भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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३४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (परिशेषात्) बच रहने से (आकाशस्य) आकाश का (लिङ्गम्) लिङ्ग वा चिन्ह [शब्द है] ॥ जब शब्द पृथिव्यादि चार भूतों का गुण नहीं, आत्मा और मन का नहीं, तब बचा केवल आकाश, इस लिये शब्द को आकाश का गुण ही समझा जाना बनता है ॥ २७ ॥ ७६-द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ २८ ॥ आकाश के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना) वायु से (व्याख्याते) व्याख्यात किये गये ॥ २७ वें सूत्र में से इस २८ वें में "आकाशस्य" पद की अनुवृत्ति है। जिस प्रकार वायु को स्पर्श गुण वाला होने से द्रव्यत्व और अन्य द्रव्य का कार्य न होने से नित्यत्व कहा गया था, इसी प्रकार आकाश को भी शब्द गुण वाला होने से द्रव्यत्व और अन्य द्रव्यकारणकता न होने से नित्यत्व समझ लेना चाहिये॥ २८ ॥ क्यों जी ! आकाश नित्य और द्रव्य तो सिद्ध हुवा, परन्तु आकाश कोई तत्त्व है, इस को कैसे मानें ? उत्तर— ७७-तत्त्वं भावेन ॥ २९ ॥ (भावेन) भाव=सत्ता से (तत्त्वम्) तत्त्व व्याख्यात समझना चाहिये ॥ जिस प्रकार भाव एक है, इसी प्रकार आकाश भी एक तत्त्व है ॥२९॥ क्योंकि- ७८-शब्दाल्लिङ्गाऽविशेषाद्विशेषलिङ्गाऽभावाच्च ॥ ३० ॥ (शब्दाल्लिङ्गाऽविशेषात्) शब्द लिङ्ग के सामान्य से (च) और (विशेष लिङ्गाऽभावात्) विशेष लिङ्ग के न होने से [आकाश एक तत्त्व है] ॥ आकाश का लिङ्ग शब्द है, सो कहीं विशेष नहीं, सर्वत्र समान है, और विशेष होने का कोई लिङ्ग=पहचान नहीं, इस लिये जिस प्रकार भाव वा सत्ता लिङ्गाऽविशेष से और विशेषलिङ्गाऽभाव से सूत्र ५८ में एक कही गई थी, इसीप्रकार आकाश को भी उन्ही कारणों से एक समझना चाहिये॥३०॥ ७९-तदनुविधानादेकपृत्वक्त्वं चेति ॥ ३१ ॥