भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 160 में से

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१३० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद प्रश्न-जहां ज्ञान का निर्देश किया है वहां सामान्य से ज्ञानप्राप्ति की रीति कही गई थी, कृपा करके सविशेष वर्णन कीजिये ? उत्तर- ३१५-गुणकर्मसु सन्निकृष्टेषु ज्ञाननिष्पत्तेर्द्रव्यं कारणम् ॥४॥ ( सन्निकृष्टेषु ) इन्द्रियों के समीप आये हुये ( गुणकर्मसु ) गुणों और कर्मों में ( ज्ञाननिष्पत्तेः ) ज्ञान सिद्ध होने से ( द्रव्यम् ) द्रव्य ( कारणम् ) ज्ञान का कारण है ॥ यह रूप है, इत्यादि गुणों के प्रत्यक्ष में और यह उछलना है, इत्यादि कर्मों के प्रत्यक्ष में द्रव्य ही कारण है, क्योंकि द्रव्यों के आश्रय में ही रूपादि गुण और उछलना आदि कर्म प्रत्यक्ष होते हैं ॥ ४ ॥ और- ३१६-सामान्यविशेषेषु सामान्यविशेषा- ऽभावात्ततएव ज्ञानम् ॥ ५ ॥ ( सामान्यविशेषेषु ) सामान्य और विशेषों में ( सामान्यविशेषाभावात् ) दूसरा सामान्य और दूसरा विशेष न होने से ( ततः ) उन से ( एव ) ही ( ज्ञानम् ) ज्ञान होता है ॥ सामान्य सत्ता (होना) और उन के विशेष-द्रव्य होना, गुण होना, कर्म होना, पृथिवी होना, रूप होना, उछाल होना; इत्यादिकों में उन के प्रत्यक्ष का कारण वे स्वयंम् ही हैं अर्थात् उन की सत्ता का ज्ञान साक्षात् उन्हीं से होता है ॥ ५ ॥ प्रश्न-किस की अपेक्षा से द्रव्यगुणकर्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है ? उत्तर- ३१७-सामान्यविशेषापेक्षं द्रव्यगुणकर्मसु ॥ ६ ॥ (द्रव्यगुणकर्मसु द्रव्यों, गुणों और कर्मों के विषय में ( सामान्यविशेषापेक्षम् ) सामान्य विशेष की अपेक्षा से [ ज्ञान उत्पन्न होता है ] ॥ अर्थात् यह अमुक द्रव्य है, यह अमुक गुण है और यह अमुक कर्म है, ऐसा विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ६ ॥ उस में भी- ३१८-द्रव्ये द्रव्यगुणकर्मापेक्षम् ॥ ७ ॥ ( द्रव्ये ) द्रव्य विषय में ( द्रव्यगुणकर्मापेक्षम् ) द्रव्य गुण और कर्म की अपेक्षा वाला [ ज्ञान उत्पन्न होता है ] ॥ ७ ॥ परन्तु-

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