वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीयाऽध्याय १ आन्हिक १८ [/Header]
और उड़ते पक्षियों को धारण करने वाला भी कोई द्रव्य होना चाहिये, पर आंख से कोई द्रव्य नहीं दीखता, क्योंकि मेघादि का धारक द्रव्य रूपवान् नहीं, जो दीख सके, परन्तु स्पर्शवान् और वेगवान् है, क्योंकि उस का स्पर्श= छूना अनुभव होता है, और वेग=टक्कर वा दबाव वा बहाव भी अनुभव होता है, वह कोई द्रव्य है, जो सामान्यतोदृष्ट होने से विशेष ज्ञात नहीं होता कि वह क्या है । सो- ६५-तस्मादागमिकम् ॥ १७ ॥ ( तस्मात् ) इस लिये ( आगमिकम् ) शब्दप्रमाणसिद्ध है ॥ शब्दप्रमाण वेदादि शास्त्र और तदनुसारी लोकव्यवहार में उस को वायु कहते हैं, इस लिये वह द्रव्य विशेष "वायु" है ॥ १७ ॥ यदि कहो कि वायु संज्ञा मात्र से विशेष क्या सिद्ध हुआ ? तो उत्तर- ६६-संज्ञाकर्म त्वस्मद्विशिष्टानां लिङ्गम् ॥ १८ ॥ ( संज्ञा ) नाम और ( कर्म ) काम ( तु ) ही तो ( अस्मद्विशिष्टानां ) हमारे विशिष्टों का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ॥ नाम और काम ही से तो आप और हम विशिष्टों (विशेष वाले पदार्थों) को पहचानते हैं, तब नाम (वायु) से विशेष क्यों सिद्ध नहीं, अवश्य है॥१८॥ क्योंकि- ६७-प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः ॥ १९ ॥ (संज्ञाकर्मणः) नाम और काम के (प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्) प्रत्यक्षप्रवृत्त होने से ॥ संसार में वस्तुओं के नाम और काम देखकर व जानकर प्रवृत्त हुवे हैं, वायु संज्ञा भी विशेष कर उस के कामों से रक्खी गई है ॥ सूत्र १८ और १९ पर पं० स्वामी हरिप्रसाद जी ने और तदनुसार पं० आर्य- मुनि जी ने एक अन्य ध्वनितार्थयुक्त भाष्य किया है, जो पाठकों के सामने रखने योग्य है । इस भाषानुवाद के पाठक आर्यभाषा में ही देखना चाहेंगे क्योंकि मनुवाद आर्य भाषा में है। इस लिये हम उक्त दोनों सूत्रों का पं० आर्यमुनि कृत भाष्य उद्धृत करते हैं जो इस प्रकार है कि:- "भाष्य - 'स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्' ऋ० ८ । ४ । १७ परमेश्वर पृथिवी आदि सब लोकों का पालन करता है, इत्यादि मन्त्रों से जो भूमि आदि की
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