वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमाध्याय. २ आन्हिक १२५ ( एतद् ) यही नियम ( अनित्ययोः) अनित्य एकत्व और एकपृथक्त्व में ( व्याख्यातम् ) व्याख्यात समझो ॥ नित्य द्रव्य में एकत्व और एकपृथक्त्व भी नित्य होते हैं और अनित्य द्रव्य में अनित्य होते हैं ॥ ८ ॥ २६३-अन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजश्च संयोगः ॥ ९ ॥ अब संयोग की परीक्षा करते हैं जो क्रमप्राप्त है-( अन्यतरकर्मजः ) दो में से किसी एक के कर्म से उत्पन्न होने वाला ( उभयकर्मजः ) दोनों के कर्म से उत्पन्न होने वाला ( च ) और ( संयोगजः) संयोग से उत्पन्न होने वाला ( संयोगः ) संयोग होता है ॥ भिन्न २ दो पदार्थोंका परस्पर मिलजाना=संयोग कहाता है। वह संयोग तीन प्रकार का होता है। जैसे:- १-दो पदार्थों में से एक में क्रिया होने तो एक की क्रिया से दूसरे के साथ संयोग हो जायगा ॥ २-दोनों पदार्थों में क्रिया होने से दोनों का आपस में संयोग हो जायगा॥ ३-संयोग से भी संयोग उत्पन्न होता है। जैसे वृक्ष और अङ्गुली के संयोग में अङ्गुली की क्रिया कारण है, परन्तु साथ ही अङ्गुली और हाथ का संयोग भी वृक्ष और हाथ के संयोग का कारण है ॥ ९ ॥ २६४-एतेन विभागोव्याख्यातः ॥ १० ॥ ( एतेन ) इस संयोग के व्याख्यान से ( विभागः ) विभाग का भी ( व्याख्यातः ) व्याख्यान होगया ॥ अर्थात् जैसे संयोग तीन प्रकार का है, ऐसे ही विभाग भी तीन प्रकार का समझो ॥ १-संयुक्त दो पदार्थों में से किसी एक की क्रिया से विभाग हो जाता है॥ २-कभी दोनों की क्रिया से विभाग हो जाता है ॥ ३-और कभी विभाग से भी विभाग हो जाता है ॥ १० ॥ २६५-संयोगविभागयोः संयोगविभागाभावो ऽणुत्व महत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ ११ ॥