भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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३२६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद का सूंड़ के साथ अवयव विशेष से सम्बन्ध है और दण्डी पुरुष का दण्ड को साथ संयोग सम्बन्ध है, तब दण्डी पुरुष के साथ २ दण्ड का और हाथी के साथ २ उस की सूंड़ का ग्रहण होता है, परन्तु घटदर्शन के साथ २ घट शब्द का दर्शन नहीं होता। इस लिये शब्द और अर्थ में न तो संयोग सम्बन्ध है, न समवाय सम्बन्ध है ॥ १९ ॥ प्रश्न-यदि शब्द और अर्थ में दोनों प्रकार का सम्बन्ध नहीं तो शब्द से अर्थ का बोध क्यों होता है ? उत्तर- ३०४-सामयिकः शब्दार्थप्रत्ययः ॥ २० ॥ ( शब्दात् ) शब्द से ( अर्थप्रत्ययः ) अर्थ की प्रतीति ( सामयिकः ) सांकेतिक है ॥ अर्थात् आप्त पुरुषों ने जिस शब्द से जिस अर्थ का ग्रहण करना नियत कर दिया, उसी शब्द से उस अर्थ का ग्रहण होने लगा है। जैसे फ़ारस देश के लोग माहताब शब्द से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं और अङ्गरेज़ लोग मून शब्द से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं और आर्य लोग शशी, चन्द्र, कला- निधि, मृगाङ्क, चन्द्रमा इत्यादि शब्दों से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं। अतः जब एक भाषा बोलने वाले अथवा अनेक भाषा बोलने वाले एक शब्द से अनेक अर्थों का और अनेक शब्दों से एक अर्थ का ग्रहण कर लेते हैं तब किसी शब्द का किसी अर्थ के साथ संयोग वा समवाय सम्बन्ध तो नहीं रहा किन्तु केवल सांकेतिक सम्बन्ध है ॥ २० ॥ ३०५-एकदिक्काभ्यामेककालाभ्यां सन्निकृष्ट विप्रकृष्टाभ्यां परमपरञ्च ॥ २१ ॥ ( एकदिक्काभ्याम् ) एक ही दिशा में रहने वाले ( एककालाभ्याम् ) एक ही काल में रहने वाले ( सन्निकृष्टविप्रकृष्टाभ्याम् ) समीप और दूर से ( परम् ) परत्व ( च ) और ( अपरत्वम् ) अपरत्व होता है ॥ यहां से क्रमागत परत्व और अपरत्व की परीक्षा करते हैं-किसी एक दिशा में समीप पदार्थ को पर कहते हैं और उस की अपेक्षा उसी दिशा में दूरस्थ पदार्थ को अपर कहते हैं। यह देशकृत परत्वापरत्व हुआ। दूसरा कालकृत परत्वापरत्व वह है, जो समयके समीप और दूर होने से होता है॥२१॥