वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक २७
द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक २७ और भी हेतु हैं कि जिन से वायु का द्रव्यत्व पाया जाता है। यथा- ६०-क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वाच्च ॥ १२ ॥ (क्रियावत्त्वात्) क्रियावान् होने (च) और (गुणवत्त्वात्) गुणवान् होने से ॥ सूत्र १५ में द्रव्य का लक्षण करते हुये कह आये हैं कि क्रियावान् और गुणवान् द्रव्य होता है, तदनुसार वायु भी क्रियावान् और गुणवान् होने से द्रव्य ही है, कोई अन्य पदार्थ नहीं ॥ १२ ॥ यदि वायु द्रव्य भी है तौ भी इस को नित्यत्व क्यों कहा है, पृथिवी जलादि के समान अनित्यता क्यों नहीं ? उत्तर- ६१-अद्रव्यत्वेन नित्यत्वमुक्तम् ॥ १३ ॥ (अद्रव्यत्वेन) द्रव्यवाला न होने से (नित्यत्वम्) नित्यता (उक्तम्) कही गई ॥ लोकव्यवहार में वायु को नित्य इस कारण से कहा गया है कि वायु का कारण अन्य द्रव्य देखा नहीं जाता । यह नित्यता वास्तविक नित्यता तौ नहीं है, किन्तु व्यवहार ऐसा है ॥ १३ ॥ वायु एक है वा अनेक ? उत्तर- ६२-वायोर्वायुसंमूर्च्छनं नानात्वे लिङ्गम् ॥ १४ ॥ (वायोः) वायु से (वायुसंमूर्च्छनं) वायु की टक्कर (नानात्वे) अनेक होने में (लिङ्गम्) पहचान है ॥ यदि वायु एक होता तौ वायु से वायु की टक्कर न होती, वायु के बबूले न उठते । उठते हैं, इस से जाना जाता है कि वायु अनेक हैं । उन में एक तौ सूक्ष्म तथा अल्प वायु पृथिवी के चारों ओर लिपटा है, जिस से पृथिवीस्थ प्राणी श्वास लेकर जीवित रहते हैं, दूसरे जो पूर्व से पश्चिम वा दक्षिण वा उत्तरादि दिशा विदिशाओं में घूमते फिरते हैं । हम सदा एकसा स्पर्श (दबाव) अपने ऊपर होने से उस साधारण वायु का अनुभव नहीं कर पाते, जो हमारा जीवन है, केवल पूर्व पश्चिमादि वायुवों को आपामर सब जानते हैं ॥१४॥ ६३-वायुसंनिकर्षे प्रत्यक्षाऽभावाद् दृष्टं लिङ्गं न विद्यते ॥ १५ ॥ (वायुसंनिकर्षे) वायु के सामीप्य में (प्रत्यक्षाऽभावात्) प्रत्यक्ष न होने से (दृष्टं) दृष्ट (लिङ्गम्) चिन्ह (न) नहीं (विद्यते) है ॥
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri २८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जिस प्रकार पृथिवी आदि ३ भूत चक्षुर्विषय हैं, इस प्रकार वायु समीप होने पर भी आंख से नहीं दीखता, इस लिये इस के लिङ्ग (स्पर्श) को दृष्ट नहीं माना जाता । यहां प्रयोग किया "प्रत्यक्ष" शब्द न्यायदर्शनोक्त लाक्षणिक नहीं है, किन्तु वह " आंखों देखे " अर्थ में प्रयुक्त है । क्योंकि त्वचा इन्द्रिय का प्रत्यक्ष तो है ही है ॥ १५ ॥ ६४—सामान्यतोदृष्टाच्चाविशेषः ॥ १६ ॥ (सामान्यतोदृष्टात्) सामान्यतोदृष्ट से (च) भी (अविशेषः) सामान्य सिद्ध है ॥ जिस प्रकार विषाण पुच्छ सास्नादि को देख कर गौ बैल पहचाने जाते हैं, इस प्रकार स्पर्श से वायु नहीं पहचाना जाता है। क्योंकि वायु स्पर्श होने पर भी गौ आदि के समान दीखता नहीं, तथापि जहां २ हम क्रिया देखते हैं वहां २ किसी करण=साधन को पाते हैं, और जहां कोई गुण देखते हैं, वहां उस का आश्रयभूत कोई द्रव्य अवश्य पाते हैं, बस स्पर्श गुण को पाकर उस के आश्रय द्रव्य वायु को भी अनुमान करना चाहिये, परन्तु इस सामान्यतोदृष्ट अनुमान से इतना सिद्ध होता है कि स्पर्श का भी कोई द्रव्य है, बस इस सामान्य से अतिरिक्त विशेष वायु आदि संज्ञा नहीं सिद्ध होती, इस कारण अविशेष रहा ॥ हम देखते हैं कि रूपादि गुण अपने तेज आदि द्रव्यों के आश्रय रहते हैं, और स्पर्श भी गुण है, वह भी किसी द्रव्य के आश्रय रहना चाहिये क्योंकि १६ वें सूत्रानुसार गुण का लक्षण "द्रव्याश्रयी" आवश्यक बता चुके हैं, बस स्पर्श गुण का आश्रय द्रव्य भी कोई होना चाहिये, वही वायु है। ताशे नंगारे बजते समय हम देखते ही हैं कि द्रव्यों की परस्पर चोट से शब्द उत्पन्न होता है, तब वृक्षों के पत्तों का हिलना और उस से शब्द होना देख कर अनुमान करते हैं कि वृक्षों के पत्तों का हिलाने वाला भी कोई द्रव्य है, जो रूप वाला नहीं, क्योंकि दीखता नहीं, परन्तु स्पर्श वाला और वेग वाला है जो चलता और पत्तों से रगड़ कर शब्द करता है। जिस २ पदार्थ का धारण हम देखते हैं, वह २ धारण किसी द्रव्य द्वारा हो रहा है, जैसे पृथिवी पर्वत वृक्षादि को, वृक्षादि फलादि को धारण करते हैं, नौका को जल धारण करता है, इसी प्रकार आकाश में वृक्षों, तूलों, मेघों, विमानों CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
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और उड़ते पक्षियों को धारण करने वाला भी कोई द्रव्य होना चाहिये, पर आंख से कोई द्रव्य नहीं दीखता, क्योंकि मेघादि का धारक द्रव्य रूपवान् नहीं, जो दीख सके, परन्तु स्पर्शवान् और वेगवान् है, क्योंकि उस का स्पर्श= छूना अनुभव होता है, और वेग=टक्कर वा दबाव वा बहाव भी अनुभव होता है, वह कोई द्रव्य है, जो सामान्यतोदृष्ट होने से विशेष ज्ञात नहीं होता कि वह क्या है । सो- ६५-तस्मादागमिकम् ॥ १७ ॥ ( तस्मात् ) इस लिये ( आगमिकम् ) शब्दप्रमाणसिद्ध है ॥ शब्दप्रमाण वेदादि शास्त्र और तदनुसारी लोकव्यवहार में उस को वायु कहते हैं, इस लिये वह द्रव्य विशेष "वायु" है ॥ १७ ॥ यदि कहो कि वायु संज्ञा मात्र से विशेष क्या सिद्ध हुआ ? तो उत्तर- ६६-संज्ञाकर्म त्वस्मद्विशिष्टानां लिङ्गम् ॥ १८ ॥ ( संज्ञा ) नाम और ( कर्म ) काम ( तु ) ही तो ( अस्मद्विशिष्टानां ) हमारे विशिष्टों का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ॥ नाम और काम ही से तो आप और हम विशिष्टों (विशेष वाले पदार्थों) को पहचानते हैं, तब नाम (वायु) से विशेष क्यों सिद्ध नहीं, अवश्य है॥१८॥ क्योंकि- ६७-प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः ॥ १९ ॥ (संज्ञाकर्मणः) नाम और काम के (प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्) प्रत्यक्षप्रवृत्त होने से ॥ संसार में वस्तुओं के नाम और काम देखकर व जानकर प्रवृत्त हुवे हैं, वायु संज्ञा भी विशेष कर उस के कामों से रक्खी गई है ॥ सूत्र १८ और १९ पर पं० स्वामी हरिप्रसाद जी ने और तदनुसार पं० आर्य- मुनि जी ने एक अन्य ध्वनितार्थयुक्त भाष्य किया है, जो पाठकों के सामने रखने योग्य है । इस भाषानुवाद के पाठक आर्यभाषा में ही देखना चाहेंगे क्योंकि मनुवाद आर्य भाषा में है। इस लिये हम उक्त दोनों सूत्रों का पं० आर्यमुनि कृत भाष्य उद्धृत करते हैं जो इस प्रकार है कि:- "भाष्य - 'स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्' ऋ० ८ । ४ । १७ परमेश्वर पृथिवी आदि सब लोकों का पालन करता है, इत्यादि मन्त्रों से जो भूमि आदि की
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३२ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद पृथिवी आदि संज्ञा ‘सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन’ यजु० ३ । २- प्रज्वलित अग्नि में हवि प्रदान करे, इत्यादि मन्त्रों से अग्निहोत्रादि शुभ कर्मों का विधान तथा ‘गां मा हि सीः’ यजु० १३ । ४३=गौ आदि पशुओं की हिंसा न करे, इत्यादि, गौ आदि पशुहिंसारूप अनिष्ट कर्मों का निषेध वेदों में किया है, वह उन के ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है ॥ भाव यह है कि ‘न हीदृशस्यग्वैदादिलक्षणस्यशास्त्रस्य सर्वगुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः सम्भवोऽस्ति’ शं० भा०=भूत, भविष्यत् तथा वर्त्तमान अर्थों के प्रतिपादक ऋग्वेदादि चारों वेदों की उत्पत्ति किसी सर्वज्ञ के बिना नहीं हो सकती, इस लिये भूतादि अर्थों के प्रतिपादनपूर्वक संज्ञा कर्मादि का विधान वेदों के ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है ॥ यहां इतना विशेष स्मरण रहे कि सर्वविद्या तथा सर्व अर्थों के प्रति- पादक होने से वेदों को 'अस्मद्विशिष्ट' कहते हैं और 'जस्मत्' शब्द के प्रयोग से सूचित किया है कि वेदों के पठन पाठनादि का अधिकार मनुष्यमात्र के लिये समान है । सं० अब उक्त अर्थ में हेतु कथन करते हैं:- प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः ॥ १८ ॥ पद०-प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात् । संज्ञाकर्मणः ॥ पदा०-(संज्ञाकर्मणः ) संज्ञा तथा कर्म का प्रवर्त्तक ईश्वर है ( प्रत्यक्ष- प्रवृत्तत्वात् ) क्योंकि उस को सब पदार्थ प्रत्यक्ष हैं ॥ भाष्य-जिस को जिस विषय का प्रत्यक्ष होता है वह उस विषय में संज्ञा तथा कर्म का विधान कर सकता है, अन्य नहीं। जैसा कि 'अयं चैत्रः' इस का नाम चैत्र है, इस प्रकार पिता आदि सम्बन्धी पुत्रादिकों में चैत्रादि संज्ञा का विधान करते हैं, तथा 'पितरं भजस्व'=पिता की सेवा कर ‘जननीं मावजानीहि’ माता की अवज्ञा न कर, इस प्रकार शिष्य के प्रति आचार्यादि इष्ट कर्मों का अनुष्ठान तथा अनिष्ट कर्मों का निषेध कथन करते हैं, क्योंकि पिता आदि को पुत्रादि का तथा आचार्यादि को उक्त विहित निषिद्ध कर्म के विषय का प्रत्यक्ष है, वैसे वेदोक्त संज्ञा तथा कर्म के विषय का ईश्वर को प्रत्यक्ष है, इस लिये वह उन का प्रवर्त्तक है ॥ भाव यह है कि अल्पज्ञ होने के कारण किसी उपदेश के बिना जीवों को जगदन्तर्वर्त्ती पदार्थों की संज्ञा तथा इष्टानिष्ट कर्मों का ज्ञान नहीं हो सकता और वह स्वयं उन की संज्ञा बांधने तथा इष्टानिष्ट कर्म के जानने में
असमर्थ हैं, परन्तु वेदों में उन की संज्ञा तथा इष्टानिष्ट कर्मों का उपदेश पाया जाता है वह उन के ईश्वरोक्त हुए विना नहीं बन सक्ता, इस लिये यह अवश्य मानना पड़ता है कि वेदद्वारा जिन संज्ञा आदि का उपदेश पाया जाता है उन का उपदेष्टा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वर है और उस के उपदेष्टा होने से सिद्ध है कि वेद ईश्वरोक्त हैं और ईश्वरोक्त होने से वह स्वतः प्रमाण हैं और उन के प्रमाण होने से तत्कृत वायु आदि संज्ञा के प्रामाणिक होने में कोई सन्देह नहीं और सृष्टि के आदि में संज्ञा तथा कर्मों की प्रवृत्ति वेदों द्वारा होती है, यह सर्वसम्मत है । जैसा कि:- सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥ मनु० १।२३ में कहा है कि सृष्टि के आदि में प्रजापति परमेश्वर ने वेद शब्दों द्वारा सब के नाम, कर्म तथा लोकमर्यादा को नियमपूर्वक रचा । इसी अर्थ को वेदों में भी स्पष्ट किया है कि ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' ऋ० ८ । ८ । ४८ । ४८=परमात्मा ने सूर्य आदि लोक तथा उन के नाम, कर्म पूर्व कल्प के अनुसार निर्माण किये । इस से स्पष्ट है कि वेदों में जो इस प्रकार का अपूर्व उपदेश पाया जाता है, उस का उपदेष्टा सर्वज्ञ, सर्वशक्ति- मान् ईश्वर है और ईश्वरोक्त होने से वेद स्वतः प्रमाण तथा तत्कृत वायु संज्ञा भी प्रामाणिकी है" ॥ परन्तु हमने उक्त ध्वनियुक्त अनुवाद छोड़कर जो पृथक् अनुवाद किया है, उस में मूलसूत्रस्थ पदों की घटना से वैसा ही अर्थ निकलता जान कर किया है । जो जिस को रुचिकर हो, ग्रहण करे ॥ १९ ॥ वायु का वर्णन करके अब आकाश का वर्णन आरम्भ करते हैं कि:- ६८-निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङ्गम् ॥ २० ॥ ( निष्क्रमणं ) निकलना और ( प्रवेशनं ) प्रवेश करना ( इति ) यह ( आकाशस्य ) आकाश का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग चिह्न वा पहचान है ॥ जहां से निकलना व जिस में प्रवेश करना बन पड़े जानो कि वहां आकाश है, आकाश के विना निष्क्रमण और प्रवेश संभव नहीं । क्योंकि आकाश के सिवाय पृथिव्यादि तौ अपनी जगह में दूसरे को प्रवेश नहीं होने देते, या तौ स्वयं हटें वा दूसरे को प्रवेश करने से रोकें ॥ २० ॥
अब पूर्व सूत्र पर शङ्का करते हैं किः-
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३२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद अब पूर्व सूत्र पर शङ्का करते हैं किः- ६९-तदङ्गलिङ्गमेकद्रव्यत्वात्कर्मणः ॥ २१ ॥ ( कर्मणः ) कर्म को ( एकद्रव्यत्वात् ) एक द्रव्य वाला होने से ( तत् वह=निष्क्रमण और प्रवेश ( अलिङ्गम् ) लिङ्ग नहीं हो सकता ॥ प्रत्येक कर्म, एक द्रव्य में होता है, इसी प्रकार प्रवेश भी प्रविष्ट द्रव्य वाला है और निष्क्रमण भी निष्क्रान्त द्रव्य वाला है। इस में आकाश का लिङ्ग मानना किसी को उपपन्न नहीं होता ? ॥ २१ ॥ तथा- ७०-कारणान्तरानुक्लृप्तिवैधर्म्याच्च ॥ २२ ॥ ( का-र्म्यात् ) अन्य कारण की कल्पना के वैधर्म्य से ( च ) भी ॥ जिस कारण से जो कार्य होता पाया जावे, उसी को उस का कारण मानना चाहिये, अन्य कारण की कल्पना में वैधर्म्य है। बस निकलने बड़ने वाले द्रव्यों को जो निकलने बड़ने का स्वयं कारण हो सकते हैं, छोड़ कर एक अन्य कारण ( आकाश ) की कल्पना करना ठीक नहीं ? ॥ २२ ॥ आगे समाधान करते हैं किः- ७१-संयोगादभावः कर्मणः ॥ २३ ॥ ( संयोगात् ) संयोग से ( कर्मणः ) कर्म का ( अभावः ) अभाव है ॥ आकाश में संयोग से क्रिया नहीं, किन्तु फलसंनिधान है। कर्म क्रिय को कहते हैं और क्रिया किसी व्यापार और फल को कहते हैं, निष्क्रमर और प्रवेश दोनों व्यापार हैं, उन व्यापारों से उत्पन्न फल यह है कि निक लने और प्रवेश करने वाले पदार्थ का संयोग विशेष होना। तब आका में फल के समवाय से व्यापार का समवाय नहीं, सो तौ ठीक, परन्तु इत से आकाश को अकारण तौ नहीं कह सकते, हां उपादान कारण न सही परन्तु निमित्त कारण तौ है ही क्योंकि आकाश के बिना निष्क्रमण औ प्रवेश हो नहीं सक्ते ॥ यदि कोई कहे कि इस से आकाश का होना मात्र पाया गया, परन् निकलने बड़ने का कारण होना क्योंकर पाया गया ? उत्तर यह है कि निय पूर्ववर्त्ती को कारण कहते हैं, सो प्रत्येक प्रवेश और निष्क्रमण से आका अवश्य पूर्ववर्त्ती है, जो सर्वकालवर्त्ती और ईश्वर के समान निश्चिन किय जा सकता है । इस लिये सूत्र २२ का यह कहना कि कारणान्तर की कल्पन
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[Header: द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक ३३]
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में वैधर्म्य है, ठीक नहीं । बस प्रवेश और निष्क्रमण अवश्य आकाश के ज्ञापक लिङ्ग हैं ॥ २३ ॥ आगे यह बतलाने को कि आकाश का ही गुण शब्द है, भूमिका बांधते हैं कि- ७२-कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणोदृष्टः ॥ २४ ॥ (कार्यगुणः) कार्य का गुण (कारणगुणपूर्वकः) कारण के गुणपूर्वक (दृष्टः) देखा जाता है ॥ अर्थात् कार्य में वही गुण होते हैं जो उस के कारण में हों ॥ २४ ॥ यदि कहो कि इस से आकाश का गुण शब्द होना तो नहीं सिद्ध हुआ । तो उत्तर- ७३-कार्यान्तराऽप्रादुर्भावाच्छब्दः स्पर्शवतामगुणः ॥२५॥ (कार्यान्तराऽप्रादुर्भावात्) किसी अन्य कार्य के प्रकट न होने से (स्पर्श- वतां) स्पर्श वाले पृथिवी से वायुपर्यन्तों का (शब्दः) शब्द (अगुणः) गुण नहीं है ॥ स्पर्श वाले पृथिव्यादि ४ द्रव्यों का गुण शब्द नहीं हो सक्ता, क्योंकि पृथिव्यादि के कार्य घटपटादि से शब्द प्रकट नहीं होता, अतः शब्द को आकाश का ही गुण मानना होगा ॥ २५ ॥ यदि कहो कि परिशेष से आकाश का ही क्यों समझलें, मन वा आत्मा का गुण शब्द को क्यों न मानलें ? तो उत्तर- ७४-परत्र समवायात्प्रत्यक्षत्वाच्च नात्मगुणो न मनोगुणः ॥२६॥ (परत्र) अन्य द्रव्यों में (समवायात्) समवेत होने (च) और (प्रत्य- क्षत्वात्) प्रत्यक्ष होने से (न) न तो (आत्मगुणः) आत्मा का गुण है और (न) न (मनोगुणः) मन का गुण है ॥ शब्द को अन्य पदार्थों में समवाय सम्बन्धयुक्त पाते हैं और प्रत्यक्ष (श्रवणेन्द्रियाऽनुभूत) पाते हैं, आत्मा और मन न तो किसी से समवाय संबन्ध रखते, और न प्रत्यक्ष होते, अतएव शब्द को आत्मा वा मन का गुण नहीं कहा जासक्ता ॥ २६ ॥ किन्तु- ७५-परिशेषाल्लिङ्गमाकाशस्य ॥ २७ ॥ ५
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३४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (परिशेषात्) बच रहने से (आकाशस्य) आकाश का (लिङ्गम्) लिङ्ग वा चिन्ह [शब्द है] ॥ जब शब्द पृथिव्यादि चार भूतों का गुण नहीं, आत्मा और मन का नहीं, तब बचा केवल आकाश, इस लिये शब्द को आकाश का गुण ही समझा जाना बनता है ॥ २७ ॥ ७६-द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ २८ ॥ आकाश के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना) वायु से (व्याख्याते) व्याख्यात किये गये ॥ २७ वें सूत्र में से इस २८ वें में "आकाशस्य" पद की अनुवृत्ति है। जिस प्रकार वायु को स्पर्श गुण वाला होने से द्रव्यत्व और अन्य द्रव्य का कार्य न होने से नित्यत्व कहा गया था, इसी प्रकार आकाश को भी शब्द गुण वाला होने से द्रव्यत्व और अन्य द्रव्यकारणकता न होने से नित्यत्व समझ लेना चाहिये॥ २८ ॥ क्यों जी ! आकाश नित्य और द्रव्य तो सिद्ध हुवा, परन्तु आकाश कोई तत्त्व है, इस को कैसे मानें ? उत्तर— ७७-तत्त्वं भावेन ॥ २९ ॥ (भावेन) भाव=सत्ता से (तत्त्वम्) तत्त्व व्याख्यात समझना चाहिये ॥ जिस प्रकार भाव एक है, इसी प्रकार आकाश भी एक तत्त्व है ॥२९॥ क्योंकि- ७८-शब्दाल्लिङ्गाऽविशेषाद्विशेषलिङ्गाऽभावाच्च ॥ ३० ॥ (शब्दाल्लिङ्गाऽविशेषात्) शब्द लिङ्ग के सामान्य से (च) और (विशेष लिङ्गाऽभावात्) विशेष लिङ्ग के न होने से [आकाश एक तत्त्व है] ॥ आकाश का लिङ्ग शब्द है, सो कहीं विशेष नहीं, सर्वत्र समान है, और विशेष होने का कोई लिङ्ग=पहचान नहीं, इस लिये जिस प्रकार भाव वा सत्ता लिङ्गाऽविशेष से और विशेषलिङ्गाऽभाव से सूत्र ५८ में एक कही गई थी, इसीप्रकार आकाश को भी उन्ही कारणों से एक समझना चाहिये॥३०॥ ७९-तदनुविधानादेकपृत्वक्त्वं चेति ॥ ३१ ॥
द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक ३५
द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक ३५ ( तदनुविधानात् ) उस [ एकत्व ] के साहचर्य से ( एकपृथक्त्वं ) एक पृथक् होना ( च ) भी आकाश का सिद्ध है ( इति ) आह्निक समाप्ति के अर्थ में है ॥ जो पदार्थ एक होता है, वह सब से पृथक् भी होता है, जब आकाश एक है, तत्त्व है, तब वह पृथक् भी है, एक द्रव्य में रहने वाले पृथक्त्व को एकपृथक् समझिये ॥ ३१ ॥ इति द्वितीऽध्यायस्य प्रथममाह्निकम् —*— अथ द्वितीयाऽध्याये द्वितीयमाह्निकम् पूर्वाह्निक में पृथिवी आदि के लक्षण और आकाश तथा शब्द का वर्णन करके, इस द्वितीयाह्निक में उन की परीक्षा की जायगी । उस में प्रथम पृथिवी के लक्षण की परीक्षा करने के लिये यह कहते हैं कि पृथिवी से अन्य किसी द्रव्य का गन्ध गुण नहीं है । यथा- ८०-पुष्पवस्त्रयोः सति संनिकर्षे गुणान्तरा- ऽप्रादुर्भावोवस्त्रे गन्धाऽभावलिङ्गम् ॥ १ ॥ ( पुष्पवस्त्रयोः ) पुष्प और वस्त्र के ( संनिकर्षे ) समीप ( सति ) होने पर ( गुणान्तराऽप्रादुर्भावः ) अन्य गुण का प्रकट न होना ( वस्त्रे ) वस्त्र में ( गन्धाऽभावलिङ्गम् ) गन्ध न होने की पहचान है ॥ जब कभी गन्ध वाले पुष्प और गन्धरहित वस्त्र को एकत्र समीप रख देवें, तब भी वस्त्र में पुष्प के गुण ( गन्ध ) को प्रकट होता नहीं देखते, इस कारण समझना चाहिये कि वस्त्र में गन्ध नहीं । और जो वस्त्र को पुष्पसंसर्ग से कुछ गन्ध वस्त्र में प्रतीत होने लगता है, वह गन्ध आगन्तुक है, अपना निज का नहीं। इसी प्रकार पृथिवी के समीप होने से जिन अन्य वायु आदि में गन्ध प्रतीत होता है वह भी उन वायु आदि का निज गुण नहीं समझना चाहिये, किन्तु पृथिवी के कण उड़ कर वायु में मिल कर गन्ध की प्रतीति कराते हैं, केवल वायु में न सुगन्ध है, न दुर्गन्ध है ॥ १ ॥ ८१-व्यवस्थितः पृथिव्यां गन्धः ॥२॥
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ३४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (पृथिव्यां) पृथिवी में (गन्धः) गन्ध गुण (व्यवस्थितः) ठीक सिद्ध है ॥ २ ॥ ८२-एतेनोष्णता व्याख्याता ॥ ३ ॥ (एतेन) इस से (उष्णता) गरमी (व्याख्याता) व्याख्यात की गई ॥ पृथिवी का स्वाभाविक गन्ध गुण जिस प्रकार अन्य जलादि में सांसर्गिक प्रतीत होता है, इतने से जलादि में गन्ध निज का नहीं सिद्ध होता, इसी बात से उष्णता भी जो अग्नि का स्वाभाविक गुण है, जल वायु में सांसर्गिक समझनी चाहिये ॥ ३ ॥ आगे इसी को स्पष्ट करके कहते हैं:- ८३-तेजस उष्णता ॥ ४ ॥ (तेजसः) अग्नि तत्त्व की (उष्णता) गरमी है ॥ जैसे पृथिवी में गन्ध स्वाभाविक व्यवस्थित है, इसी प्रकार अग्नि में उष्णता व्यवस्थित है, अन्य जल वायु आदि भी उष्ण वा गर्म पाये जाते हैं सो वे अग्नि के संसर्ग से गर्म होते हैं; अपने निजगुण से नहीं ॥ ४ ॥ इसी प्रकार:- ८४-अप्सु शीतता ॥ ५ ॥ (अप्सु) जलों में (शीतता) ठंडा पन है ॥ जल में ठंडापन व्यवस्थित है। वायु भी ठंडा देखा जाता है, परन्तु वह ठंड उस में जलसंसर्ग की होती है। निज की स्वाभाविक नहीं ॥ ५ ॥ पृथिवी जल तेज वायु के लक्षणों की परीक्षा कह चुके, आगे आकाश के लक्षण शब्द की परीक्षा फिर की जायगी। अभी काल की परीक्षा इस लिये पहले करते हैं कि उस से आकाश की वा शब्द की परीक्षा सुगम हो जायगी। प्रथम तौ काल पदार्थ के होने में उस के चिह्न वा लिङ्ग वा पहचान बताते हैं:- ८५-अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि ॥ ६ ॥ (अपरस्मिन्) परले=अल्पवयस्कादि में (अपरम्) अल्पायुष्क हो का ज्ञान, (युगपत्) एक साथ (चिरम्) देरी से (क्षिप्रम्) शीघ्र (इति) ये (काललिङ्गानि) काल के चिह्न हैं ॥ इधर के में इधर का ज्ञान, उधर के में उधर का ज्ञान, एक साथ में ए साथ का ज्ञान, देरी में देर का ज्ञान, जल्दी में जल्दी का ज्ञान, इस प्रकार CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
व्यावहारिक ज्ञान, काल के लिङ्ग हैं, अर्थात् इन से काल पहचाना जाता है ॥ जिस की अपेक्षा से एक पुरुष को बालक, दूसरे को युवा, तीसरे को वृद्ध कहते हैं, सूर्य के उदय अस्त जिस के जन्म से लेकर न्यून बीते हैं, वह बालक, उस से अधिक बार जिस के सामने सूर्योदय और सूर्यास्त हो चुके, वह युवा, उस से भी अधिक बार उदयाऽस्त वाला वृद्ध कहाता है, बस जिस को लक्ष्य करके यह न्यूनाधिक व्यवस्था होती है, वह काल पदार्थ है । यदि कालकृत अन्तर वा फ़रक न हो तो युवा को वृद्ध वा वृद्ध को बालक क्यों नहीं समझ लिया जाता, काल ही है जो इन में अपने सम्बन्ध से अन्तर कराता है ॥ पृथिवी आदि ५ महाभूतों से पृथक् ही काल पदार्थ हुवा । क्योंकि पहिले, पीछे, एक साथ, शीघ्र, देर से, यह व्यवहार पृथिवी में नहीं होता, न जल में, न तेज में, न अन्य किसी द्रव्य में, इस लिये इन से पृथक् काल एक द्रव्यान्तर है, जो पदार्थ पृथिवी आदि से भिन्न है, अचेतन होने से आत्मा से भी भिन्न है, जो बूढ़े वा जवानों के देहों और सूर्य से संसर्ग करके अपनी साथी संयुक्त और संयोग स्वरूप समीपता से वा अपने से संयुक्त समवाय स्वरूप समीपता से सूर्योदयाऽस्तादि को बूढ़े वा जवानों के देहों से संबद्ध करता है, वही द्रव्य " काल " कहाता है । इसी से वरे परे देर से वा शीघ्र, इत्यादि प्रतीतियों को काल का लिङ्ग कहा गया है ॥ देशकृत वरे, परे होना, इस कालकृत वरे परे इत्यादि प्रत्यय से विलक्षण है । देशकृत अधिक परत्व को " दूर " कहते हैं । कालकृत अधिक परत्व को " चिर वा देर " कहते हैं । दूर और चिर के अर्थ में जो अन्तर है, वही देश और काल के लिङ्गों की विलक्षणता है । ॥ लोग देखते हैं कि कोई क्रिया मेरठ में हो रही है, और उसी समय वही क्रिया कलकत्ते में हो रही है, तब कालकृत संबन्ध तो दोनों स्थानों में युगपत ( एक साथ ) है, परन्तु देशकृत संबन्ध एक नहीं । मेरठ से कलकत्ता दूर समझा ही जाता है, परन्तु मेरठ में होने वाली क्रिया और कलकत्ते में होने वाली क्रिया जिस एक द्रव्य से संबद्ध हुई वह काल है ॥ ६ ॥ यदि कहो कि ऊपर के सूत्रव्याख्यान से काल कोई पदार्थ होना तो पाया गया, परन्तु उस का नित्य होना और द्रव्य होना कैसे समझा जावे ? तो उत्तर- ८६-द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ७ ॥
३८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (द्रव्यत्वनित्यत्वे) [काल के] द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना) वायु के साथ (व्याख्याते) व्याख्यात समझिये ॥ ७ ॥ यदि कहो कि द्रव्यत्व और नित्यत्व भी माना परन्तु एकत्व कैसे ? तौ उत्तर- ८७-तत्त्वं भावेन ॥ ८ ॥ (तत्त्वं) तत्त्व=एकत्व (भावेन) सत्ता से समझिये ॥ जिस प्रकार "होना"=सत्ता में लिङ्ग की अविशेषता और विशेष लिङ्ग के न होने से सत्ता एक बताई गई, इसी प्रकार वरे परे आदि काल- लिङ्गों में विशेष चिन्ह न होने, और चिन्हों में विशेष न होने से काल भी एक ही पदार्थ सिद्ध है । किन्तु वास्तव में काल एक होने पर भी उपाधि से काल में अनेकता (क्षण, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, वर्ष, युग, कल्पादि भेद व्यवहृत होते हैं ॥ ८ ॥ ८८-नित्येष्वभावादऽनित्येषु भावात्कारणे कालाख्येति ॥ ६ ॥ (नित्येषु) नित्यों में (अभावात्) न होने से और (अनित्येषु) अनित्यों में (भावात्) होने से (कारणे) कारण में (कालाख्या) काल संज्ञा है (इति) यह कालपरीक्षा प्रकरण समाप्त हुआ ॥ नित्य पदार्थ आत्मा आकाश आदि में काल (वरछा, परछा, चिर, शीघ्र आदि प्रत्ययहेतुक) नहीं रहता, और अनित्य मनुष्य पशु पक्षी घट पट आदि पदार्थों में काल (सायं, प्रातः, दिन, रात्रि, मास, वर्ष आदि) रहता है, इस हेतु से कारण की काल संज्ञा है अर्थात् काल को कारण और मनुष्य पशु पक्षी आदि को कार्य कहा जाता है। जैसा कि अथर्व १९ । ५३ में कहा है कि- कालोऽमूं दिवमऽजनयत् कालइमाः पृथिवीरुत । काले ह भूतं भव्यं चेषितं ह वितिष्ठते ॥ ५ ॥ कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम् ॥ १० ॥ कालादापः समभवन् ॥ १६ । ५४ । १ ॥ काल ने इस द्युलोक को उत्पन्न किया और काल ने इन पृथिवियों को उत्पन्न किया। काल में भूत, भविष्यत् सब ही स्थित है ॥५॥ काल ने आरम्भ में प्रजापति और प्रजाओं को उत्पन्न किया ॥ १० ॥ काल से अप् उत्पन्न हुवे १९ । ५४ । १ ॥
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इत्यादि में काल को भी सूर्य पृथिवी आदि की उत्पत्ति का कारण कहा गया है ॥ ९ ॥ काल की परीक्षा करके आगे दिशा की परीक्षा करते हैं:— ८९—इतइदमिति यतस्तद्दिश्यं लिङ्गम् ॥ १० ॥ ( इतः ) इस ओर से ( इदम् ) यह है ( इति ) यह व्यवहार ( यतः ) जिस कारण से होता है ( तत् ) वही ( दिश्यं ) दिशा का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ॥ दिशा न होती तो इधर पूर्व, इधर पश्चिम, इधर उत्तर वा दक्षिण से यह आता है, जाता है, रहता है, इत्यादि व्यवहार नहीं चलते । इन व्यवहारों का होना जिस कारण से होता है, वही कारण पदार्थ दिशा कहाता है ॥ १० ॥ ९०–द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ११ ॥ ( द्रव्यत्वनित्यत्वे ) [ दिशा का भी ] द्रव्य होना और नित्य होना ( वायुना ) वायु के नित्यत्व और द्रव्यत्व कथन से ( व्याख्याते ) कहेगये ॥ जिस प्रकार वायु अपने स्पर्श लिङ्ग से द्रव्य और कार्य न होने से नित्य है, इसी प्रकार दिशा भी अपने इधर उधर पूर्व पश्चिमादि व्यवहार लिङ्गों से द्रव्य और कार्य न होने से नित्य है । यह नित्यता व्यावहारिक है ॥ ११ ॥ ९१–तत्त्वं भावेन ॥ १२ ॥ ( तत्त्वं ) एकत्व ( भावेन ) भाव के साथ व्याख्यात है ॥ जिस प्रकार सत्ता = भाव की एकता कही थी इसी प्रकार दिशा की एकता समझनी चाहिये । यद्यपि पूर्वादि भेद से दिशा ४ वा कोणों को गिन कर ८ वा ऊपर नीचे को गिनकर ६ वा १० दिशा भी कहाती हैं, परन्तु दिशापन के सामान्य से एक ही है ॥ १२ ॥ तो फिर दिशा अनेक क्यों कहाती हैं ? उत्तर- ९२–कार्यविशेषेण नानात्वम् ॥ १३ ॥ ( कार्यविशेषेण ) कार्यविशेष से ( नानात्वम् ) दिशाओं को अनेकता है ॥ १३ ॥ प्र०-कार्यविशेष क्या है ? उत्तर- ९३–आदित्यसंयोगाद् भूतपूर्वाद्भविष्यतोभूताच्च प्राची ॥१४॥
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (भूतपूर्वात्) पहिले हो चुके (च) और (भूतात्) अब होते हुये (भविष्यतः) तथा आगे होने वाले (आदित्यसंयोगात्) सूर्योदय के संयोग से (प्राची) पूर्व दिशा का नाम होगया ॥ जिस दिशा से पहले सूर्य उदय हुआ, अब उदय होता है, आगे उदय होगा, उस दिग्विभाग को पूर्व दिशा कहते हैं। इस सूत्र में भूत=उदित= उदय होकर वर्तमान अर्थ में भूत शब्द है, क्योंकि भूतकालार्थक एक दूसरा शब्द भूतपूर्वात् पड़ा है ॥ १४ ॥ ८४-तथा दक्षिणा प्रतीच्युदीची च ॥ १५ ॥ (तथा) इसी प्रकार (दक्षिणा) दक्षिण (प्रतीची) पश्चिम (च) और (उदीची) उत्तर दिशा है ॥ जिस प्रकार सूर्य के उदय काल की दिशा का नाम पूर्व है, इसी प्रकार उदय की अपेक्षा से ठीक सामने की पश्चिम, दहिने की दक्षिण और बायें की उत्तर कहाती है ॥ १५ ॥ ८५-एतेन दिगन्तरालानि व्याख्यातानि ॥ १६ ॥ (एतेन) इसी से (दिगन्तरालानि) दिशाओं के बीच के भाग (व्याख्यातानि) कहे गये समझने चाहियें ॥ सूर्योदय से जो व्यावहारिक संज्ञा पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर नियत कर ली गई हैं, उसी से यह भी समझ लेना चाहिये कि पूर्व दक्षिण के मध्य में कोण वा अन्तराल का नाम आग्नेय, दक्षिण पश्चिम के अन्तराल का नाम नैर्ऋत, पश्चिम उत्तर का बीच=वायव्य और उत्तर पूर्व का अन्तर्वर्ती दिग्भाग ऐशान्य कहाता है ॥ १६ ॥ दिशा की परीक्षा समाप्त हुई । आगे शब्द की परीक्षा करेंगे, उस का अङ्ग समझ कर प्रथम कारण और लक्षण से संशय को उत्पन्न करते हैं:- ८६-सामान्यप्रत्यक्षाद् विशेषाऽप्रत्यक्षाद् विशेषस्मृतेश्च संशयः ॥ १७ ॥ (सामान्यप्रत्यक्षात्) सामान्य प्रत्यक्ष होने, (विशेषाऽप्रत्यक्षात्) विशेष प्रत्यक्ष न होने (च) और (विशेषस्मृतेः) विशेष के स्मरण से (संशयः) संशय होता है ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
द्वितीयाऽध्याय १ आन्हिके ४१ जब कि समझना चाहने वाला पुरुष, किसी वस्तु के सामान्य धर्म को तो जान लेता है, और विशेष धर्म को किसी निमित्त से नहीं जान पाता वा नहीं जान सकता और विशेष का स्मरण मात्र करता है, परन्तु विशेष को पाता नहीं, तब जो द्विविधायुक्त प्रत्यय होता है, वह संशय कहाता है। जैसे अपने सामने खड़े किसी पत्थर के वा काष्ठ के बने पुतले चित्र को देख कर सामान्य बातें जो पुरुष में होती हैं, वे चित्र में भी होती हैं, उन से यह निश्चय नहीं होता कि यह पुरुष है, वा स्थाणु, वा चित्र, अब देखने वाला चाहता है कि कोई विशेष-श्वास लेना, पलक मारना, बोलना, चलना, फिरना, सुखदुःखादि का अनुभव करना इत्यादि चिन्ह पाऊं तब निश्चय करूं कि यह पुरुष है, स्थाणु नहीं, परन्तु वह यह भी सोचता है कि कदाचित् विशेष हों और मैंने अभी पहचान न पाये हों, बस जब तक स्थाणु है वा पुरुष; इन दोनों में से एक का अवधारण (फ़ैसला) बुद्धि में न आजावे, तब तक जो उभयपक्षचञ्चल ज्ञान रहता है, वह संशय कहाता है ॥ १७ ॥ ९७-दृष्टं च दृष्टवत् ॥ १८ ॥ (च) और (दृष्टं) प्रत्यक्ष (दृष्टवत्) प्रत्यक्षों के तुल्य है ॥ अर्थात् संशय तब होता है, जब एक दृष्ट पदार्थ दूसरे दृष्ट पदार्थों के समान हो और विशेष स्मरण आता हो, पर जाना न जाता हो ॥ ९८-यथादृष्टमऽयथादृष्टत्वाच्च ॥ १९ ॥ (च) और (यथादृष्टं) जैसा देखा था, उस के (अयथादृष्टत्वात्) अन्य प्रकार से देखने से ॥ देवदत्त को एक काल में हमने जटा रखाये देखा, यज्ञदत्त को मूंड मुंडाये देखा, फिर दूसरे समय में शिर पर दुपट्टा बांधे हुये देवदत्त वा यज्ञ- दत्त को देखा तो हमको यह संशय होगा कि जटिल है, वा मुण्ड । क्योंकि पहले जब कि हमने देखा था तब खुले शिर देखा था, अब शिर पर वस्त्र बांधे देखते हैं, तो अयथादृष्ट होने से जटिलत्व वा मुण्डत्व का संशय हुवा ॥ ९६-विद्याऽविद्यातश्च संशयः ॥ २० ॥ (च) तथा (विद्याऽविद्यातः) विद्या और अविद्या से (संशयः) भी संशय होता है ॥ ६
४२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद पूर्व जो संशय कहा था वह दृष्ट अदृष्ट यथादृष्ट अयथादृष्ट में था, यह दूसरा संशय केवल जानने न जानने से वा विपरीत जानने से होता है ॥ आगे संशय के उदाहरणार्थ शब्दविषयक संशय दिखाने को लक्षणपूर्वक शब्द का निरूपण करते हैं:- १००-श्रोत्रग्रहणोयोऽर्थः स शब्दः ॥ २१ ॥ (यः) जो (अर्थः) विषय (श्रोत्रग्रहणः) श्रवणेन्द्रिय से ग्रहण किया जावे (सः) वह (शब्दः) शब्द है ॥ आगे इस शब्द में संशय दिखाते हैं:- १०१-तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु विशेषस्योभयथादृष्टत्वात् ॥ २२ ॥ (तुल्यजातीयेषु) शब्द के तुल्य जातिवाले रूपादि गुणों और (अर्थान्तर- भूतेषु) अन्य द्रव्यादि अर्थों में (विशेषस्य) विशेष के (उभयथादृष्टत्वात्) दोनों प्रकार देखे जाते होने से [ संशय होता है कि शब्द रूपादि गुणों में कोई गुण है; वा पृथिव्यादि द्रव्यों में कोई द्रव्य है, वा उत्क्षेपणादि कर्मों में कोई कर्म है, क्या है ? अर्थात् शब्द श्रवणेन्द्रिय से ग्रहण होता है, इतने से यह निश्चय नहीं होता कि शब्द गुण है, वा कर्म है, वा द्रव्य है, क्योंकि श्रवण से सुनाई पड़ना जो शब्द का विशेष धर्म है, वह गुणों द्रव्यों वा कर्मों में उभयत्र देखते हैं ॥ अब संशय का निवारण करने को कहते हैं कि- १०२-एकद्रव्यत्वान्न द्रव्यम् ॥ २३ ॥ (एकद्रव्यत्वात्) एक द्रव्य वाला होने से (द्रव्यम् न) शब्द द्रव्य नहीं है ॥ जो कार्यद्रव्य होते हैं, वह एक द्रव्य वाले नहीं होते, परन्तु शब्द-एक द्रव्य (आकाश) वाला है, अतएव द्रव्य नहीं ॥ शब्द के द्रव्यत्व का संशय दूर हुआ । अब कर्मत्व का संशय हटाते हैं:- १०३-नाऽपि कर्माऽचाक्षुषत्वात् ॥ २४ ॥ (अचाक्षुषत्वात्) आंख का विषय न होने से (नाऽपि) न ही (कर्म) कर्म हो सकता है ॥
द्वितीयाऽध्याय' २ आन्हिक ४३ शब्द कर्म भी नहीं है, क्योंकि आंख से नहीं दीख पड़ता । यदि कर्म होता तो आंख से दीखता ॥ यदि कहो कि जैसे कर्म शीघ्र नष्ट हो जाता है, वैसे ही शब्द भी शीघ्र नष्ट हो जाता है, तब शब्द को कर्म क्यों न मान लें ? तो उत्तरः- १०४-गुणस्य सतोऽपवर्गः कर्मभिःसाधर्म्यम् ॥ २५ ॥ (गुणस्य) गुण (सतः) होते हुवे [शब्द] का (अपवर्गः) नाश (कर्मभिः) कर्मों से (साधर्म्यम्) साधर्म्य है ॥ जब कि शब्द द्रव्य नहीं, कर्म नहीं, इन दोनों बातों को पूर्व दो सूत्रों में कह चुके और परिशेष से शब्द का गुण होना सिद्ध है, तब केवल आशु विनाशी होना मात्र शब्द के कर्मत्व को निश्चय नहीं कराता, केवल शीघ्र विनाशीपना शब्द का, कर्मों से आंशिक साधर्म्य मात्र है। किन्तु यह नियम तो नहीं कि जो जो शीघ्रनाशवान् हो, वह २ कर्म ही हो। क्योंकि संख्या, ज्ञान, सुख, दुःख इत्यादि भी तो शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, क्या इतने मात्र साधर्म्य से वे कर्म हो जाते हैं ? जब नहीं, तो शीघ्रविनाशित्व मात्र साधर्म्य से शब्द को भी कर्म नहीं कह सक्ते ॥ और १०५-सतो लिङ्गाऽभावात् ॥ २६ ॥ (सतः) अविनाशी का (लिङ्गाऽभावात्) लिङ्ग न होने से [नित्य नहीं मान सक्ते ] ॥ कोई लिङ्ग नहीं पाया जाता जिस से शब्द को अविनाशी वा नित्य मान सकें ॥ तथा- १०६-नित्यवैधर्म्यात् ॥ २७ ॥ (नि-र्म्यात्) नित्य वैधर्म्य से [शब्द नित्य नहीं ] ॥ नित्य पदार्थ के धर्म हैं कि वह उत्पन्न और नष्ट न हो, परन्तु शब्द उत्पन्न और नष्ट भी होता है, इस लिये शब्द का नित्य पदार्थों से धर्म नहीं मिलता किन्तु वैधर्म्य है, इस वैधर्म्य से शब्द अनित्य है ॥ १०७-अनित्यश्चाऽयं कारणतः ॥ २८ ॥ (अयं) यह शब्द (कारणतः) कारण से (च) भी (अनित्यः) अनित्य है ॥
शब्द अनित्य है, कारण वाला होने से, जैसे घट अनित्य है, कारण वाला होने से ॥ यदि कहो कि शब्द का कारणवान् होना ही कहां सिद्ध है ? तो उत्तर १०८-नच्चाऽसिद्धं विकारात् ॥ २९ ॥ (विकारात्) विकार से (असिद्धं) शब्द का कारणवान् होना असिद्ध (च) भी (न) नहीं ॥ क्योंकि शब्द विकारयुक्त है, कार्य है, अतएव उस का कारणवत्त्व असिद्ध नहीं। यदि कहो कि हम तो शब्द की अभिव्यक्ति मात्र मानते हैं, उत्पत्ति नहीं, तो उत्तर:- १०९-अभिव्यक्तौ दोषात् ॥ ३० ॥ (अभिव्यक्तौ) अभिव्यक्ति में (दोषात्) दोष से ॥ अभिव्यक्ति में दोष है इस लिये अभिव्यक्ति मानना ठीक नहीं । दोष यह है कि शब्द को अभिव्यक्त मानें तो एक अक्षर के अभिव्यञ्जक कारण से समस्त अक्षर अभिव्यक्त (प्रकट) हो जाते, पर ऐसा है नहीं, इस लिये समझना चाहिये कि शब्द अभिव्यक्त नहीं होता, किन्तु उत्पन्न होता है और उत्पत्ति अपने कारण आकाश से होती है॥ क्योंकि हम देखते हैं कि- ११०-संयोगाद्विभागाच्छब्दाच्च शब्दनिष्पत्तिः ॥ ३१ ॥ (संयोगात्) संयोग से (विभागात्) विभाग से (च) और (शब्दात्) शब्द से (शब्दनिष्पत्तिः) शब्द उत्पन्न होता है ॥ प्रथम शब्द संयोग वा विभाग से उत्पन्न होता है, फिर शब्द से भी शब्द उत्पन्न होने लगता है । शब्द दो प्रकार का है, एक वर्णरूप, दूसरा ध्वनिरूप । वर्णरूप अ क च ट त प अथवा वर्ण जुड़ कर घट पट राम कृष्ण आदि शब्दरूप, अथवा मैं जाता हूं, तुम पढ़ते हो, इत्यादि वाक्यरूप, इसी प्रकार अध्यायरूप और ग्रन्थरूप भी । दूसरा ध्वनिरूप, जैसे लकड़ी टूटने, पत्ते हिलने, वा भेरी दुन्दुभि आदि बाजों में से निकलने वाला शब्द है । वर्णरूप शब्द संयोग और शब्द से निकलते हैं और ध्वनिरूप शब्द-संयोग, विभाग और शब्द, तीनों से निकलते हैं । वर्णात्मक शब्द का कारण कण्ठादिस्थान से वायु का संयोग है । वायु से चोट खाये हुए कण्ठादि का आकाश से संयोग होना असमवायी कारण है ॥
द्वितीयाऽध्याय २ आन्हिक ४५
पूर्व अभ्यास किये वर्णों की स्मृति की अपेक्षा से आत्मा और मन के संयोग से पहले वर्णोच्चारण की इच्छा होती है, फिर प्रयत्न. उस प्रयत्न की अपेक्षा करते हुये मन और वायु के संयोग से उदरस्थ वायु में कर्म होता है, उस से ऊपर को चलता हुवा वायु फिर कण्ठादि में चोट करता है, उस चोट से कण्ठादि आकाश से संयोग करते हैं, तब अक्षर (आकाश कारण से) उत्पन्न होते हैं । यह क्रम है ॥ ध्वन्यात्मक शब्द में प्रथम नङ्गारे और दण्डे का संयोग होता है, वह निमित्त कारण है, नङ्गारे और आकाश का संयोग असमवायी कारण है । इसी प्रकार वंश के टूटने पर जो शब्द होता है, उस का निमित्त कारण विभाग है और वंश और आकाश का विभाग असमवायी कारण है । और जब एक स्थान का शब्द दूसरे दूर स्थान में सुनाई देता है, तब शब्द से शब्द उत्पन्न होता जाता है और परस्पर तार सा पुरता चला जाता है । क्योंकि जब हम दूरस्थ शब्द को सुनते हैं तो हमारे कान तो शब्दोत्पत्ति के स्थान तक जाते नहीं । शब्द स्वयं भी हम तक चलकर नहीं आ सकता, क्योंकि शब्द गुण है और क्रियारहित है और बिना प्राप्त हुवे को ग्रहण करना भी हमारे कानों वा किन्हीं अन्य इन्द्रियों का सामर्थ्य नहीं, तब फिर दूरस्थ शब्द क्यों सुनाई पड़ता है ? उत्तर में कहना पड़ेगा कि जहां शब्द हुवा, उस ने अपने समीप दूसरा शब्द उत्पन्न कर दिया, उस ने फिर और शब्द उत्पन्न कर दिया, बस जैसे पानी की एक लहर अपने से आगे लहर को उत्पन्न करती है और वह फिर उस से आगे एक अन्य लहर को उत्पन्न करती है । इसी प्रकार शब्द से शब्द उत्पन्न होता हुवा, दूरस्थ पुरुष के कानों को सुनाई पड़ता है और जिस प्रकार जलाशय में मृत्पिण्ड फेंकने से जो ऊंची लहरी वा तरङ्ग उत्पन्न होती है, वह फिर आगे अधिक फैली हुई कुछ नीची तरङ्ग को उत्पन्न करती है, उस से और भी नीची, और अन्त में कम होते २ तरङ्ग नहीं दीख पड़ती, इसी प्रकार तोपों तक के घोर भारी शब्द भी ज्यों २ दूर पहुंचते जाते हैं, कम होते जाते हैं । इस प्रकार शब्द से शब्दसन्तान में वायु आदि निमित्त कारण और पूर्व पूर्व शब्द असमवायी कारण है । और जितनी २ दूर में शब्द उत्पन्न होता है, उतना २ वहां २ का आकाश उस शब्द का समवायी कारण वा उपादान कारण होता है ॥ यदि कहो कि शब्द की उत्पत्ति संयोगादि कारणों से हो, इतने से शब्द की नित्यता क्या सिद्ध हुई ? तो उत्तर-
५६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १११-लिङ्गाच्चाऽनित्यः शब्दः ॥ ३२ ॥ ( लिङ्गात् ) लिङ्ग से ( च ) भी ( शब्दः ) शब्द (अनित्यः) अनित्य है। उत्पत्तिमान् होना शब्द का लिङ्ग है, उस से भी शब्द की अनित्यता सिद्ध है ॥ आगे पूर्व पक्ष करते हैं:- ११२-द्वयोस्तु प्रवृत्त्योरभावात् ॥ ३३ ॥ ( द्वयोः ) दोनों ( तु ) ही ( प्रवृत्त्योः ) प्रवृत्तियों के ( अभावात् ) अभाव से ॥ यदि शब्द अनित्य होता तो दोनों (गुरु शिष्यों) की प्रवृत्तियें न होतीं। क्योंकि अध्यापक जिस अनित्य शब्द को पढ़ाने में उच्चारण करता, वह तो उच्चारण करते ही नष्ट हो जाता, अतः फिर अध्येता शिष्य उसी शब्द की पुनरावृत्ति न कर सकता, क्यों कि गुरु का बताया तो उसी समय नष्ट हो गया समझना चाहिये, परन्तु हम देखते हैं कि गुरु के उच्चारण किये शब्दों को शिष्य ज्यों का त्यों बोलते हैं, जिस से शब्द अनित्य नहीं, किन्तु नित्य जान पड़ता है ॥ अन्य हेतु से भी शब्द अनित्य नहीं जान पड़ता कि- ११३-प्रथमाशब्दात् ॥ ३४ ॥ ( प्र-शब्दात् ) प्रथमा शब्द से ॥ ऐतरेय ब्राह्मण ३ । ३ में लिखा है कि-"त्रिः प्रथमामन्वाह, त्रिरुत्तमाम्” ऋग्वेद ३ । २१ । १ से ११ तक ऋचायें सामिधेनी संज्ञक हैं, उन में से प्रथमा ( पहली ) ऋचा को तीन बार पढ़ा जाता है और अन्त की ऋचा को भी। यदि शब्द अनित्य होता तो एक ऋचा ३ बार कैसे पढ़ी जाती क्योंकि एक वार पढ़ी हुई अगले क्षण में शब्द की अनित्यता से नष्ट हो जाती, इस से पाया जाता है कि शब्द अनित्य वा उच्चरितप्रध्वंसी नहीं, किन्तु स्थिर वा नित्य है ॥ इसी पक्ष में तीसरा हेतु और भी देते हैं कि:- ११४-सम्प्रतिपत्तिभावाच्च ॥ ३५ ॥ ( संप्र-भावात् ) ठीक २ पहचान रहने से ( च ) भी ॥ यदि शब्द अनित्य होता तो एक के शब्द को सुन कर दूसरा सम्प्रति पत्ति=प्रत्यभिज्ञा=याद=पहचान कर ठीक २ उस का अनुकरण न कर