भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तमाध्याय २ आह्विक १२१ ३०६-कारणपरत्वात्कारणापरत्वाच्च ॥ २२ ॥ ( कारणपरत्वात् ) कारण के समीप होने से परत्व (च) और (कारण- ऽपरत्वात्) कारण के दूर होने से अपरत्व होता है ॥ अर्थात् देश और काल की समीपता परत्व का कारण है तथा उन की दूरी दूरस्थता अपरत्व का कारण है ॥ २२ ॥ ३०७-परत्वापरत्वयोः परत्वापरत्वाभावोऽणुत्व महत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ २३ ॥ ( परत्वापरत्वयोः ) परत्व और अपरत्व का ( परत्वापरत्वाभावः ) दूसरा परत्व और अपरत्व न होना ( अणुत्वमहत्त्वाभ्याम् ) अणुत्व और महत्त्व के साथ ( व्याख्यातः ) व्याख्यात किया गया समझना चाहिये ॥ २१३ वें सूत्र में कह चुके हैं कि अणुत्व का अणुत्व और महत्त्व का महत्त्व नहीं होता। इसी प्रकार समझना चाहिये कि परत्व का परत्व और अपरत्व का अपरत्व भी नहीं होता ॥ २३ ॥ ३०८-कर्मभिः कर्माणि गुणैर्गुणाः ॥ २४ ॥ ( कर्मभिः ) कर्मों से ( कर्माणि ) कर्म, ( गुणैः ) गुणों से ( गुणाः ) गुण [कहे जा चुके हैं] ॥ अर्थात् २१४ और २१५ वें सूत्रों के अनुसार कर्मों से कर्म और गुणों से गुण की व्याख्या हो चुकी है ॥ २४ ॥ प्रश्न-समवाय क्या पदार्थ है ? उत्तर- ३०९-इहेदमिति यतः कार्यकारणयोः स समवायः ॥ २५ ॥ ( यतः ) जिस से ( कार्यकारणयोः ) कार्य और कारण में ( इति ) यह व्यवहार होता है कि ( इह-इदम् ) इस में यह है ( सः ) वह ( समवायः ) समवाय कहाता है ॥ जैसे मृत्तिकारूप कारण में घटरूप कार्य अथवा घटरूप कार्य में मृत्तिका रूप कारण जिस सम्बन्ध से वर्त्तमान हैं, उस सम्बन्ध को समवाय कहते हैं ॥२५॥ प्रश्न-तो समवाय को भिन्न पदार्थ क्यों माना जावे ? द्रव्य और गुण में ही किसी एक को समवाय क्यों न समझ लें ? उत्तर- CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.