वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअसमर्थ हैं, परन्तु वेदों में उन की संज्ञा तथा इष्टानिष्ट कर्मों का उपदेश पाया जाता है वह उन के ईश्वरोक्त हुए विना नहीं बन सक्ता, इस लिये यह अवश्य मानना पड़ता है कि वेदद्वारा जिन संज्ञा आदि का उपदेश पाया जाता है उन का उपदेष्टा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वर है और उस के उपदेष्टा होने से सिद्ध है कि वेद ईश्वरोक्त हैं और ईश्वरोक्त होने से वह स्वतः प्रमाण हैं और उन के प्रमाण होने से तत्कृत वायु आदि संज्ञा के प्रामाणिक होने में कोई सन्देह नहीं और सृष्टि के आदि में संज्ञा तथा कर्मों की प्रवृत्ति वेदों द्वारा होती है, यह सर्वसम्मत है । जैसा कि:- सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥ मनु० १।२३ में कहा है कि सृष्टि के आदि में प्रजापति परमेश्वर ने वेद शब्दों द्वारा सब के नाम, कर्म तथा लोकमर्यादा को नियमपूर्वक रचा । इसी अर्थ को वेदों में भी स्पष्ट किया है कि ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' ऋ० ८ । ८ । ४८ । ४८=परमात्मा ने सूर्य आदि लोक तथा उन के नाम, कर्म पूर्व कल्प के अनुसार निर्माण किये । इस से स्पष्ट है कि वेदों में जो इस प्रकार का अपूर्व उपदेश पाया जाता है, उस का उपदेष्टा सर्वज्ञ, सर्वशक्ति- मान् ईश्वर है और ईश्वरोक्त होने से वेद स्वतः प्रमाण तथा तत्कृत वायु संज्ञा भी प्रामाणिकी है" ॥ परन्तु हमने उक्त ध्वनियुक्त अनुवाद छोड़कर जो पृथक् अनुवाद किया है, उस में मूलसूत्रस्थ पदों की घटना से वैसा ही अर्थ निकलता जान कर किया है । जो जिस को रुचिकर हो, ग्रहण करे ॥ १९ ॥ वायु का वर्णन करके अब आकाश का वर्णन आरम्भ करते हैं कि:- ६८-निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङ्गम् ॥ २० ॥ ( निष्क्रमणं ) निकलना और ( प्रवेशनं ) प्रवेश करना ( इति ) यह ( आकाशस्य ) आकाश का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग चिह्न वा पहचान है ॥ जहां से निकलना व जिस में प्रवेश करना बन पड़े जानो कि वहां आकाश है, आकाश के विना निष्क्रमण और प्रवेश संभव नहीं । क्योंकि आकाश के सिवाय पृथिव्यादि तौ अपनी जगह में दूसरे को प्रवेश नहीं होने देते, या तौ स्वयं हटें वा दूसरे को प्रवेश करने से रोकें ॥ २० ॥