वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द अनित्य है, कारण वाला होने से, जैसे घट अनित्य है, कारण वाला होने से ॥ यदि कहो कि शब्द का कारणवान् होना ही कहां सिद्ध है ? तो उत्तर १०८-नच्चाऽसिद्धं विकारात् ॥ २९ ॥ (विकारात्) विकार से (असिद्धं) शब्द का कारणवान् होना असिद्ध (च) भी (न) नहीं ॥ क्योंकि शब्द विकारयुक्त है, कार्य है, अतएव उस का कारणवत्त्व असिद्ध नहीं। यदि कहो कि हम तो शब्द की अभिव्यक्ति मात्र मानते हैं, उत्पत्ति नहीं, तो उत्तर:- १०९-अभिव्यक्तौ दोषात् ॥ ३० ॥ (अभिव्यक्तौ) अभिव्यक्ति में (दोषात्) दोष से ॥ अभिव्यक्ति में दोष है इस लिये अभिव्यक्ति मानना ठीक नहीं । दोष यह है कि शब्द को अभिव्यक्त मानें तो एक अक्षर के अभिव्यञ्जक कारण से समस्त अक्षर अभिव्यक्त (प्रकट) हो जाते, पर ऐसा है नहीं, इस लिये समझना चाहिये कि शब्द अभिव्यक्त नहीं होता, किन्तु उत्पन्न होता है और उत्पत्ति अपने कारण आकाश से होती है॥ क्योंकि हम देखते हैं कि- ११०-संयोगाद्विभागाच्छब्दाच्च शब्दनिष्पत्तिः ॥ ३१ ॥ (संयोगात्) संयोग से (विभागात्) विभाग से (च) और (शब्दात्) शब्द से (शब्दनिष्पत्तिः) शब्द उत्पन्न होता है ॥ प्रथम शब्द संयोग वा विभाग से उत्पन्न होता है, फिर शब्द से भी शब्द उत्पन्न होने लगता है । शब्द दो प्रकार का है, एक वर्णरूप, दूसरा ध्वनिरूप । वर्णरूप अ क च ट त प अथवा वर्ण जुड़ कर घट पट राम कृष्ण आदि शब्दरूप, अथवा मैं जाता हूं, तुम पढ़ते हो, इत्यादि वाक्यरूप, इसी प्रकार अध्यायरूप और ग्रन्थरूप भी । दूसरा ध्वनिरूप, जैसे लकड़ी टूटने, पत्ते हिलने, वा भेरी दुन्दुभि आदि बाजों में से निकलने वाला शब्द है । वर्णरूप शब्द संयोग और शब्द से निकलते हैं और ध्वनिरूप शब्द-संयोग, विभाग और शब्द, तीनों से निकलते हैं । वर्णात्मक शब्द का कारण कण्ठादिस्थान से वायु का संयोग है । वायु से चोट खाये हुए कण्ठादि का आकाश से संयोग होना असमवायी कारण है ॥