इस लिये संख्या रूपादि से भिन्न एक गुण है ॥ ६ ॥ २९१-कार्यकारणयोरेकत्वैकपृथक्त्वाभावा- देकत्वैकपृथक्त्वं न विद्यते ॥ ७ ॥ (कार्यकारणयोः) कार्य और कारण में (एकत्वैकपृथक्त्वाभावात्) एकत्व और एकपृथक्त्व न होने से (एकत्वैकपृथक्त्वम्) एकत्व और एकपृथक्त्व (न) नहीं (विद्यते) है ॥ अर्थात् यह आवश्यक नहीं कि कार्य में एकत्व संख्या हो तो कारण में भी एकत्व हो तथा यह भी आवश्यक नहीं कि कार्य में एकपृथक्त्व हो तो कारण में भी एकपृथक्त्व ही हो क्योंकि कार्य और कारण में एकत्व और एकपृथक्त्व नियत नहीं ॥ हो सकता है कि कारणों में बहुत्व हो और कार्य में एकत्व हो तथा यह भी हो सकता है कि कारण में एकत्व हो और कार्यों में बहुत्व हो। जैसे एक मृत्तिकारूप कारण से अनेक घटरूप कार्य होते हैं तथा अनेक धागे रूप कारणों से एक वस्त्ररूप कार्य भी होता है। इसी प्रकार एकपृथक्त्व भी समझो ॥ ७ ॥ तथा- २९२-एतदनित्ययोर्व्याख्यातम् ॥ ८ ॥