वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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[Header: द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक ३३]
में वैधर्म्य है, ठीक नहीं । बस प्रवेश और निष्क्रमण अवश्य आकाश के ज्ञापक लिङ्ग हैं ॥ २३ ॥ आगे यह बतलाने को कि आकाश का ही गुण शब्द है, भूमिका बांधते हैं कि- ७२-कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणोदृष्टः ॥ २४ ॥ (कार्यगुणः) कार्य का गुण (कारणगुणपूर्वकः) कारण के गुणपूर्वक (दृष्टः) देखा जाता है ॥ अर्थात् कार्य में वही गुण होते हैं जो उस के कारण में हों ॥ २४ ॥ यदि कहो कि इस से आकाश का गुण शब्द होना तो नहीं सिद्ध हुआ । तो उत्तर- ७३-कार्यान्तराऽप्रादुर्भावाच्छब्दः स्पर्शवतामगुणः ॥२५॥ (कार्यान्तराऽप्रादुर्भावात्) किसी अन्य कार्य के प्रकट न होने से (स्पर्श- वतां) स्पर्श वाले पृथिवी से वायुपर्यन्तों का (शब्दः) शब्द (अगुणः) गुण नहीं है ॥ स्पर्श वाले पृथिव्यादि ४ द्रव्यों का गुण शब्द नहीं हो सक्ता, क्योंकि पृथिव्यादि के कार्य घटपटादि से शब्द प्रकट नहीं होता, अतः शब्द को आकाश का ही गुण मानना होगा ॥ २५ ॥ यदि कहो कि परिशेष से आकाश का ही क्यों समझलें, मन वा आत्मा का गुण शब्द को क्यों न मानलें ? तो उत्तर- ७४-परत्र समवायात्प्रत्यक्षत्वाच्च नात्मगुणो न मनोगुणः ॥२६॥ (परत्र) अन्य द्रव्यों में (समवायात्) समवेत होने (च) और (प्रत्य- क्षत्वात्) प्रत्यक्ष होने से (न) न तो (आत्मगुणः) आत्मा का गुण है और (न) न (मनोगुणः) मन का गुण है ॥ शब्द को अन्य पदार्थों में समवाय सम्बन्धयुक्त पाते हैं और प्रत्यक्ष (श्रवणेन्द्रियाऽनुभूत) पाते हैं, आत्मा और मन न तो किसी से समवाय संबन्ध रखते, और न प्रत्यक्ष होते, अतएव शब्द को आत्मा वा मन का गुण नहीं कहा जासक्ता ॥ २६ ॥ किन्तु- ७५-परिशेषाल्लिङ्गमाकाशस्य ॥ २७ ॥ ५
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.