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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

१३० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद प्रश्न-जहां ज्ञान का निर्देश किया है वहां सामान्य से ज्ञानप्राप्ति की रीति कही गई थी, कृपा करके सविशेष वर्णन कीजिये ? उत्तर- ३१५-गुणकर्मसु सन्निकृष्टेषु ज्ञाननिष्पत्तेर्द्रव्यं कारणम् ॥४॥ ( सन्निकृष्टेषु ) इन्द्रियों के समीप आये हुये ( गुणकर्मसु ) गुणों और कर्मों में ( ज्ञाननिष्पत्तेः ) ज्ञान सिद्ध होने से ( द्रव्यम् ) द्रव्य ( कारणम् ) ज्ञान का कारण है ॥ यह रूप है, इत्यादि गुणों के प्रत्यक्ष में और यह उछलना है, इत्यादि कर्मों के प्रत्यक्ष में द्रव्य ही कारण है, क्योंकि द्रव्यों के आश्रय में ही रूपादि गुण और उछलना आदि कर्म प्रत्यक्ष होते हैं ॥ ४ ॥ और- ३१६-सामान्यविशेषेषु सामान्यविशेषा- ऽभावात्ततएव ज्ञानम् ॥ ५ ॥ ( सामान्यविशेषेषु ) सामान्य और विशेषों में ( सामान्यविशेषाभावात् ) दूसरा सामान्य और दूसरा विशेष न होने से ( ततः ) उन से ( एव ) ही ( ज्ञानम् ) ज्ञान होता है ॥ सामान्य सत्ता (होना) और उन के विशेष-द्रव्य होना, गुण होना, कर्म होना, पृथिवी होना, रूप होना, उछाल होना; इत्यादिकों में उन के प्रत्यक्ष का कारण वे स्वयंम् ही हैं अर्थात् उन की सत्ता का ज्ञान साक्षात् उन्हीं से होता है ॥ ५ ॥ प्रश्न-किस की अपेक्षा से द्रव्यगुणकर्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है ? उत्तर- ३१७-सामान्यविशेषापेक्षं द्रव्यगुणकर्मसु ॥ ६ ॥ (द्रव्यगुणकर्मसु द्रव्यों, गुणों और कर्मों के विषय में ( सामान्यविशेषापेक्षम् ) सामान्य विशेष की अपेक्षा से [ ज्ञान उत्पन्न होता है ] ॥ अर्थात् यह अमुक द्रव्य है, यह अमुक गुण है और यह अमुक कर्म है, ऐसा विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ६ ॥ उस में भी- ३१८-द्रव्ये द्रव्यगुणकर्मापेक्षम् ॥ ७ ॥ ( द्रव्ये ) द्रव्य विषय में ( द्रव्यगुणकर्मापेक्षम् ) द्रव्य गुण और कर्म की अपेक्षा वाला [ ज्ञान उत्पन्न होता है ] ॥ ७ ॥ परन्तु-

षष्ठसाऽध्याय १ आन्हिक १२१ ३१९-गुणकर्मसु गुणकर्माभावाद्गुणकर्मापेक्षं न विद्यते ॥८॥ ( गुणकर्मसु ) गुणों और कर्मों में ( गुणकर्माभावात् ) दूसरे गुण कर्म न होने से ( गुणकर्मापेक्षम् ) गुणों और कर्मों की अपेक्षा वाला [ ज्ञान ] ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता है ॥ ८ ॥ उदाहरण— ३२०-समवायिनः श्वैत्याच्छ्रैत्यबुद्धेश्च श्वेते बुद्धिः, ते एते कार्यकारणभूते ॥ ९ ॥ ( समवायिनः ) समवायी द्रव्य के ( श्वैत्यात् ) श्वेत होने से ( च ) और ( श्वैत्यबुद्धेः ) श्वेतत्व के ज्ञान से ( श्वेते ) श्वेत द्रव्य में ( बुद्धिः ) ज्ञान उत्पन्न होता है, ( ते ) वे दोनों ( एते ) ये ( कार्यकारणभूते ) कार्यरूप और कारणरूप ज्ञान हैं ॥ अर्थात् चांदी वा शङ्ख आदि द्रव्य जो श्वेतता गुण से समवाय संबन्ध रखते हैं, द्रव्यों के श्वेत होने से और श्वेतता के ज्ञान से उन श्वेत द्रव्यों में यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि, यह श्वेत चांदी है अथवा यह श्वेत शङ्ख है। सो ये दोनों ज्ञान १-श्वेतता का ज्ञान और २-श्वेत चांदी आदि का ज्ञान कार्यरूप और कारणरूप हैं अर्थात श्वेतता ( सफेदी ) कारणज्ञान है और श्वेतशङ्खादि का ज्ञान कार्यज्ञान है ॥ ९ ॥ परन्तु— ३२१-द्रव्येष्वनितरेतरकारणाः ॥ १० ॥ ( द्रव्येषु ) अनेक द्रव्यों में [ जो अनेक ज्ञान उत्पन्न होते हैं वे ] ( अनितरेतरकारणाः ) एक दूसरे के कारण नहीं होते ॥ १० ॥ क्योंकि— ३२२-कारणाऽयौगपद्यात्कारणक्रमाच्च घटपटादिबुद्धीनां क्रमो, न हेतुफलभावात् ॥११॥ ( कारणाऽयौगपद्यात् ) ज्ञान के कारण एक साथ उत्पन्न न होने से ( च ) और ( कारणक्रमात् ) कारणों के क्रम से ( घटपटादिबुद्धीनाम् ) घट पट आदि ज्ञानों में ( क्रमः ) आगापीछा है। ( न ) न कि ( हेतुफलभावात् ) कारण का फल होने से ॥ अर्थात् यदि हम को प्रथम घट का ज्ञान हो, पश्चात् पट का ज्ञान हो, तो ये दोनों ज्ञान एक दूसरे के कार्यकारण नहीं हैं, किन्तु ज्ञान के कारण ही

१३२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद भिन्न २ एक दूसरे के पश्चात् होते हैं, इस लिये ज्ञान भी एक दूसरे के पश्चात् होते हैं, न कि एक कारण और दूसरा उस का कार्य होने से ॥ १९ ॥ इस आह्निक में द्रव्य गुण कर्म और सामान्य में जो प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, वह परीक्षापूर्वक वर्णन किया गया ॥ इत्यष्टमाध्यायस्य प्रथमाह्निकम् ॥ १ ॥ अथ द्वितीयाह्निकम् अब ज्ञान के प्रकार का उदाहरण देते हैं- ३२३-अयमेश त्वया कृतं भोजयैनमिति बुद्ध्यपेक्षम् ॥ १ ॥ (अयम्) यह है, (एषः) वह है, (त्वया कृतम्) तूने कर्म किया, (एनं भोजय) इन को भोजन कराओ (इति) इस प्रकार का ज्ञान (बुद्ध्यपेक्षम्) भिन्न २ बुद्धियों से होता है ॥ १ ॥ प्रश्न-यह है, तूने कर्म किया, इस को भोजन कराओ, इत्यादि समक्ष- वर्त्ती पदार्थों में तो प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है परन्तु "वह वहां है" इत्यादि परोक्षवर्त्ती पदार्थों में प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे हो सकता है ? उत्तर- ३२४-दृष्टेषु भावाददृष्टेष्वभावात् ॥ २ ॥ (दृष्टेषु) जाने हुए विषयों में [भावात्) होने से (अदृष्टेषु) बिना जाने विषयों में (अभावात्) न होने से ॥ अर्थात् हम जिन परोक्ष विषयों का निर्देश करते हैं कि वह वहां है, इत्यादि । सो पहिले देखे, जाने, विषयों में निर्देश करते हैं, इस लिये परोक्ष विषयों में भी "वह वहां है" इत्यादि निर्देश प्रत्यक्षज्ञानपूर्वक ही समझना चाहिये, क्योंकि अदृष्ट अर्थात् जिन के साथ हमारी ज्ञानेन्द्रियों का सम्बन्ध नहीं हुवा, उन को हम यह, वह, इत्यादि प्रकार से व्यवहार नहीं करते ॥ २ ॥ प्रश्न-तुम "अर्थ" शब्द से किस का ग्रहण करते हो ? उत्तर- ३२५-अर्थ इति द्रव्यगुणकर्मसु ॥ ३ ॥ (द्रव्यगुणकर्मसु) द्रव्यों, गुणों और कर्मों में (अर्थः) "अर्थ" (इति) ऐसा व्यवहार करते हैं ॥ ३ ॥ ३२६-द्रव्येषु पञ्चात्मकत्वम् ॥ ४ ॥

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अष्टमाऽध्याय २ आन्हिक १३३ (द्रव्येषु) कार्य द्रव्यों में (पञ्चात्मकत्वम्) पञ्चात्त्वात्मक होना [कहा गया है] ॥ यद्यपि १३२ और १३४ में पञ्चात्मक और द्व्यात्मक का निषेध कर चुके हैं परन्तु १३५ में कह चुके हैं कि "अणुसंयोग का निषेध नहीं है" इस लिये यहां पञ्चात्मकता कहना पूर्व्वापर विरुद्ध नहीं है ॥ ४ ॥ जैसे- ३२७-भूयस्त्वाद् गन्धवत्त्वाच्च पृथिवी गन्धज्ञाने प्रकृतिः ॥५॥ (भूयस्त्वात्) बहुत होने से (च) और (गन्धवत्त्वात्) गन्धवर्मी होने से (पृथिवी) पृथिवीतत्त्व (गन्धज्ञाने) गन्ध के ज्ञान कराने वाले नासिका इन्द्रिय में (प्रकृतिः) उपादान कारण है ॥ ५ ॥ तथा- ३२८-तथापस्तेजोवायुश्च रसरूपस्पर्शज्ञानेऽविशेषात् ॥६॥ (तथा) इसी प्रकार (अविशेषात्) समान होने से (रस, रूप, स्पर्श, ज्ञाने) रस, रूप, और स्पर्श के ज्ञान कराने वाले रसना, चक्षु और त्वचा इन्द्रियों में [क्रम से] (आपः) जलतत्त्व, (तेजः) अग्नितत्त्व (च) और (वायुः) वायुतत्त्व [उपादान कारण हैं] ॥ जिस प्रकार नासिका इन्द्रिय में पृथिवी उपादान कारण है, इसी प्रकार रसना इन्द्रिय में जल, चक्षु इन्द्रिय में अग्नि और त्वचा इन्द्रिय में वायु उपादान कारण हैं ॥ ६ ॥ इस द्वितीय आन्हिक में ज्ञान, ज्ञान का प्रकार; इन्द्रियों के कारण और "अर्थ" शब्द का अर्थ वर्णन किया गया ॥ इति अष्टमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥ इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते, वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे ज्ञानाऽध्यायोऽष्टमः ॥ ८ ॥

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ओ३म् अथ नवमोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् प्रश्न-ये पृथिवी आदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व सत् थे वा असत् ? उत्तर- ३२९-क्रियागुणव्यपदेशाऽभावात् प्रागसत् ॥ १ ॥ ( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुण का व्यवहार न पाया जाने से ( प्राक् ) उत्पत्ति से पूर्व ( असत् ) अभावरूप थे ॥ यदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व विद्यमान होता तो कोई क्रिया और कोई गुण उस का पाया जाता, नहीं पाया जाता, इस लिये प्रागभाव मानना ठीक है ॥ १ ॥ प्रश्न-यदि कार्य पदार्थ उत्पत्ति से पूर्व सत् नहीं था तो कारण की क्रिया से उत्पन्न कैसे हो सकेगा ? क्योंकि हम देखते हैं कि तिलों में तेल है, इस लिये उन से उत्पन्न होता है तथा बालू में तेल नहीं है, इस लिये उस से उत्पन्न नहीं होता ? उत्तर- ३३०-सदसत् ॥ २ ॥ ( सत् ) कारणरूप से भाव और ( असत् ) कार्यरूप से अभाव [उत्पत्ति के पूर्व ] होता है ॥ २ ॥ प्रश्न-यदि प्रत्येक कार्य उत्पत्ति से पूर्व कारणरूप में वर्त्तमान था तो उस की उत्पत्ति मानने का क्या लाभ है ? उत्तर- ३३१--असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् ॥ ३ ॥ ( असतः ) असत् के ( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुणों का व्यवहार न पाये जाने से [ सत् पदार्थ ] ( अर्थान्तरम् ) अन्य पदार्थ है ॥ अर्थात् सत् असत् एक नहीं होसक्ते, असत् कार्य विषय में कोई क्रिया वा कोई गुण नहीं कहा देखा माना जाता और सत्कार्य में क्रिया और गुण

नवमाध्याय १ आन्हिक . १३५ देखे पड़े और माने जाते हैं । इस लिये असत् (उत्पत्ति से पूर्व) की अपेक्षा सत् = उत्पन्न हुवा कार्य पदार्थ भिन्न है ॥ ३ ॥ ३३२-सच्चासत् ॥ ४ ॥ ( सत् ) होता हुवा [ भी कार्य पदार्थ ] ( च ) फिर=नाश के पश्चात् ( असत् ) सत् नहीं रहता ॥ ४ ॥ ३३३-यच्चाऽन्यदऽसदतस्तदऽसत् ॥ ५ ॥ ( च ) और ( यत् ) जो पदार्थ ( अतः ) इस पूर्वोक्त सदसत् उभय- विध से ( अन्यत् ) विलक्षण=जो तीनों काल में ( असत् ) न होवे, वह ( असत् ) केवल असत् है ॥ अर्थात् जो पदार्थ उत्पन्न होने से पूर्व असत् और उत्पन्न होकर सत् हैं, वे तो 'सदसत्' कहाते हैं और जो कभी भी सत्तात्मक नहीं, वे असत् हैं॥५॥ ३३४-असदिति भूतप्रत्यक्षाऽभावाद् भूतस्मृतेर्विरोधिप्रत्यक्षवत् ॥६॥ ( असत् ) अब नहीं है ( इति ) ऐसा जो ज्ञान है, वह ( भूतप्रत्यक्षा- ऽभावात् ) हुवे पदार्थ का प्रत्यक्ष न होने से [परन्तु] (भूतस्मृतेः) हुवे पदार्थ की स्मृति बनी रहने से ( विरोधिप्रत्यक्षवत् ) विरोधिप्रत्यक्ष के समान है ॥ जैसे असत् के विरोधी सत् का प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही जो होकर फिर न रहे, उस में न रहने पर प्रत्यक्ष न होने पर भी, होते हुये समय की स्मृति बनी रहने से ज्ञान रहता है ॥ ६ ॥ ३३५-तथाऽभावे भावप्रत्यक्षत्वाच्च ॥ ७ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार ( अभावे ) अभाव=असत् में ( च ) भी ( भाव- प्रत्यक्षत्वात् ) सत् के प्रत्यक्ष होने से [ ज्ञान होता है ] ॥ अर्थात् मृत्तिका से घट बना, फिर फूट टूट कर मृत्तिका होगया, तब टूट जाने और अपने कारण में लीन होजाने ( अभाव होजाने ) पर भाव (मृत्तिका) के प्रत्यक्ष होने से भी पूर्वप्रत्यक्षीकृत घट का ज्ञान होता है ॥७॥ ३३६-एतेनाऽघटोऽगौरऽधर्मश्च व्याख्यातः ॥ ८ ॥

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १३६ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद (एतेन) इस से (अघटः) घट का अभाव = अघट, (अगोः) गौ का अभाव = अगौ (च) और (अधर्मः) धर्म का विरोधी = अधर्म (व्याख्यातः) व्याख्यान किया गया ॥ ८ ॥ परिभाषा- ३३७-अभूतं नास्तीत्यनर्थान्तरम् ॥ ६ ॥ (अभूतम्) नहीं हुवा है, (न अस्ति) नहीं है, (इति) ये दोनों (अनर्थान्तरम्) एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं = एक ही बात हैं ॥ अर्थात् अभूत और नास्ति दोनों एकार्थी हैं ॥ ६ ॥ जैसे- ३३८-नास्ति घटोगेह इति, सतो घटस्य गेहसंसर्गप्रतिषेधः ॥ १० ॥ (गेहे) घर में (घटः) घट (न अस्ति) नहीं है (इति) इस कथन में (सतः) होते हुवे (घटस्य) घड़े का (गेहसंसर्गप्रतिषेधः) घर में संसर्ग न होना अभिप्राय है ॥ १० ॥ यहां तक बाह्येन्द्रियप्रत्यक्ष की परीक्षा कही, आगे मानसिक प्रत्यक्ष का वर्णन करते हैं:- ३३६-आत्मन्यात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मप्रत्यक्षम् ॥११॥ (आत्मनि) जीवात्मा में (आत्ममनसोः) जीवात्मा और मन के (संयोगविशेषात्) योग की विधि से विशेष संयोग होने से (आत्मप्रत्य- क्षम्) आत्मा = अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष होता है ॥ ११ ॥ ३४०-तथा द्रव्यान्तरेषु प्रत्यक्षम् ॥ १२ ॥ (तथा) इसी प्रकार (द्रव्यान्तरेषु) अन्य सूक्ष्म प्रकृतिपर्यन्त द्रव्यों में (प्रत्यक्षम्) प्रत्यक्ष = अपरोक्ष ज्ञान होता है ॥ १२ ॥ प्रश्न-योगी दो प्रकार के हैं-१-जो सदा समाधि लगाये रहें, २-जो कभी २ समाधि लगावें, इन दोनों में किस को अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष होता है ? उत्तर- ३४१-असमाहितान्तः करणा उपसंहृतसमाधयस्तेषां च॥१३॥ जो (असमाहितान्तःकरणाः) सदा अन्तःकरण का समाधान नहीं करते = कभी २ करते हैं (च) और (उपसंहृतसमाधयः) समाधि का उप- संहार = अन्त कर चुके हैं (तेषाम्) उन को [आत्मा का प्रत्यक्ष होता है] ॥१३॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

नवमाऽध्याय २ आन्हिक १३७ ३४२-तत्समवायात्कर्मगुणेषु ॥ १४ ॥ ( तत्समवायात् ) [ जिन सूक्ष्मद्रव्यों का प्रत्यक्ष होता है ] उन के सम- वायसम्बन्ध से ( कर्मगुणेषु ) [ उन २ द्रव्यों के ] कर्मों और गुणों में [ भी प्रत्यक्ष हो जाता है ] ॥ १४ ॥ ३४३-आत्मसमवायादात्मगुणेषु ॥ १५ ॥ ( आत्मसमवायात् ) जीवात्मा के साथ समवाय सम्बन्ध से ( आत्म गुणेषु ) आत्मा के [ चेतनत्वादि वा सुखदुःखादि ] गुणों का [ प्रत्यक्ष होजाता है ] ॥ केवल जीवात्मा का यद्यपि सुखदुःखादि से समवाय सम्बन्ध वा नित्य- सम्बन्ध नहीं है, परन्तु मनसहित आत्मा के लिये यहां आत्मा शब्द का व्यव- हार समझो, अथवा आत्मा के गुणों में सुखदुःखादि का ग्रहण न करके, केवल चेतनता का ग्रहण करके बहुवचन को अविवक्षित जानो ॥ १५ ॥ उत्पत्ति से पूर्व कार्य का असत् होना, प्रत्यक्ष होना, और योगियों का प्रत्यक्ष, इस आन्हिक में वर्णित किया गया ॥ इति नवमाऽध्यायस्य प्रथममान्हिकम् ॥ १ ॥ —:०:*:०:— अथ द्वितीयमान्हिकम् प्रत्यक्ष की परीक्षा कह कर अब आगे लैङ्गज्ञान की परीक्षा का आरम्भ करते हैं:- ३४४-अस्येदं कार्यं, कारणं, संयोगि, विरोधि, समवायि, चेति लैङ्गिकम् ॥ १ ॥ ( अस्य ) इस का ( इदम् ) यह ( कार्यं ) कार्य है, ( कारणम् ) कारण है, ( संयोगि ) संयोगी है, ( विरोधि ) विरोधी है ( च ) और (समवायि) सदा साथ मिलारहने वाला है ( इति ) इस को ( लैङ्गिकम् ) लिङ्गोत्पन्न ज्ञान कहते हैं ॥ अर्थात् कार्य को देखकर कारण का, कारण को देखकर कार्य का, संयोग को देखकर संयोगी का, विरोध को देखकर विरोधी का और समवाय को देख कर समवायी का ज्ञान होता है, उस को लैङ्गिक=आनुमानिक ज्ञान कहते हैं ॥ १ ॥ १८

१३८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद ३४५-अस्येदं, कार्यकारणसम्बन्धाऽवयवाद्भवति ॥ २ ॥ ( अस्य ) इस लिङ्गी का ( इदम् ) यह लिङ्ग है, ( च ) और ( कार्य- कारणसम्बन्धः ) कार्यकारणसम्बन्ध है, [ यह ज्ञान ] ( अवयवात् ) उदाह- रण रूप एक देश से ( भवति ) होता है ॥ २ ॥ ३४६-एतेन शाब्दं व्याख्यातम् ॥ ३ ॥ ( एतेन ) इस व्याख्यान से ( शाब्दम् ) शाब्दज्ञान भी ( व्याख्यातम् ) व्याख्यात होगया ॥ जिस प्रकार लिङ्गलिङ्गिसम्बन्धज्ञानपूर्वक लिङ्गज्ञानोत्पन्न लैङ्गिक ज्ञान की व्याख्या की गई है, इसी प्रकार शब्द और उस के अर्थ तथा सम्बन्ध के ज्ञानपूर्वक-शब्द ज्ञान से उत्पद्यमान=शाब्द ज्ञान का भी व्याख्यान समझ लेना चाहिये ॥ ३ ॥ ३४७-हेतुरपदेशो लिङ्गं प्रमाणं करणमित्यनर्थान्तरम् ॥४॥ ( हेतुः ) हेतु, ( अपदेशः ) अपदेश, ( लिङ्गं ) लिङ्ग, ( प्रमाणं ) प्रमाण और ( करणं ) करण ( इति ) ये ( अनर्थान्तरं ) एकार्थक हैं ॥ हेत्वादि शब्द इस शास्त्र में एकार्थक हैं ॥ ४ ॥ ३४८-अस्येदमिति बुद्ध्यपेक्षितत्वात् ॥ ५ ॥ ( अस्य ) इस लिङ्गी वा उस कार्य का ( इदं ) यह लिङ्ग वा कारण है, ( इति ) यह बात ( बुद्ध्यपेक्षितत्वात् ) बुद्धि की अपेक्षाकृत होने से [ हेतु आदि एकार्थक हैं ] ॥ ५ ॥ प्रत्यक्षज्ञान, लिङ्ग=अनुमान से ज्ञान और आप्तोपदिष्ट शब्द से ज्ञान, यह ३ प्रकार का ज्ञान परीक्ष पूर्वक बताया गया, आगे स्मृतिज्ञान की परीक्षा करते हैं:- ३४९-आत्ममनसोः संयोगविशेषात् संस्काराच्च स्मृतिः ॥६॥ ( आत्ममनसोः ) आत्मा और मन के ( संयोगविशेषात् ) विशेष संयोग से ( च ) और ( संस्कारात् ) संस्कार से (स्मृतिः) स्मरण=ज्ञान होता है ॥६॥ ३५०-तथा स्वप्नः ॥ ७ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार=आत्मा और मन के संयोग विशेष तथा संस्कार से ( स्वप्नः ) स्वप्नज्ञान होता है ॥ ७ ॥

नवमाऽध्याय २ आह्निक १३९

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३५१-स्वप्नान्तिकम् ॥ ८ ॥ (स्वप्नान्तिकम्) स्वप्नावस्थाविषयक अन्य स्वप्नदृष्ट पदार्थों का ज्ञान [भी आत्मा और मन के विशेष संयोग और संस्कार से होता है] ॥ ८ ॥ प्रश्न - स्मृतिज्ञान और स्वप्नज्ञान में भेद पाया जाता है, और कारण दोनों का एक है, अर्थात् आत्मा और मन के संयोग विशेष से तथा संस्कार वश स्मृति होती है, और इन्हीं कारणों से स्वप्न होता है, तब स्मृति और स्वप्न भी दो क्यों हैं, एक ही क्यों नहीं ? उत्तर- ३५२-धर्माच्च ॥ ९ ॥ (धर्मात्) धर्म से (च) भी [स्वप्नज्ञान होता है] ॥ धर्म शब्द से शारीरक धातु विकारादि विवक्षित हैं। कामी पुरुष सोता है, तब स्वप्न में भी संस्कारवश वैसा देखता है, परन्तु बहुत से ऐसे स्वप्न भी दीखते हैं कि जिन का तात्कालिक संस्कार नहीं होता। जैसे अपना आकाश में उड़ना, अग्नि में प्रवेश करना, सुवर्ण, पर्वत, उदय होते सूर्य का दीखना, नदी समुद्र तड़ागादिका तिरना, इत्यादि प्रकार के स्वप्न शरीर के धर्म = वातपित्तकफादि दोषों के प्राबल्य दौर्बल्य से होते हैं। इस लिये स्मृतिज्ञान के कारणों से स्वप्नज्ञान के कारण अन्य भी हैं, यही कारण है कि स्मृति तथा स्वप्न एक नहीं हो सक्ते ॥ ९ ॥ स्मृति की परीक्षा हो चुकी, अब अविद्या की परीक्षा करते हैं:- ३५३-इन्द्रियदोषात्संस्कारदोषाच्चाऽविद्या ॥ १० ॥ (इन्द्रियदोषात्) आंख कान आदि इन्द्रियों में कोई दोष होने से (च) और (संस्कारदोषात्) संस्काररूप दोष से [और धर्म अधर्म आदि से] (अविद्या) विपरीत ज्ञान होता है ॥ १० ॥ ३५४-तद् दुष्टज्ञानम् ॥ ११ ॥ (तत्) वह = अविद्या (दुष्टज्ञानम्) दोषयुक्त ज्ञान है ॥ ११ ॥ ३५५-अदुष्टं विद्या ॥ १२ ॥ (अदुष्टम्) निर्दोष ज्ञान (विद्या) विद्या कहाती है ॥ १२ ॥ ३५६-आर्षं सिद्धदर्शनं च धर्मेभ्यः ॥ १३ ॥

१४० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (आर्षं) ऋषिकृत उपदेश (च) और-(सिद्धदर्शनं) वेदसिद्धपदार्थों का दर्शन (धर्मेभ्यः) पूर्वकृत पुण्य कर्मों से होता है ॥ १३ ॥ इति नवमोऽध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते वैशेषिक दर्शन भाषानुवादे नवमो ज्ञानविशेषाध्यायः ॥ ९ ॥

ॐ अथ दशमोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् ३५७-इष्टानिष्टकारणविशेषाद्विरोधाच्च मिथः सुखदुःखयोरर्थान्तरभावः ॥ १ ॥ (इष्टानिष्टकारणविशेषात्) इष्ट और अनिष्ट विशेष कारण से (च) और (मिथः) एक दूसरे में (विरोधात्) विरोध से [सिद्ध है कि] (सुखदुःखयोः) सुख और दुःख में (अर्थान्तरभावः) एक दूसरे से भिन्नता है ॥ १ ॥ ३५८-संशयनिर्णयान्तराभावश्च ज्ञानान्तरत्वे हेतुः ॥ २ ॥ (च) और (संशयनिर्णयान्तराऽभावः) संशय और निर्णय के बीच में कोई अन्य प्रत्यय नहीं है, [सुख वा दुःख जिस में समझे जावें] यही (ज्ञाना- न्तरत्वे) सुख दुःख के भिन्न ज्ञान होने में (हेतुः) कारण है ॥ २ ॥ ३५९-तयोर्निष्पत्तिः प्रत्यक्षलैङ्गिकाभ्याम् ॥ ३ ॥ (तयोः) उन सुख दुःखों की (निष्पत्तिः) उत्पत्ति (प्रत्यक्षलैङ्गिकाभ्याम्) प्रत्यक्ष और अनुमान से होती है ॥ जिस प्रकार इन्द्रियार्थसंनिकर्ष से और लिङ्ग से प्रत्यक्ष और अनुमान ज्ञान उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार मन चाहे विषय के सामीप्य से वा मन चाहे विषय की प्राप्ति की आशा दिलाने वाले चिन्हों से सुख दुःख उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ ३६०-अभूदित्यपि ॥ ४ ॥ (अभूत्) भूतकाल में हुआ था (इति) इस से (अपि) और भविष्यत् में होगा, इस से भी [सुख और दुःख की उत्पत्ति होती है] ॥ पूर्वानुभूत सुखसाधनों से सुख और दुःखसाधनों से दुःख होता है और होने वाले भविष्यद्वृत्तियों से भी उस की आशा से होता है ॥ ४ ॥ ३६१-सति च कार्यादर्शनात् ॥ ५ ॥

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १७२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (च) और (सति) सुख वा दुःख के होते हुवे (कार्याऽदर्शनात्) सुख वा दुःख का कार्य न देखने से [भी जाना जाता है कि सुख वा दुःख है] ॥ अर्थात् मुख से मुख प्रसन्न होता है, दुःख से मलिन होता है, जब सुख- वर्त्तमान हो तब मुखमालिन्य नहीं देखा जाता और जब दुःख हो तब मुख की प्रसन्नता नहीं दीख पड़ती ॥ ५ ॥ ३६२-एकार्थसमवायिकारणान्तरेषु दृष्टत्वात् ॥ ६ ॥ (एकार्थसमवायिकारणान्तरेषु) एक पदार्थ में समवेत भिन्न २ कारणों में (दृष्टत्वात्) देखा जाने से [सुख और दुःख भिन्न २ हैं] ॥ जिस को एक अर्थ कहते हैं, उस में भी अपेक्षाकृत फिर विशेषभेद होता है, इस प्रकार सुख दुःख के एकार्थवर्त्ती भी अनेक कारण होते हैं, एक नहीं, उन में से कोई सुख का और कोई दुःख का कारण हो जाते हैं ॥ ६ ॥ ३६३-एकदेश इत्येकस्मिञ्छिरः पृष्ठमुदरं मर्माणि, तद्विशेषस्तद्विशेषेभ्यः ॥ ७ ॥ (एकस्मिन्) एक शरीर में (शिरः, पृष्ठम्, उदरम्, मर्माणि) शिर, कमर, पेट, मर्मस्थान (इति) ऐसा व्यवहार (एकदेशे) शरीर के अवयवों में है। (तद्विशेषः) उन शिर आदि विशिष्ट कार्य्यों का विशेष (तद्विशेषेभ्यः) उन के विशेष कारणों से होता है ॥ ७ ॥ इस आह्निक में अपने २ कारणों की विभिन्नता से सुख और दुःख का परस्परभेद और ज्ञान से भेद कहा गया ॥ इति दशमाऽध्यायस्य प्रथममाह्निकम् ॥ १॥ अथ द्वितीयमाह्निकम् ३६४-कारणमिति द्रव्ये, कार्य्यसमवायात् ॥ १ ॥ (कारणम्) कारण है, (इति) ऐसा व्यवहार वा प्रतीति (द्रव्ये) द्रव्य में होती है, क्योंकि (कार्य्यसमवायात्) कार्य्यों का समवाय सम्बन्ध [द्रव्यों में ही होता है] इस कारण से ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

दशमाऽध्याय १ आह्निक. १४३

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri दशमाऽध्याय १ आह्निक. १४३ कारण के भेद से कार्य में भेद होता है, और कारण तीन ३ प्रकार के होते हैं, १- समवायी, २ असमवायी, ३-निमित्त । इन तीनों में से समवायी कारण ( उपादान ) की परीक्षा करते हुये आचार्य इस सूत्र में बतलाते हैं कि कार्य पदार्थों का समवाय-द्रव्य में होता है, इस कारण द्रव्य में ही उपा- दान कारणता का व्यवहार होता है ॥ १ ॥ ३६५-संयोगाद्वा ॥ २ ॥ (वा) अथवा (संयोगात्) संयोग से भी [पाया जाता है कि उपा- दान कारणता द्रव्य में ही है ] ॥ २ ॥ ३६६-कारणे समवायात्कर्माणि ॥ ३ ॥ (कारणे) कारण=उपादान में (समवायात्) समवेत होने से (कर्माणि) कर्म भी [ कारण होजाते हैं ] ॥ ३ ॥ ३६७-तथा रूपे कारणैकार्थसमवायाच्च ॥ ४ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार ( कारणैकार्थसमवायात् ) कारणेकपदार्थ के सम- वायसम्बन्ध से (रूपे) रूपादि गुणों में (च) भी [कारणता का व्यवहार है] ॥ अर्थात् कार्य पदार्थ की समीपता से कर्म में कारणता का व्यवहार है, इसी प्रकार कारणैकार्थ की समीपता से रूप और उपलक्षण से अन्य गुणों में भी कारणता का व्यवहार होता है ॥ ४ ॥ उदाहरण- ३६८-कारणसमवायात्संयोगः पटस्य ॥ ५ ॥ (कारणसमवायात्) उपादान कारण=तन्तुओं के समवाय से (संयोगः) संयोग ( पटस्य ) वस्त्र का [ कारण ] होता है ॥ ५ ॥ ३६९-कारणकारणसमवायाच्च ॥ ६ ॥ (च) और (कारणकारणसमवायात्) कारण का कारण समवेत होने से [संयोग को कारणता होती है ] ॥ जैसे एक रुई की गांठ दूसरी रुई की गांठ में मिलाई जावे तो महत्त्व परिमाण कार्य उत्पन्न होगा। अब देखना होगा कि रुई के अवयव=टुकड़ों से रुई की गांठ बनी, फिर रुई की गांठों के अवयव मिलने (संयोग) से महत्त्व=बड़ापन बना, तब कारण के कारण का समवाय हुआ अर्थात् रुई के अवयवों से गांठ, गांठों से महत्त्व कार्य उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

१४४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद समवायी और प्रसङ्गप्राप्त असमवायी कारणों की परीक्षा कह चुके । आगे निमित्त कारण की परीक्षा करेंगे, इस लिये उसका आरम्भ करते हैं- ३७०-संयुक्तसमवायादग्नेर्वैशेषिकम् ॥ ७ ॥ (संयुक्तसमवायात्) संयोगसम्बद्ध समवाय से (अग्नेः) अग्नि का (वै- शेषिकम्) विशेष गुण उष्णता [कारण है] ॥ पाक से उत्पन्न रूपादि रङ्गादि कार्यों में अग्नि निमित्त कारण है, जो अपने संयुक्तसमवाय से गरमी पहुंचा कर किसी वस्तु पर रङ्ग उत्पन्न कर देता है। अपना विशेष गुण अग्नि में गरमी का स्पर्श है, उस गुण का आश्रय द्रव्य अग्नि है, उस अग्नि का संयोग पकने वाले फल पुष्पादि से है, वहां अग्नि और फलादि के समवाय से पकने से उत्पन्न होने वाले रङ्गों की, जो पाकज हैं, उत्पत्ति होती है । इस उत्पत्ति में फलादिक उपादान कारण= समवायी हैं, तेज का संयोग असमवायी कारण है, गरमी का स्पर्श और अन्य अदृष्ट कारण मिलकर सब निमित्त कारण हैं ॥ ७ ॥ पदार्थों का उद्देश और परीक्षा की जा चुकी, जिन के तत्त्वज्ञान से मुक्ति होती है। तत्त्वज्ञान धर्म विशेष से उत्पन्न होता है, धर्मविशेष वैदिक कर्मों के करने से, वैदिककर्मजन्य पुण्य उस के ऊपर अत्यन्त श्रद्धा से बनता है । तब कहीं वैदिककर्मानुष्ठानियों को दृष्टफल के न पाने से अश्रद्धा न हो जावे, इस लिये कृपालु कणाद मुनि अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न कराते हुवे, विद्या- र्थियों को विश्वास दिलाते हैं कि- ३७१-दृष्टानां दृष्टप्रयोजनानां, दृष्टाऽभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय ८ (दृष्टानाम्) [वेद में] देखे हुये (दृष्टप्रयोजनानाम्) जिन का प्रयोजन इस लोक में ही दीखता है, उन का तथा (दृष्टाभावे) जब दृष्ट ऐहिक फल न मिले तब भी (प्रयोगः) अनुष्ठान करना (अभ्युदयाय) पारलौकिकफल के लिये [माननीय है] ॥ ८ ॥ ३७२-अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गमृषेः ॥ ६ ॥ (अस्मद्बुद्धिभ्यः) हम सर्वसाधारणों के ज्ञानों से (ऋषेः) वेद के प्रकाशक ज्ञानदाता ऋषि परमात्मा की (लिङ्गम्) पहचान होती है ॥ यदि परमात्मा ज्ञान न देता तो मनुष्यों को ज्ञान न होता । मनुष्यों को ज्ञान है, यह परमात्मा के ज्ञानदान की पहचान है ॥ ९ ॥

दशमाऽध्याय २ आह्निक १४५

दशमाऽध्याय २ आह्निक १४५ ३७३-तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ॥ १० ॥ (तद्वचनात्) उस वेदप्रकाशक ऋषि (एक मात्र ऋषि=परमात्मा) के उपदिष्ट होने से (आम्नायस्य) वेद भगवान् का (प्रामाण्यम्) स्वतः प्रामा- ण्य है ॥ १० ॥ समवायी असमवायी और निमित्त कारणों और कार्यों की परीक्षा और वेदों का प्रामाण्य इस द्वितीय आह्निक में कहा गया ॥ इति दशमाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥ इति दशमाऽध्यायः ॥ १० ॥ समाप्तं चेदं वैशेषिकदर्शनम् इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे सभाष्ये दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ १९

वैशेषिकसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका

ओ३म् वैशेषिकसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका अ-१ अ०आ०सू० २१३ अग्नेरूर्ध्वज्वलनं० ५ २ १३ | २१७ अपसर्पणमुपसर्पणं० ५ २ १७ २१३ अणुत्वमहत्त्वयोः० ७ १ १४ | २०८ अपांसंघातोविलयनं०५ २ ८ २१५ अणुत्वमहत्त्वाभ्यां० ७ १ १६ | २११ अपां संयोगाद्विभा० ५ २ ११ २१० अणुमहदिति० ७ १ ११ | २०३ अपां संयोगाभावे० ५ २ ३ १७५ अप्सुसंयोगस्त्वमसि० ५ २ ५ | १३१ अप्रसिद्धोऽनपदेशः ३ १ १५ २६७ अणोर्महतश्चोपल० ७ १ ८ | २६३ अप्सु तेजसि वायौ च ७ १ ४ १२२ अज्ञानाच्च ३ १ ६ | ८४ अप्सु शीतता २ २ ५ २६८ अतोविपरीतमक्षु । ७ १ १० | १८५ अभिघातजे मुसला० ५ १ ३ १ अथातोधर्मं व्याख्या० १ १ १ | १८७ अभिघातान्मुसल० ५ १ ५ ३५५ अदृष्टं विद्या ९ २ १२ | १०९ अभिव्यक्ति दोषात् २ २ ३१ २५५ अदृष्टाच्च ६ २ १३ | २५५ अभ्युषेचनोपवास० ६ २ २ ६१ अद्रव्यत्वेन नित्यत्व० २ १ १३ | ३३१ अभूतं नास्तीत्य० ९ १ ९ ५९ अद्रव्यमद्रव्येन द्रव्यं० २ १ ११ | ३६० अभूदित्यपि० १० १ ५ १६१ अनित्य इतिविशेषतः०४ १ ४ | २५० अयतस्य शुचिभो० ६ २ ८ १०७ अनित्यश्चायं कारणतः २ २ २८ | ३२३ अयमेष त्वया कृतं० ८ २ १ २७७ अनित्येऽनित्यं० ७ १ १८ | १६९ अरूपिष्वचाक्षुषाणि ४ .१ १२ २७४ अनित्येष्वनित्याः० ७ १ ५ | ३२५ अर्थ इति द्रव्यगुणक० ८ २ ३ १७७ अनियतदिग्देशपूर्वक०४ २ ७ | २५९ अर्थान्तरं च ६ २ ७ ४२ अनेकद्रव्यवत्त्वेन० १ २ ११ | १२४ अर्थान्तरं ह्यर्थान्तर० ३ १ ८ १६५ अनेकद्रव्यसमवायात् ४ १ ८ | १६२ अविद्या ४ १ ५ २९३ अन्यतरकर्मजः० ७ २ ९ | २८० अविद्या च विद्यालि०७ १ २१ ३७ अन्यत्रान्त्येभ्यो वि० १ २ ६ | २४८ अशुचीति शुचिप्रति०६ २ ६ १२३ अन्यदेव हेतुरित्यनप० ३ १ ७ | ३३१ असतः क्रियागुण० ९ १ ३ ८५ अपरस्मिन्नपरं० २ २ ६ | २५२ असति चाभावात् ६ २ १० | ३०१ असति नास्तीति च०७ २ १७ | ३३४ असदिति भूतप्रत्य० ९ १ ६

वैशेषिक सूत्र सूची १४७

वैशेषिक सूत्र सूची १४७ १३२ असन् सन्दिग्धश्च० ३ १ १६ ३५१ इष्टानिष्टकारणविशे० १० १ १ २६ असमवायात्सामान्य० १ १ २६ ३०९ इहेदमिति यतः० ७ २ २५. ३४१ असमाहितान्तः कर० ९ १ १३ उ-४ ३१२ अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्ग० १० २ ९ २६० उक्ता गुणाः ७ १ १ ३४८ अस्येदम् इति बुद्ध्या० ९ २ ५ ७ उत्क्षेपणामवक्षेपणं० १ १ ७ ३५४ अस्येदं कार्यं कारणं० ९ २ १ १३ उभयथा गुणाः १ १ १३ ३५५ अस्येदं कार्यकारण० ९ २ २ ए-५ १५४ अह्मिति सुखपयो० ३ २ १८ २७१ एककालत्वात् ७ १ १२ १५० अह्मिति प्रत्यगा० ३ २ १४ २९० एकत्वाभावात्० ७ २ ६ १५५ अह्मिति शब्दस्य० ३ २ ९ २८९ एकत्वैकपृथक्त्वयोः ७ २ ३ आ-२ ३०५ एकदिक्कालाभ्यां० ७ २ २१ १८८ आत्मकर्म हस्तसं० ५ १ ६ ३६३ एकदेश इत्येकस्मिन्० १० १ ७ २५९ आत्मगुणकर्मसु सं० ६ २ १७ २६६ एकद्रव्यत्वात् ७ १ ७ ३३९ आत्मन्यात्ममनसोः० ९ १ ११ १०२ एकद्रव्यत्वान्न द्रव्यं २ २ २३ ३५९ आत्ममनसोः संयो० ९ २ ६ १७ एकद्रव्यमगुणं० १ १ १७ ३४३ आत्मसमवायादात्म० ९ १ १५ ३६२ एकार्थसमवायिकार० १० १ ६ १८३ आत्मसंयोगप्रय० ५ १ १ २९२ एतदनित्ययोर्व्याख्या० ७ २ ८ २३१ आत्मन्तरगुणानां० ६ १ ५ २२२ एतेन कर्माणि गुणा० ५ २ २२ २१५ आत्मनेन्द्रियमनो० ५ २ १५ १७० एतेन गुणत्वे भावे च० ४ १ १३ १६५ आत्मनेन्द्रियार्थसंनि० ३ १ १८ ९५ एतेन दिगन्तराला० २ २ १६ १३७ आत्मनेन्द्रियार्थसंनि० ३ २ १ २७६ एतेन दीर्घत्वह्रस्वत्वे ७ १ १७ ९३ आदित्यसंयोगाद् २ २ १४ २६२ एतेन नित्येषु नित्य० ७ १ ३ ३५६ आर्षं सिद्धदर्शनं च ९ २ १३ २९४ एतेन विभागो व्या० ७ २ १० इ-३ ३४६ एतेन शाब्दं व्या० ९ २ ३ २५७ इच्छाद्वेषपूर्विकाधर्मा० ६ २ १५ २३८ एतेन हीनसमविशिष्ट० ६ १ १२ ८९ इत इदमपि० २ २ १० ३३६ एतेनाऽघटोऽग्नीः० ९ १ ८ ३५३ इन्द्रियदोषात्संस्कार ९ २ १० ८३ एतेनोष्णता व्या० २ २ ३ ११८ इन्द्रियार्थप्रसिद्धिः० ३ १ २ क-६ १९८ इषावयुगपत्संयोग० ५ १ १६ ११ कर्म कर्मसाध्यं न विद्यते १ १ ११

१६८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद ३०८ कर्मभिः कर्माणि गुणे० ७ २ २४ ग-७ २८६ कर्मभिः कर्माणि० ७ २ १२ ३२८ गुणकर्मसु गुणकर्म० ८ १ ८ २७५ कर्मभिः कर्माणि० ७ १ १५ ४० गुणकर्मसु च भावः न० १ २ ९ ४६ कर्म तु भावात् कर्म० १ २ १५ ३१५ गुणकर्मसु संनिकृष्टेषु० ८ १ ४ ३६६ कारणकारणसमवा० १० २ ६ २९८ गुणत्वात् । ७ २ १४ ७२ कारणगुणपूर्वकः कार्य० २ १ २४ २४ गुणवैधर्म्यान्न कर्मणां० १ १ २४ २६५ कारणगुणपूर्वकाः० ७ १ ६ १०५ गुणस्य सतोऽनर्थगंः० २ २ २५ ३०६ कारणपरत्वात् ० ७ २ २२ २१३ गुणान्तराभावाच्च ५ २ ३ २६८ कारणंबहुत्वाच्च । ७ १ ८ ४५ गुणेषु भावः द्वगुणत्वं० १ २ १३ १६० कारणाभावात् कार्य० ५ १ ३ २२५ गुणेदिंर्व्याख्याता । ५ २ २५ २२४ कारणं त्वसमवायिनो०५ २ २४ २८३ गुणैर्दिग्व्याख्याता । ७ १ २४ ३६४ कारणमिति द्रव्ये० १० २ १ २९९ गुणोऽपि विभाव्यते । ७ २ १५ ३६८ कारणसमवायात् ० १० २ ५ २९ गुरुत्वप्रयत्नसंयोगा० १ १ २९ ३१ कारणसामान्ये द्रव्य० १ १ ३१ च-छ १२० कारणाज्ञानात् । ३ १ ४ २४५ चातुराश्रम्यमुपघा० ६ २ ३ ७० कारणान्तरानुक्लृप्तिं० २ १ २२ ज-ह ३२ कारणाभावात्तत्कार्या० १ २ १ २५६ जातिविशेषाच्च । ६ २ १४ ३२२ कारणाद्यौगपद्यात्० ८ १ ११ ३१४ ज्ञाननिर्देशे ज्ञाननिष्प० ८ १ ३ २२६ कारणेन कालः । ५ २ २६ त-१० २८५ कारणेन कालः । ७ १ २५ ५३ त आकाशे न विद्यन्ते २ १ ५ ३६६ कारणे समवायात्० १० २ ३ १११ तत्त्वं च । १ २ २७ १२६ कार्यं कार्यान्तरस्य । ३ १ १० ७७ तत्त्वं भावेन० २ १ २९ २९१ कार्यकारणयोरेक० ७ २ ७ ८७ तत्त्वं भावेन० २ २ ८ १५ कार्यविरोधि कर्म । १ १ १४ ९१ तत्त्वं भावेन० २ २ १२ ८२ कार्यविशेषेण नाना० २ २ १३ १७१ तत्पुनः पृथिव्यादि० ५ २ १ ७३ कार्यान्तराऽप्रादुर्भा० २ १ २५ २०९ तत्र विस्फूर्जथुर्लिङ्गम् ५ २ ८ १२१ कार्येषु ज्ञानात् । ३ १ ५ १७६ तत्र शरीरं त्रिविधं० ५ २ ६ १५ क्रियागुणवत्समवा० १ १ १५ ३१३ तत्रात्मा मनश्चाप्रत्यक्षे ८ १ २ ३२९ क्रियागुणव्यपदेशा० ८ १ १ २५८ तत्संयोगोविभागः ६ २ १६ ६० क्रियावत्त्वाद्गुणव० २ १ १७

वैशेषिक सूत्र सूची १६९

वैशेषिक सूत्र सूची १६९ ३५२ तत्तत्समवायात्कर्मगुणेषु० ९ १ १४ १९ तथा गुणः । ५ १ १९ १८१ तथात्मसंयोगोहस्त० ५ १ ४ ९४ तथा दक्षिणा प्रतीची० २ २ १५ १९५ तथा दग्धस्य विस्फो० ५ १ १२ ३५० तथा द्रव्यान्तरेषु प्र० ९ १ १२ ३२८ तथापस्तेजो वायु० ८ २ ६ २८६ तथा पृथक्त्वम् । ७ २ २ २३० तथा प्रतिग्रहः । ६ १ ४ ३३५ तथाऽभावे भावप्रत्य० ९ १ १ ३६१ तथा रूपे कारणै० १० २ ४ २३९ तथा विरुद्धानान्त्या० ६ १ १३ ३५० तथा स्वप्नः । ९ २ ५ १८३ तथा हस्तसंयोगाच्च० ५ १ २ २३५ तददुष्टे न विद्यते । ६ १ ९ २१६ तदनारम्भ आत्मस्थे० ५ २ १६ ७९ तदनुविधानादेक० २ १ ३१ २८२ तदभावादणु मनः । ७ १ २३ २१८ तदभावे संयोगा० ५ २ १८ ६९ तदलिङ्गमेकद्रव्य० २ १ २१ २३२ तददुष्टभोजने न० ६ १ ६ ३५५ तद्दुष्टज्ञानम् । ९ २ ११ ३ तद्वचनादाम्नायस्य० १ १ ३ ३७३ तद्वचनादाम्नायस्य० १० २ १० २०२ तद्विशेषाददृष्टकारि० ५ २ ३ २५४ तन्मयत्वाच्च । ६ २ १२ ३५९ तयोर्निष्पत्तिः प्र० १० १ ३ ६५ तस्मादागमिकम् २ १ १७ १४४ तस्मादागमिकः ३ २ ८ १५९ तस्य कार्यं लिङ्गं ४ १ २ १३८ तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे ३ २ २ १४२ ,, ३ २ ५ २३४ तस्य समभिव्याहा० ६ १ ८ १६१ तस्याभावादव्यभि० ४ १ १० १०१ तुल्यजातीयेष्वर्था० २ २ २२ १९६ तृणे कर्म वायुसंयो० ५ १ १४ ८३ तेजस उष्णता २ २ ४ २२० तेजसो द्रव्यन्तरे० ५ २ २० ९१ तेजोरूपस्पर्शवत् २ १ ३ १६६ तेन रसगन्धस्पर्शेषु ४ १ ९ ५५ त्रपुसीसलोहरजत० २ १ ७ द-११ २२१ दिक् कालावाकाशं च० ५ २ २१ २३३ दृष्टं हिंसायाम् ६ १ ७ १४१ दृष्ट आत्मनि लिङ्गे० ३ २ ११ ८९ दृष्टं च दृष्टवत् २ २ १८ २४३ दृष्टादृष्टप्रयोजनानां ६ २ १ ३७१ दृष्टानां दृष्टप्रयोज० १० २ ८ २७२ दृष्टान्ताच्च ७ १ १३ ३२४ दृष्टेषु भावाददृष्टे० ८ २ २ १४८ देवदत्तो गच्छति० ३ २ १२ १५१ देवदत्तो गच्छती० ३ २ १५ २०५ द्रवत्वात् स्यन्दनम् ५ २ ४ १८ द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यं० १ १ १८ २१९ द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्ति० ५ २ १९ १९ द्रव्यगुणकर्मभ्योण० १ २ ८ ९ द्रव्यगुणयोः सजा० १ १ ९ ३१० द्रव्यत्वगुणत्वप्रति० ७ २ २६ ७६ द्रव्यत्वनित्यत्वे वायु० २ १ २८ ८६ ,, २ २ १