भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 160 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

१२४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (संयोगविभागयोः) संयोग और विभाग के (संयोगविभागाभावः) संयोग और विभाग का अभाव (अणुत्वमहत्त्वाभ्याम्) अणुत्व और महत्त्व के साथ (व्याख्यातः) व्याख्यात होचुका ॥ अर्थात् जैसे अणुत्व में अणुत्व और महत्त्व में महत्त्व न होना कहागया था, ऐसे ही संयोग में संयोग और विभाग में विभाग नहीं होता समझो ॥११॥ १८६-कर्मभिः कर्माणि गुणैश्च गुणा अणुत्वमहत्त्वाभ्यामिति ॥ १२ ॥ (इति) ऐसा पूर्व कहा गया है कि (कर्मभिः कर्माणि) कर्मों के साथ कर्म (च) और (गुणैःगुणाः) गुणों के साथ गुण (अणुत्वमहत्त्वाभ्याम्) अणुत्व और महत्त्व से व्याख्यात समझो ॥ अध्याय ७ आन्हिक १ सूत्र १४ से १६ तक तीन सूत्रों में जिन का विस्तार से व्याख्यान करचुके हैं, उस बात को सूत्रकार इस सूत्र में स्मरण कराते हैं ॥१२॥ २८७-युतसिद्धयभावात्कार्यकारणयोः संयोगविभागौ न विद्येते ॥ १३ ॥ (युतसिद्धयभावात्) जुड़ा हुआ होना सिद्ध न होने से (कार्यकारणयोः) कार्य और कारण में (संयोगविभागौ) संयोग और विभाग (न) नहीं (विद्येते) होते ॥ कारण मृत्तिका में कार्य घट जुड़ा हुआ सिद्ध नहीं होसकता । इस लिये घट और मृत्तिका में जो कि कार्य और कारण हैं, संयोग और विभाग नहीं मान सकते ॥ १३ ॥ २८८-गुणत्वात् ॥ १४ ॥ (गुणत्वात्) गुण होने से [द्रव्य और गुण में संयोग और विभाग नहीं मान सकते] ॥ १४ ॥ २८६-गुणोऽपि विभाव्यते ॥ १५ ॥ (गुणः) गुण (अपि) भी (विभाव्यते) [शब्द से] प्रतिपादन किया जाता है ॥ जिस प्रकार घट पट आदि शब्दों से उन के अर्थों का ग्रहण होता है, जो द्रव्य हैं, इसी प्रकार गुणवाचक शब्दों से गुणों का भी ग्रहण होता है।