वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठसाऽध्याय १ आन्हिक १२१ ३१९-गुणकर्मसु गुणकर्माभावाद्गुणकर्मापेक्षं न विद्यते ॥८॥ ( गुणकर्मसु ) गुणों और कर्मों में ( गुणकर्माभावात् ) दूसरे गुण कर्म न होने से ( गुणकर्मापेक्षम् ) गुणों और कर्मों की अपेक्षा वाला [ ज्ञान ] ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता है ॥ ८ ॥ उदाहरण— ३२०-समवायिनः श्वैत्याच्छ्रैत्यबुद्धेश्च श्वेते बुद्धिः, ते एते कार्यकारणभूते ॥ ९ ॥ ( समवायिनः ) समवायी द्रव्य के ( श्वैत्यात् ) श्वेत होने से ( च ) और ( श्वैत्यबुद्धेः ) श्वेतत्व के ज्ञान से ( श्वेते ) श्वेत द्रव्य में ( बुद्धिः ) ज्ञान उत्पन्न होता है, ( ते ) वे दोनों ( एते ) ये ( कार्यकारणभूते ) कार्यरूप और कारणरूप ज्ञान हैं ॥ अर्थात् चांदी वा शङ्ख आदि द्रव्य जो श्वेतता गुण से समवाय संबन्ध रखते हैं, द्रव्यों के श्वेत होने से और श्वेतता के ज्ञान से उन श्वेत द्रव्यों में यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि, यह श्वेत चांदी है अथवा यह श्वेत शङ्ख है। सो ये दोनों ज्ञान १-श्वेतता का ज्ञान और २-श्वेत चांदी आदि का ज्ञान कार्यरूप और कारणरूप हैं अर्थात श्वेतता ( सफेदी ) कारणज्ञान है और श्वेतशङ्खादि का ज्ञान कार्यज्ञान है ॥ ९ ॥ परन्तु— ३२१-द्रव्येष्वनितरेतरकारणाः ॥ १० ॥ ( द्रव्येषु ) अनेक द्रव्यों में [ जो अनेक ज्ञान उत्पन्न होते हैं वे ] ( अनितरेतरकारणाः ) एक दूसरे के कारण नहीं होते ॥ १० ॥ क्योंकि— ३२२-कारणाऽयौगपद्यात्कारणक्रमाच्च घटपटादिबुद्धीनां क्रमो, न हेतुफलभावात् ॥११॥ ( कारणाऽयौगपद्यात् ) ज्ञान के कारण एक साथ उत्पन्न न होने से ( च ) और ( कारणक्रमात् ) कारणों के क्रम से ( घटपटादिबुद्धीनाम् ) घट पट आदि ज्ञानों में ( क्रमः ) आगापीछा है। ( न ) न कि ( हेतुफलभावात् ) कारण का फल होने से ॥ अर्थात् यदि हम को प्रथम घट का ज्ञान हो, पश्चात् पट का ज्ञान हो, तो ये दोनों ज्ञान एक दूसरे के कार्यकारण नहीं हैं, किन्तु ज्ञान के कारण ही