वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद पूर्व जो संशय कहा था वह दृष्ट अदृष्ट यथादृष्ट अयथादृष्ट में था, यह दूसरा संशय केवल जानने न जानने से वा विपरीत जानने से होता है ॥ आगे संशय के उदाहरणार्थ शब्दविषयक संशय दिखाने को लक्षणपूर्वक शब्द का निरूपण करते हैं:- १००-श्रोत्रग्रहणोयोऽर्थः स शब्दः ॥ २१ ॥ (यः) जो (अर्थः) विषय (श्रोत्रग्रहणः) श्रवणेन्द्रिय से ग्रहण किया जावे (सः) वह (शब्दः) शब्द है ॥ आगे इस शब्द में संशय दिखाते हैं:- १०१-तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु विशेषस्योभयथादृष्टत्वात् ॥ २२ ॥ (तुल्यजातीयेषु) शब्द के तुल्य जातिवाले रूपादि गुणों और (अर्थान्तर- भूतेषु) अन्य द्रव्यादि अर्थों में (विशेषस्य) विशेष के (उभयथादृष्टत्वात्) दोनों प्रकार देखे जाते होने से [ संशय होता है कि शब्द रूपादि गुणों में कोई गुण है; वा पृथिव्यादि द्रव्यों में कोई द्रव्य है, वा उत्क्षेपणादि कर्मों में कोई कर्म है, क्या है ? अर्थात् शब्द श्रवणेन्द्रिय से ग्रहण होता है, इतने से यह निश्चय नहीं होता कि शब्द गुण है, वा कर्म है, वा द्रव्य है, क्योंकि श्रवण से सुनाई पड़ना जो शब्द का विशेष धर्म है, वह गुणों द्रव्यों वा कर्मों में उभयत्र देखते हैं ॥ अब संशय का निवारण करने को कहते हैं कि- १०२-एकद्रव्यत्वान्न द्रव्यम् ॥ २३ ॥ (एकद्रव्यत्वात्) एक द्रव्य वाला होने से (द्रव्यम् न) शब्द द्रव्य नहीं है ॥ जो कार्यद्रव्य होते हैं, वह एक द्रव्य वाले नहीं होते, परन्तु शब्द-एक द्रव्य (आकाश) वाला है, अतएव द्रव्य नहीं ॥ शब्द के द्रव्यत्व का संशय दूर हुआ । अब कर्मत्व का संशय हटाते हैं:- १०३-नाऽपि कर्माऽचाक्षुषत्वात् ॥ २४ ॥ (अचाक्षुषत्वात्) आंख का विषय न होने से (नाऽपि) न ही (कर्म) कर्म हो सकता है ॥