वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद पृथिवी आदि संज्ञा ‘सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन’ यजु० ३ । २- प्रज्वलित अग्नि में हवि प्रदान करे, इत्यादि मन्त्रों से अग्निहोत्रादि शुभ कर्मों का विधान तथा ‘गां मा हि सीः’ यजु० १३ । ४३=गौ आदि पशुओं की हिंसा न करे, इत्यादि, गौ आदि पशुहिंसारूप अनिष्ट कर्मों का निषेध वेदों में किया है, वह उन के ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है ॥ भाव यह है कि ‘न हीदृशस्यग्वैदादिलक्षणस्यशास्त्रस्य सर्वगुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः सम्भवोऽस्ति’ शं० भा०=भूत, भविष्यत् तथा वर्त्तमान अर्थों के प्रतिपादक ऋग्वेदादि चारों वेदों की उत्पत्ति किसी सर्वज्ञ के बिना नहीं हो सकती, इस लिये भूतादि अर्थों के प्रतिपादनपूर्वक संज्ञा कर्मादि का विधान वेदों के ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है ॥ यहां इतना विशेष स्मरण रहे कि सर्वविद्या तथा सर्व अर्थों के प्रति- पादक होने से वेदों को 'अस्मद्विशिष्ट' कहते हैं और 'जस्मत्' शब्द के प्रयोग से सूचित किया है कि वेदों के पठन पाठनादि का अधिकार मनुष्यमात्र के लिये समान है । सं० अब उक्त अर्थ में हेतु कथन करते हैं:- प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः ॥ १८ ॥ पद०-प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात् । संज्ञाकर्मणः ॥ पदा०-(संज्ञाकर्मणः ) संज्ञा तथा कर्म का प्रवर्त्तक ईश्वर है ( प्रत्यक्ष- प्रवृत्तत्वात् ) क्योंकि उस को सब पदार्थ प्रत्यक्ष हैं ॥ भाष्य-जिस को जिस विषय का प्रत्यक्ष होता है वह उस विषय में संज्ञा तथा कर्म का विधान कर सकता है, अन्य नहीं। जैसा कि 'अयं चैत्रः' इस का नाम चैत्र है, इस प्रकार पिता आदि सम्बन्धी पुत्रादिकों में चैत्रादि संज्ञा का विधान करते हैं, तथा 'पितरं भजस्व'=पिता की सेवा कर ‘जननीं मावजानीहि’ माता की अवज्ञा न कर, इस प्रकार शिष्य के प्रति आचार्यादि इष्ट कर्मों का अनुष्ठान तथा अनिष्ट कर्मों का निषेध कथन करते हैं, क्योंकि पिता आदि को पुत्रादि का तथा आचार्यादि को उक्त विहित निषिद्ध कर्म के विषय का प्रत्यक्ष है, वैसे वेदोक्त संज्ञा तथा कर्म के विषय का ईश्वर को प्रत्यक्ष है, इस लिये वह उन का प्रवर्त्तक है ॥ भाव यह है कि अल्पज्ञ होने के कारण किसी उपदेश के बिना जीवों को जगदन्तर्वर्त्ती पदार्थों की संज्ञा तथा इष्टानिष्ट कर्मों का ज्ञान नहीं हो सकता और वह स्वयं उन की संज्ञा बांधने तथा इष्टानिष्ट कर्म के जानने में