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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

४२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद पूर्व जो संशय कहा था वह दृष्ट अदृष्ट यथादृष्ट अयथादृष्ट में था, यह दूसरा संशय केवल जानने न जानने से वा विपरीत जानने से होता है ॥ आगे संशय के उदाहरणार्थ शब्दविषयक संशय दिखाने को लक्षणपूर्वक शब्द का निरूपण करते हैं:- १००-श्रोत्रग्रहणोयोऽर्थः स शब्दः ॥ २१ ॥ (यः) जो (अर्थः) विषय (श्रोत्रग्रहणः) श्रवणेन्द्रिय से ग्रहण किया जावे (सः) वह (शब्दः) शब्द है ॥ आगे इस शब्द में संशय दिखाते हैं:- १०१-तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु विशेषस्योभयथादृष्टत्वात् ॥ २२ ॥ (तुल्यजातीयेषु) शब्द के तुल्य जातिवाले रूपादि गुणों और (अर्थान्तर- भूतेषु) अन्य द्रव्यादि अर्थों में (विशेषस्य) विशेष के (उभयथादृष्टत्वात्) दोनों प्रकार देखे जाते होने से [ संशय होता है कि शब्द रूपादि गुणों में कोई गुण है; वा पृथिव्यादि द्रव्यों में कोई द्रव्य है, वा उत्क्षेपणादि कर्मों में कोई कर्म है, क्या है ? अर्थात् शब्द श्रवणेन्द्रिय से ग्रहण होता है, इतने से यह निश्चय नहीं होता कि शब्द गुण है, वा कर्म है, वा द्रव्य है, क्योंकि श्रवण से सुनाई पड़ना जो शब्द का विशेष धर्म है, वह गुणों द्रव्यों वा कर्मों में उभयत्र देखते हैं ॥ अब संशय का निवारण करने को कहते हैं कि- १०२-एकद्रव्यत्वान्न द्रव्यम् ॥ २३ ॥ (एकद्रव्यत्वात्) एक द्रव्य वाला होने से (द्रव्यम् न) शब्द द्रव्य नहीं है ॥ जो कार्यद्रव्य होते हैं, वह एक द्रव्य वाले नहीं होते, परन्तु शब्द-एक द्रव्य (आकाश) वाला है, अतएव द्रव्य नहीं ॥ शब्द के द्रव्यत्व का संशय दूर हुआ । अब कर्मत्व का संशय हटाते हैं:- १०३-नाऽपि कर्माऽचाक्षुषत्वात् ॥ २४ ॥ (अचाक्षुषत्वात्) आंख का विषय न होने से (नाऽपि) न ही (कर्म) कर्म हो सकता है ॥

द्वितीयाऽध्याय' २ आन्हिक ४३ शब्द कर्म भी नहीं है, क्योंकि आंख से नहीं दीख पड़ता । यदि कर्म होता तो आंख से दीखता ॥ यदि कहो कि जैसे कर्म शीघ्र नष्ट हो जाता है, वैसे ही शब्द भी शीघ्र नष्ट हो जाता है, तब शब्द को कर्म क्यों न मान लें ? तो उत्तरः- १०४-गुणस्य सतोऽपवर्गः कर्मभिःसाधर्म्यम् ॥ २५ ॥ (गुणस्य) गुण (सतः) होते हुवे [शब्द] का (अपवर्गः) नाश (कर्मभिः) कर्मों से (साधर्म्यम्) साधर्म्य है ॥ जब कि शब्द द्रव्य नहीं, कर्म नहीं, इन दोनों बातों को पूर्व दो सूत्रों में कह चुके और परिशेष से शब्द का गुण होना सिद्ध है, तब केवल आशु विनाशी होना मात्र शब्द के कर्मत्व को निश्चय नहीं कराता, केवल शीघ्र विनाशीपना शब्द का, कर्मों से आंशिक साधर्म्य मात्र है। किन्तु यह नियम तो नहीं कि जो जो शीघ्रनाशवान् हो, वह २ कर्म ही हो। क्योंकि संख्या, ज्ञान, सुख, दुःख इत्यादि भी तो शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, क्या इतने मात्र साधर्म्य से वे कर्म हो जाते हैं ? जब नहीं, तो शीघ्रविनाशित्व मात्र साधर्म्य से शब्द को भी कर्म नहीं कह सक्ते ॥ और १०५-सतो लिङ्गाऽभावात् ॥ २६ ॥ (सतः) अविनाशी का (लिङ्गाऽभावात्) लिङ्ग न होने से [नित्य नहीं मान सक्ते ] ॥ कोई लिङ्ग नहीं पाया जाता जिस से शब्द को अविनाशी वा नित्य मान सकें ॥ तथा- १०६-नित्यवैधर्म्यात् ॥ २७ ॥ (नि-र्म्यात्) नित्य वैधर्म्य से [शब्द नित्य नहीं ] ॥ नित्य पदार्थ के धर्म हैं कि वह उत्पन्न और नष्ट न हो, परन्तु शब्द उत्पन्न और नष्ट भी होता है, इस लिये शब्द का नित्य पदार्थों से धर्म नहीं मिलता किन्तु वैधर्म्य है, इस वैधर्म्य से शब्द अनित्य है ॥ १०७-अनित्यश्चाऽयं कारणतः ॥ २८ ॥ (अयं) यह शब्द (कारणतः) कारण से (च) भी (अनित्यः) अनित्य है ॥

शब्द अनित्य है, कारण वाला होने से, जैसे घट अनित्य है, कारण वाला होने से ॥ यदि कहो कि शब्द का कारणवान् होना ही कहां सिद्ध है ? तो उत्तर १०८-नच्चाऽसिद्धं विकारात् ॥ २९ ॥ (विकारात्) विकार से (असिद्धं) शब्द का कारणवान् होना असिद्ध (च) भी (न) नहीं ॥ क्योंकि शब्द विकारयुक्त है, कार्य है, अतएव उस का कारणवत्त्व असिद्ध नहीं। यदि कहो कि हम तो शब्द की अभिव्यक्ति मात्र मानते हैं, उत्पत्ति नहीं, तो उत्तर:- १०९-अभिव्यक्तौ दोषात् ॥ ३० ॥ (अभिव्यक्तौ) अभिव्यक्ति में (दोषात्) दोष से ॥ अभिव्यक्ति में दोष है इस लिये अभिव्यक्ति मानना ठीक नहीं । दोष यह है कि शब्द को अभिव्यक्त मानें तो एक अक्षर के अभिव्यञ्जक कारण से समस्त अक्षर अभिव्यक्त (प्रकट) हो जाते, पर ऐसा है नहीं, इस लिये समझना चाहिये कि शब्द अभिव्यक्त नहीं होता, किन्तु उत्पन्न होता है और उत्पत्ति अपने कारण आकाश से होती है॥ क्योंकि हम देखते हैं कि- ११०-संयोगाद्विभागाच्छब्दाच्च शब्दनिष्पत्तिः ॥ ३१ ॥ (संयोगात्) संयोग से (विभागात्) विभाग से (च) और (शब्दात्) शब्द से (शब्दनिष्पत्तिः) शब्द उत्पन्न होता है ॥ प्रथम शब्द संयोग वा विभाग से उत्पन्न होता है, फिर शब्द से भी शब्द उत्पन्न होने लगता है । शब्द दो प्रकार का है, एक वर्णरूप, दूसरा ध्वनिरूप । वर्णरूप अ क च ट त प अथवा वर्ण जुड़ कर घट पट राम कृष्ण आदि शब्दरूप, अथवा मैं जाता हूं, तुम पढ़ते हो, इत्यादि वाक्यरूप, इसी प्रकार अध्यायरूप और ग्रन्थरूप भी । दूसरा ध्वनिरूप, जैसे लकड़ी टूटने, पत्ते हिलने, वा भेरी दुन्दुभि आदि बाजों में से निकलने वाला शब्द है । वर्णरूप शब्द संयोग और शब्द से निकलते हैं और ध्वनिरूप शब्द-संयोग, विभाग और शब्द, तीनों से निकलते हैं । वर्णात्मक शब्द का कारण कण्ठादिस्थान से वायु का संयोग है । वायु से चोट खाये हुए कण्ठादि का आकाश से संयोग होना असमवायी कारण है ॥

द्वितीयाऽध्याय २ आन्हिक ४५

पूर्व अभ्यास किये वर्णों की स्मृति की अपेक्षा से आत्मा और मन के संयोग से पहले वर्णोच्चारण की इच्छा होती है, फिर प्रयत्न. उस प्रयत्न की अपेक्षा करते हुये मन और वायु के संयोग से उदरस्थ वायु में कर्म होता है, उस से ऊपर को चलता हुवा वायु फिर कण्ठादि में चोट करता है, उस चोट से कण्ठादि आकाश से संयोग करते हैं, तब अक्षर (आकाश कारण से) उत्पन्न होते हैं । यह क्रम है ॥ ध्वन्यात्मक शब्द में प्रथम नङ्गारे और दण्डे का संयोग होता है, वह निमित्त कारण है, नङ्गारे और आकाश का संयोग असमवायी कारण है । इसी प्रकार वंश के टूटने पर जो शब्द होता है, उस का निमित्त कारण विभाग है और वंश और आकाश का विभाग असमवायी कारण है । और जब एक स्थान का शब्द दूसरे दूर स्थान में सुनाई देता है, तब शब्द से शब्द उत्पन्न होता जाता है और परस्पर तार सा पुरता चला जाता है । क्योंकि जब हम दूरस्थ शब्द को सुनते हैं तो हमारे कान तो शब्दोत्पत्ति के स्थान तक जाते नहीं । शब्द स्वयं भी हम तक चलकर नहीं आ सकता, क्योंकि शब्द गुण है और क्रियारहित है और बिना प्राप्त हुवे को ग्रहण करना भी हमारे कानों वा किन्हीं अन्य इन्द्रियों का सामर्थ्य नहीं, तब फिर दूरस्थ शब्द क्यों सुनाई पड़ता है ? उत्तर में कहना पड़ेगा कि जहां शब्द हुवा, उस ने अपने समीप दूसरा शब्द उत्पन्न कर दिया, उस ने फिर और शब्द उत्पन्न कर दिया, बस जैसे पानी की एक लहर अपने से आगे लहर को उत्पन्न करती है और वह फिर उस से आगे एक अन्य लहर को उत्पन्न करती है । इसी प्रकार शब्द से शब्द उत्पन्न होता हुवा, दूरस्थ पुरुष के कानों को सुनाई पड़ता है और जिस प्रकार जलाशय में मृत्पिण्ड फेंकने से जो ऊंची लहरी वा तरङ्ग उत्पन्न होती है, वह फिर आगे अधिक फैली हुई कुछ नीची तरङ्ग को उत्पन्न करती है, उस से और भी नीची, और अन्त में कम होते २ तरङ्ग नहीं दीख पड़ती, इसी प्रकार तोपों तक के घोर भारी शब्द भी ज्यों २ दूर पहुंचते जाते हैं, कम होते जाते हैं । इस प्रकार शब्द से शब्दसन्तान में वायु आदि निमित्त कारण और पूर्व पूर्व शब्द असमवायी कारण है । और जितनी २ दूर में शब्द उत्पन्न होता है, उतना २ वहां २ का आकाश उस शब्द का समवायी कारण वा उपादान कारण होता है ॥ यदि कहो कि शब्द की उत्पत्ति संयोगादि कारणों से हो, इतने से शब्द की नित्यता क्या सिद्ध हुई ? तो उत्तर-

५६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १११-लिङ्गाच्चाऽनित्यः शब्दः ॥ ३२ ॥ ( लिङ्गात् ) लिङ्ग से ( च ) भी ( शब्दः ) शब्द (अनित्यः) अनित्य है। उत्पत्तिमान् होना शब्द का लिङ्ग है, उस से भी शब्द की अनित्यता सिद्ध है ॥ आगे पूर्व पक्ष करते हैं:- ११२-द्वयोस्तु प्रवृत्त्योरभावात् ॥ ३३ ॥ ( द्वयोः ) दोनों ( तु ) ही ( प्रवृत्त्योः ) प्रवृत्तियों के ( अभावात् ) अभाव से ॥ यदि शब्द अनित्य होता तो दोनों (गुरु शिष्यों) की प्रवृत्तियें न होतीं। क्योंकि अध्यापक जिस अनित्य शब्द को पढ़ाने में उच्चारण करता, वह तो उच्चारण करते ही नष्ट हो जाता, अतः फिर अध्येता शिष्य उसी शब्द की पुनरावृत्ति न कर सकता, क्यों कि गुरु का बताया तो उसी समय नष्ट हो गया समझना चाहिये, परन्तु हम देखते हैं कि गुरु के उच्चारण किये शब्दों को शिष्य ज्यों का त्यों बोलते हैं, जिस से शब्द अनित्य नहीं, किन्तु नित्य जान पड़ता है ॥ अन्य हेतु से भी शब्द अनित्य नहीं जान पड़ता कि- ११३-प्रथमाशब्दात् ॥ ३४ ॥ ( प्र-शब्दात् ) प्रथमा शब्द से ॥ ऐतरेय ब्राह्मण ३ । ३ में लिखा है कि-"त्रिः प्रथमामन्वाह, त्रिरुत्तमाम्” ऋग्वेद ३ । २१ । १ से ११ तक ऋचायें सामिधेनी संज्ञक हैं, उन में से प्रथमा ( पहली ) ऋचा को तीन बार पढ़ा जाता है और अन्त की ऋचा को भी। यदि शब्द अनित्य होता तो एक ऋचा ३ बार कैसे पढ़ी जाती क्योंकि एक वार पढ़ी हुई अगले क्षण में शब्द की अनित्यता से नष्ट हो जाती, इस से पाया जाता है कि शब्द अनित्य वा उच्चरितप्रध्वंसी नहीं, किन्तु स्थिर वा नित्य है ॥ इसी पक्ष में तीसरा हेतु और भी देते हैं कि:- ११४-सम्प्रतिपत्तिभावाच्च ॥ ३५ ॥ ( संप्र-भावात् ) ठीक २ पहचान रहने से ( च ) भी ॥ यदि शब्द अनित्य होता तो एक के शब्द को सुन कर दूसरा सम्प्रति पत्ति=प्रत्यभिज्ञा=याद=पहचान कर ठीक २ उस का अनुकरण न कर

सकता। करता है, इस से जाना जाता है कि शब्द अनित्य नहीं, नित्य=स्थिर है ॥ आगे उत्तर पक्ष करते हैं और तीनों पूर्वपक्षस्थ हेतु ओं का खण्डन करते हैंः- ११५-संदिग्धाः ॥ ३६ ॥ संदेह वाले हैं ॥ पूर्वपक्ष में दिये हुये तीनों हेतु संदिग्ध हैं, इस लिये उन से शब्द की अनित्यता नहीं सिद्ध होती । देवदत्त ने यज्ञदत्त को गाना वा नाचना सिखाया । जब यज्ञदत्त भी वही नाच नाचता है, जो देवदत्त ने स्वयं नाच कर बताया था । इस में यह निश्चय नहीं होता कि देवदत्त के ही नृत्य को यज्ञदत्त पुनः करता है, किन्तु यह भी तो होसक्ता है कि जिस प्रकार देव- दत्त अपने नृत्य का स्वतन्त्र कर्त्ता है, उसी प्रकार एक उसी प्रकार के दूसरे नृत्य का स्वतन्त्र कर्त्ता यज्ञदत्त हो । एक कुम्भकार ने एक घड़ा बनाया, उसे देख कर दूसरे कुम्भकार ने दूसरा घड़ा बनाया, तब क्या यह कह सक्ते हैं कि घट अनित्य नहीं, क्योंकि घट अनित्य होते तौ एक घट के समान दूसरा घट न बनता । बस जिस प्रकार यह हेतु संदिग्ध वा अनैकान्तिक है वैसे ही शब्द की नित्यता पर दिये हेतु भी संदिग्ध और अनैकान्तिक हैं। गुरु जिस शब्द को बोलता है, शिष्य सुनता है, सुनकर जानता है, जान कर वैसा ही एक दूसरा शब्द बोलता है, इसी प्रकार सामिधेनी ऋचाओं में प्रथमा और अन्तिमा ऋचा का त्रिरुच्चारण क्या शतवार उच्चारण क्यों न हो, सब स्वतन्त्र एक ही प्रकार उच्चरित शब्द एक नहीं होते किन्तु एकाकार अनेक होते हैं, और अनित्य हैं ॥ ११६-संति बहुत्वे संख्याभावः सामान्यतः ॥ ३७ ॥ (बहुत्वे) बहुतायत (सति) होने पर भी (संख्याभावः) संख्या का होना (सामान्यतः) सामान्य से है ॥ यद्यपि शब्द के अनित्य होने से वर्णात्मक शब्द भी बहुत होने चाहियें, न केवल पाणिनीय शिक्षा (त्रिषष्टिः) सूत्रानुसार ६३ ही वर्ण हों । परन्तु सामान्य से संख्या (६३) होगई है अर्थात् ६३ से भिन्न अधिक वर्ण भी कोई बोलता है तौ भी वे सामान्य से अर्थात् इन्ही तरेसठ ६३ के कुछ समान होने से इन्हीं में गिन लिये जाते हैं। जो लोग ६३ न मानकर ३३ व्यञ्जन और

५८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद ९ स्वर गिनते हैं, वे ५२ अक्षरों के सामान्य में ही सब विशेषों का अन्तर्भाव कर लेते हैं। जो और अधिक भेद गिनने लगें तो एक अकार के ही १८ भेद कल्पित करते हैं ॥ इति द्वितीयाऽध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् इति श्री तुलसीरामस्वामि कृते वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

ओ३म् अथ तृतीयोऽध्यायः पृथिवी आदि 9 सात बाह्य द्रव्यों की परीक्षा द्वितीयाऽध्याय में हो चुकी। अब शेष रहे आत्मा और मन; इन में से उद्देशक्रमानुसार प्रथम आत्मा की परीक्षा करेंगे । उस में प्रथम आत्मसिद्धि के लिये हेतु दिखलाने को भूमिका बांधते हैं किः- ११७-प्रसिद्धा इन्द्रियाऽर्थाः ॥ १ ॥ ( इन्द्रियार्थाः ) इन्द्रियों के विषय ( प्रसिद्धाः ) प्रसिद्ध हैं ॥ अर्थात् सभी जानते हैं कि नाक से गन्ध, जिह्वा से रस, आंख से रूप, त्वचा से स्पर्श, और कान से शब्द सुनाई पड़ कर ज्ञान होता है ॥ १ ॥ तब- ११८-इन्द्रियार्थप्रसिद्धिरिन्द्रियार्थेभ्योऽर्थान्तरस्य हेतुः ॥ २ ॥ (इन्द्रि-द्धिः) इन्द्रियों के अर्थों की प्रसिद्धि (हेतुः) साधक है (इन्द्रियार्थेभ्यः) इन्द्रियार्थों से ( अर्थान्तरस्य ) अन्य अर्थ का ॥ इन्द्रियार्थों को तो लोग जानते ही हैं, इसी से यह भी प्रमाणित होता है कि कोई अन्य पदार्थ है जो नाक से सूंघ कर, जिह्वा से चाख कर, आंख से देख कर, त्वचा से छूकर और कान से सुन कर इन विषयों का ग्रहण करता है, वह आत्मा है ॥ यदि कहो कि इन्द्रियार्थों से भिन्न कोई पदार्थ होना तो चाहिये किन्तु वह पदार्थ शरीर ही क्यों न मान लिया जाते ? तद्भिन्न आत्मा के मानने की क्या आवश्यकता है ? तो उत्तरः- ११९-सोऽनपदेशः ॥ ३ ॥ ( सः ) वह हेतु ( अनपदेश ) अहेतु है ॥ शरीर को ज्ञानाश्रय सिद्धकरनेवाला वह हेतु अहेतु वा हेत्वाभास होगा, क्योंकि जो जिस के आश्रित हो वह उस का कार्य हो, यह नियम नहीं है । 9

५० वैशेषिकदर्शन - भाषानुवाद हम देखते हैं कि घट पटादि पदार्थों के जानने में यद्यपि दीपक वा सूर्यादि का प्रकाश भी कारण है तथापि कोई नहीं कह सकता कि सूर्यादि का प्रकाश द्रष्टा है, किन्तु साधन मात्र है। इसी प्रकार रूपादि ज्ञान का आश्रय शरीर होने पर भी ज्ञान का समवायि कारण शरीर नहीं, किन्तु उस से भिन्न आत्मा है ॥ ३ ॥ क्योंकि- १२०-कारणाऽज्ञानात् ॥ ४ ॥ ( कारणाज्ञानात् ) कारण में ज्ञान न होने से ॥ शरीर ज्ञान का आश्रय ( समवायी कारण ) इस लिये नहीं हो सकता कि शरीर के कारण पञ्च तत्त्वों में ही ज्ञान नहीं, जब कारण में ज्ञान नहीं तब कार्य में कहां से हो सकता है ॥ ४ ॥ यदि कहो कि हम तो पञ्च भूतों में ज्ञान मानते हैं, तल्लिङ्ग आत्मा को क्यों मानें ? तो उत्तर- १२१-कार्येषु ज्ञानात् ॥ ५ ॥ (कार्येषु) घट पटादि पञ्चभूतकार्यों में (ज्ञानात्) ज्ञान होना चाहिये था। यदि पञ्चतत्त्व चेतन होते तौ उन का कार्य समस्त घट पट मठ मन्दि सब चेतन ज्ञानी होता, जड़ कोई होता ही नहीं, परन्तु ऐसा नहीं पाया जाता, इस से पञ्च भूतों में ज्ञान मानना ठीक नहीं ॥ ५ ॥ प्रत्युत- १२२-अज्ञानाच्च ॥ ६ ॥ ( अज्ञानात् ) अज्ञान से ( च ) भी ॥ पञ्चतत्त्वों में अज्ञान का प्रमाण यह है कि उन के कार्य घट पटादि में को ज्ञान नहीं पाया जाता, अज्ञान देखा जाता है, इस से भी सिद्ध है कि पञ्चभूतों में ज्ञान है, न उन के कार्य घट पटादि में है, न शरीर में हो सकता है, किन्तु ज्ञान का आश्रय तौ आत्मा है, जो शरीरादि से व्यतिरिक्त है। इस विषय की पुष्टि समान तन्त्र न्यायदर्शन ३ । १ । १-१५ तक सू में किस प्रकार की गई है, सो पाठकों के अ वलोकनार्थ नीचे लिखते हैं:- “ दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात् ॥ न्यायद० ॥१॥ उत्तरपक्ष-दर्शन और स्पर्शन से एक ही अर्थ का ग्रहण होने से (आत्मा देहादि से भिन्न है ) ॥

तृतीयाध्याय १ आन्हिक ५१ जिस विषय को हम आंख से देखते हैं, उसी को त्वचा से स्पर्श भी करते हैं । नींबू को देखकर रसना में पानी भर जाता है । यदि इन्द्रिय ही चेतन होते तो ऐसा कदापि नहीं हो सकता था, क्योंकि "अन्यदृष्टमन्यो न स्मरति" देवदत्त के देखे हुवे अर्थ का यज्ञदत्त को कभी स्मरण नहीं होता । फिर आंख के देखे हुवे विषय का जिह्वा से वा त्वचा से क्योंकर अनुभव किया जाता । जो कि हम बिना किसी सन्देह के एक इन्द्रिय के अर्थ को दूसरे इन्द्रिय से ग्रहण करते हैं, इस से सिद्ध है कि उस अर्थ के ग्रहण करने में इन्द्रिय स्वतन्त्र नहीं हैं, किन्तु इन के अतिरिक्त ग्रहीता कोई और है जो इन के द्वारा एककर्त्तृक अनेक प्रत्ययों को ग्रहण करता है और वही चेतन आत्मा है ॥ अब इस पर शङ्का करते हैं:- न, विषयव्यवस्थानात् ॥ २ ॥ पू०-उक्त कथन ठीक नहीं है, विषयों की व्यवस्थिति होने से ॥ देहादि संघात के अतिरिक्त और कोई आत्मा नहीं है, विषयों की व्यवस्था होने से । इन्द्रियों के विषय नियत हैं, आंख के होने पर रूप का ज्ञान होता है, न होने पर नहीं होता और यह नियम है कि जो जिस के होने पर होता और न होने पर नहीं होता, वह उसी का समझा जाता है । इस लिये रूपज्ञान नेत्र का है क्योंकि वही उस को देखता है। इसी प्रकार अन्य इन्द्रिय भी अपने २ अर्थज्ञान में स्वतन्त्र हैं । जब इन्द्रियों के होने से ही विषयों की उपलब्धि होती है तब उस से भिन्न अन्य किसी चेतन की कल्पना क्यों की जाय ? अब इस का समाधान करते हैं:- तद्व्यवस्थानादेवात्मसद्भावादप्रतिषेधः ॥ ३ ॥ उ०-उक्त विषयव्यवस्थिति से ही आत्मा की सिद्धि होने से निषेध नहीं हो सकता ॥ इन्द्रियों के विषयों की व्यवस्था होने से ही (उन से भिन्न चेतन) आत्मा की सत्ता माननी पड़ती है । यदि इन्द्रियों के विषय नियत न होते: अर्थात् एक इन्द्रिय से दूसरे इन्द्रिय के विषय का भी ग्रहण हो सकता, तब तो उन में स्वतन्त्रता की कल्पना की जासकती थी । परन्तु जिस दशा में कि उन के विषय नियत हैं अर्थात् आंख से रूप का ही ग्रहण होता है, न कि गन्धादि अन्य विषयों का । इस से यह सिद्ध होता है कि सब विषयों का

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद ज्ञाता चेतन आत्मा जो इन्द्रियों से अपने २ विषयों को ही ग्रहण कराता है, उन से भिन्न है ॥ इन्द्रियचैतन्यवादियों के मत का खण्डन करके, अब देहात्मवादियों का खण्डन करते हैं:- शरीरदाहे पातकाभावात् ॥ ४ ॥ उ०-शरीर को जलाने में पाप न होने से (आत्मा शरीर से पृथक् है) ॥ यदि शरीर से भिन्न कोई आत्मा नहीं है तो मृत शरीर को जलाने में पाप होना चाहिये, परन्तु पाप सजीव शरीर को जलाने में होता है, न कि मृत शरीर को ॥ अब इस पर शङ्का करते हैं:- तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात् ॥ ५ ॥ पू०-उस (आत्मा) के नित्य होने से सजीव शरीर के जलाने में भी पाप न होना चाहिये ॥ सजीव शरीर के जलाने में भी पाप का अभाव होना चाहिये, आत्मा के नित्य होने से क्योंकि जो देह से भिन्न आत्मा को मानते हैं, वे उस को नित्य भी मानते हैं। यथा-“न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे”॥ अर्थात् आत्मा न कभी उत्पन्न होता और न मरता है, न कभी उत्पन्न हुआ न होगा, न मरा न मरेगा, वह अज, नित्य, सनातन और पुराण है, शरीर के नाश होने पर उस का नाश नहीं होता। तथा आगे चलकर उसी गीता में कहा है:-“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः” ॥ अर्थात् आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकता, जल गला नहीं सकते और पवन सुखा नहीं सकता है। जब ऐसा है तो फिर आत्मा सहित शरीर के जलाने में भी कुछ पाप नहीं होना चाहिये, क्योंकि नित्य आत्मा की कोई हिंसा नहीं कर सकता । यदि कहो कि हिंसा होती है तो आत्मा का नित्यत्व न रहेगा । इस प्रकार पहिले पक्ष में हिंसा निष्फल होती है और दूसरे पक्ष में उस की उपपत्ति नहीं होती। अब इस का समाधान करते हैं:- न, कार्याश्रयकर्त्तृवधात् ॥ ६ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

तृतीयाऽध्याय १ आह्निक ५३

तृतीयाऽध्याय १ आह्निक ५३ उ०-शरीर और इन्द्रियों के उपघात होने से ( पूर्वपक्ष ) ठीक नहीं ॥ इस सूत्र में गोतम मुनि अपना अन्तिम सिद्धान्त कहते हैं । हम नित्य आत्मा के वध को हिंसा नहीं कहते किन्तु कार्याश्रय शरीर और विषयोप- लब्धि के कारण इन्द्रियों के उपघात ( जिस से आत्मा में विकलता उत्पन्न होती है ) को हिंसा कहते हैं । सुख दुःखरूप कार्य हैं, उन का संवेदन शरीर के द्वारा किया जाता है, इस लिये वह कार्याश्रय कहाता है और इन्द्रियों से विषयों का ग्रहण किया जाता है, इस लिये उन में कर्तृत्व का व्यपदेश किया है तो बस शरीर और इन्द्रियों के प्रबन्ध का जो उच्छेद करना है, इसी का नाम हिंसा है, इस लिये हमारे मत में उक्त दोष नहीं आता ॥ अब आत्मा के देहादि संघात से भिन्न होने में दूसरा हेतु देते हैं:- सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात् ॥ ७ ॥ उ०-बाईं आंख से देखी हुई वस्तु का दाहिनी आंख से प्रत्यभिज्ञान होने से ( आत्मा देहादि से पृथक् है ) ॥ पूर्वापर ज्ञान के मेल को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं । जैसे-यह वही यज्ञदत्त है जिस को मैंने वाराणसी में देखा था । बाईं आंख से देखी हुई वस्तु की जो दाहिनी आंख से प्रत्यभिज्ञा होती है इस से सिद्ध होता है कि उस प्रत्यभिज्ञा का कर्त्ता इन्द्रियों से भिन्न कोई और ही पदार्थ है । यदि इन्द्रिय ही चेतन होते तो बाईं आंख से देखी हुई वस्तु को दाईं आंख कभी नहीं पहचान सकती थी, क्योंकि देवदत्त के देखे हुये को यज्ञदत्त नहीं जान सकता ॥ इस पर आक्षेप करते हैं:- नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते द्वित्वाभिमानात् ॥ ८ ॥ पू०-नाक की हड्डी का आवरण होने से एक में दो का अभिमान होने से ( यह कथन ) युक्त नहीं है ॥ वास्तव में चक्षु इन्द्रिय एक ही है, नाक की हड्डी के बीच में आजाने से लोगों को दो की भ्रान्ति हो रही है । जैसे किसी तड़ाग में पुल बान्ध देने से दो तड़ाग नहीं हो जाते, ऐसे ही एक मस्तक में नाक का व्यवधान होने से आंख दो वस्तु नहीं हो सकतीं । अतएव प्रत्यभिज्ञा कैसी ? अब इस आक्षेप का समाधान करते हैं:- एकविनाशे द्वितीयाऽविनाशान्नैकत्वम् ॥ ९ ॥

५४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद उ०-एक के नाश होने पर दूसरी का नाश न होने से एकता नहीं हो सकती॥ यदि चक्षु इन्द्रिय एक ही होता तो एक आंख के नष्ट होने पर दूसरी भी नहीं रहती, परन्तु यह प्रत्यक्ष सिद्ध है कि एक आंख के फूट जाने पर दूसरी शेष रहती है और उस से आंख का काम लिया जाता है। इस लिये चक्षु एक नहीं॥ पुनः पूर्वपक्षी इस पर आक्षेप करता है:- अवयवनाशेऽप्यवयव्युपलब्धेरहेतुः ॥ १० ॥ पू०-अवयव का नाश होने पर भी अवयवी की उपलब्धि होने से ( उक्त हेतु ) अहेतु है ॥ उक्त हेतु ठीक नहीं है क्योंकि अवयव के नाश होने पर भी अवयवी की उपलब्धि देखने में आती है। जैसे-वृक्ष की किन्हीं शाखाओं के कट जाने पर भी वृक्ष की उपलब्धि होती है, ऐसे ही अवयव रूप एक चक्षु के विनाश होने पर भी दूसरे चक्षु में अवयवी की उपलब्धि शेष रहती है। इस लिये चक्षुद्वैत मानना ठीक नहीं ॥ अब सिद्धान्त सूत्र के द्वारा समाधान करते हैं:- दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः ॥ ११ ॥ उ०—दृष्टान्त के विरोध से निषेध नहीं हो सकता ॥ दृष्टान्त के विरोध से चक्षुर्द्वैत का निषेध नहीं हो सकता, क्यों कि जैसे शाखायें वृक्ष रूप अवयवी का अवयव हैं, तद्वत् एक चक्षु दूसरे चक्षु का अव- यव नहीं अर्थात वे दोनों ही अवयव हैं। अवयवी उन का कोई और है। अतः दृष्टान्त में विरोध आने से निषेध युक्त नहीं। अथवा दृश्यमान अर्थ के विरोध को दृष्टान्तविरोध कहते हैं। मृत मनुष्य के कपाल में नासास्थि का व्यवधान होने पर भी दो छिद्र भिन्न २ रूप से स्पष्ट दीख पड़ते हैं। यों तो हृदय का व्यवधान होने से दोनों हाथों को भी कोई एक कह सकता है, परन्तु यह दृश्यमान अर्थ का साक्षाद्विरोध है इस लिये चक्षुरैक्य ठीक नहीं और जब चक्षु दो सिद्ध हो गये, तब एक के देखे हुवे अर्थ की दूसरे को प्रत्य- भिज्ञा होना यह सिद्ध करता है कि उस प्रतिभिज्ञा का कर्त्ता इन्द्रियों से भिन्न कोई और ही पदार्थ है और वही चेतन आत्मा है ॥ फिर उसी की पुष्टि करते हैं:- इन्द्रियान्तरविकारात् ॥ १२ ॥

तृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ५५ उ०-(किसी इन्द्रिय से उस के विषय को ग्रहण करने पर) अन्य इन्द्रिय में विकार उत्पन्न होने से (आत्मा देहादि से पृथक् है) ॥ किसी अम्ल द्रव्य को चक्षु से देखने अथवा घ्राण से उस का गन्ध ग्रहण करने पर रसना में विकार उत्पन्न होता है, अर्थात् मुंह में पानी भर आता है। यदि इन्द्रियों को ही चेतन माना जावै तो यह बात हो नहीं सकती कि अन्य के देखे को कोई और स्मरण करे। इस लिये इन्द्रियों से पृथक् कोई आत्मा है ॥ अब इस पर शङ्का करते हैं:— न, स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात् ॥ १३ ॥ पू०—स्मृति के स्मर्त्तव्यविषयिणी होने से (पृथक् आत्मा के मानने की कोई आवश्यकता) नहीं ॥ स्मरणयोग्य विषयों का अनुभव करना स्मृति का धर्म है, वह स्मृति स्मर्त्तव्य विषयों के योग से उत्पन्न होती है, उसी से इन्द्रियान्तरविकार उत्पन्न होते हैं। जिस मनुष्य ने एक बार निंबू के रस को चाखा है, दूसरी वार उस को स्मरण करने से उस के मुंह में पानी भर आता है, सो यह स्मृति का धर्म है, न कि आत्मा का ॥ अब इस का समाधान करते हैं:— तदात्मगुणसद्भावादप्रतिषेधः ॥ १४ ॥ उ०—उस के आत्मगुण होने से (आत्मा का) निषेध नहीं हो सकता ॥ स्मृति कोई द्रव्य नहीं है, किन्तु वह आत्मा का एक गुण है, इस लिये उक्त आक्षेप युक्त नहीं है। जब स्मृति आत्मा का गुण है तभी तौ अन्य के देखे का अन्य को स्मरण नहीं होता। यदि इन्द्रियों को चेतन मानोगे तो अनेक कर्त्ता होने से विषयों का प्रतिसन्धान न होसकेगा, जिस से विषयों की कोई व्यवस्था न रहेगी अर्थात् कोई देखेगा और कोई स्मरण करेगा और यह हो नहीं सकता। यह व्यवस्था तौ तभी ठीक रह सकती है जब कि अनेक अर्थों का एक द्रष्टा भिन्न २ निमित्तों के योग से पूर्वानुभूत विषयों का स्मरण करता हुवा इन्द्रियान्तरविकारों को उत्पन्न करता है, ऐसा माना जायगा। क्योंकि अनेक विषयों के द्रष्टा को ही दर्शन के प्रतिसन्धान से स्मृति का होना सिद्ध हो सकता है, अन्यथा विना आधार के स्मृति किस में रहे ? इस के अति- रिक्त "मैं स्मरण करता हूं" यह प्रत्यय (जो बिना किसी भेद के प्रत्येक मनुष्य को होता है) भी स्मृति का आत्मगुण होना सिद्ध करता है ॥

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५६ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद पुनः उसी की पुष्टि करते हैं:— अपरिसंख्यानाच्च स्मृतिविषयस्य ॥ १५ ॥ उ०-स्मृतिविषय का परिगणन न करने से भी (यह शङ्का उत्पन्न हुई है) ॥ स्मृतिविषय के विस्तार और सत्व पर ध्यान न देकर प्रतिवादी ने यह आक्षेप किया है कि "स्मर्त्तव्य विषयों को स्मरण करना स्मृति का काम है" वास्तव में स्मृति का विषय बड़ा लम्बा और गहरा है । " मैंने इस अर्थ को जाना, मुझ से यह अर्थ जाना गया, इस विषय में मुझ से जाना गया, इस विषय का मुझ को ज्ञान हुआ, यह जो चार प्रकार का परोक्षज्ञान है, यही स्मृति का मूल है, इसमें सर्वत्र ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों की उपलब्धि होती है । अब प्रत्यक्ष अर्थ में जो स्मृति होती है, उस से तीन प्रकार के ज्ञान एक ही अर्थ में उत्पन्न होते हैं । उदाहरण—" जिस को मैंने पहले देखा था, उसी को अब देख रहा हूं" इस में दर्शन, ज्ञान और प्रत्यय ये तीनों संयुक्त हैं । तो यह एक अर्थ तीन प्रकार के ज्ञानों से युक्त हुवा न तौ अकर्त्तृक है और न नानाकर्त्तृक किन्तु एककर्त्तृक है, क्योंकि एक ही सब विषयों का ज्ञाता अपने सम्पूर्ण ज्ञानों का प्रतिसन्धान करता है । "इस अर्थ को जानूंगा, इस को जानता हूं, इसे जाना और अमुक अर्थ की जिज्ञासा करते हुवे बहुत काल तक न जानकर फिर मैंने जाना" इत्यादि ज्ञानों का निश्चय करता है । यदि इस को केवल संस्कारों का फैलाव मात्र ही माना जाय तो हो नहीं सकता, क्योंकि प्रथम तो संस्कार उत्पन्न होकर विलीन हो जाते हैं, इस के अतिरिक्त कोई संस्कार ऐसा नहीं है जो तीनों काल के ज्ञान और स्मृति का अनुभव कर सके । बिना अनुभव के "मैं और मेरा" यह ज्ञान और स्मृति का प्रतिसन्धान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । इस से अनुमान किया जाता है कि एक सब विषयों का ज्ञाता प्रत्येक देह में अपने ज्ञान और स्मृति के प्रबन्ध को फैलाता है, देहान्तर में उस की प्राप्ति न होने से उस के ज्ञान और स्मृति का प्रतिसन्धान हो नहीं सकता" ॥ ५ ॥ यदि कहो कि शरीर को ज्ञानाश्रय होना सिद्ध न हो, न सही, परन्तु आत्मा को ज्ञानाश्रय होना भी तौ सिद्ध नहीं हो सकता । क्योंकि आत्मा और ज्ञान में तादात्म्य सम्बन्ध नहीं ? तो उत्तर- १२३-अन्यदेव हेतुरित्यनपदेशः ॥ ७ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

तृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ५१ (हेतुः) हेतु (अन्यत्) साध्य से भिन्न (एव) ही होता है (इति) इस से (अनपदेशः) यह हेतु नहीं ॥ यद्यपि सौगतादि मत के लोग मानते हैं कि जिस का जिस से तादात्म्य सम्बन्ध हो, वा जिस की जिस से उत्पत्ति हो वही उस का हेतु होता है, परन्तु हम (वैशेषिकाचार्य) इतनी बात तो मानते हैं कि जिस की जिस से उत्पत्ति हो वह उस का साधक हेतु होता है, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि हेतु और साध्य में तादात्म्य सम्बन्ध भी हो ही हो । बहुत स्थलों में तादात्म्य सम्बन्ध है, पर हेतुता नहीं, तथा तादात्म्य संबन्ध नहीं और हेतुता है। जो आगे १३ वें सूत्र तक स्पष्ट होगी ॥ ७ ॥ यदि कहो कि साध्य से अन्य ही हेतु हुआ करता है जैसे अग्नि से अन्य धूम अग्नि का हेतु है तो हम कहते हैं कि यदि अन्य ही हेतु हुआ करता हो तो धूम को अग्नि का ही हेतु क्यों मानें, गधे का हेतु भी क्यों न जान लें, क्योंकि गधे से भी धूम "अन्य" तो है ? तो उत्तर- १२४-अर्थान्तरं ह्यर्थान्तरस्याऽनपदेशः ॥ ८ ॥ (अर्थान्तरम्) अन्य अर्थ (अर्थान्तरस्य) अन्य अर्थ का (हि) भी (अनपदेशः) हेतु नहीं हुआ करता ॥ अर्थात् यह भी नियम नहीं कि एक अर्थ दूसरे अर्थ का हेतु हो ही हो, होता भी है, नहीं भी होता ॥ ८ ॥ १२५-संयोगि समवाय्येकार्थसमवायि विरोधि च ॥९॥ (संयोगि) संयोग वाला, (समवायि) नित्यसम्बन्ध वाला, (एकार्थ समवायि) एकार्थसमवायी (च) और (विरोधि) विरोध रखने वाला [लिङ्ग होता है] ॥९॥ आगे उदाहरण सूत्रकार स्वयं देते हैं। एकार्थसमवायी का उदाहरणः- १२६-कार्यं कार्यान्तरस्य ॥ १० ॥ (कार्यम्) एक कार्य (कार्यान्तरस्य) अन्य कार्य का [लिङ्ग होता है] ॥ एक कार्य 'रूप' है जो अन्य कार्य 'स्पर्श' का एकार्थसमवायी लिङ्ग है ॥ अर्थात् जिस अर्थ (वस्तु) में 'रूप' गुण समवायसम्बन्ध से वर्त्तमान है, ८

५८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद उसी में दूसरा कार्य गुण 'स्पर्श' भी वर्त्तमान देखा जाता है। इसी प्रकार 'रस' का लिङ्ग 'गन्ध' भी होता है ॥ १० ॥ विरोधी लिङ्ग, जैसे:- १२७-विरोध्यभूतं भूतस्य ॥ ११ ॥ (अभूतम्) अवर्त्तमान [वर्षा] (भूतस्य) वर्त्तमान वर्षा का (विरोधी) विरोधी [लिङ्ग है] ॥ वर्षा का अभाव, हुई वर्षा का विरोधी लिङ्ग है ॥ ११ ॥ इसी प्रकार:- १२८-भूतमभूतस्य ॥ १२ ॥ (भूतम्) जो है, वह (अभूतस्य) न हुवे का [विरोधी लिङ्ग है] ॥ वर्त्तमान वर्षा, न वर्त्तमान वर्षा का लिङ्ग है ॥ १२ ॥ तथा- १२९-भूतं भूतस्य ॥ १३ ॥ (भूतम्) जो है वह (भूतस्य) हुवे का [विरोधी लिङ्ग है] ॥ वर्त्तमान मण्डलाता हुआ सर्प, वर्त्तमान झाड़ के नीचे स्थित नकुल का लिङ्ग है। यह भी विरोधी लिङ्ग है ॥ शेष संयोगी लिङ्ग का उदाहरण, जैसे-विलक्षण गति वाले रथों को देखकर तत्संयुक्त चतुर सारथियों का अनुमान करना। विद्वान् विद्यार्थियों को देखकर अनुभवी अध्यापकों को पहचानना इत्यादि । समवायी लिङ्ग, जैसे-स्पर्श से वायु का, रूप से तेज का, गन्ध से पृथिवी का पहचानना लिङ्ग है इत्यादि ॥ १९ ॥ इस प्रकार सब प्रकार के लिङ्गों को जान कर लिङ्गी जीवात्मा का दे- हेन्द्रियसङ्घात से पृथक् होना सिद्ध है। यही बात सांख्यदर्शन अध्याय १ सूत्र २ और ३ में भी नीचे लिखे अनुसार वर्णित है। यथा- देहादिव्यतिरिक्तोऽसौ वैचित्र्यात् ॥ २ ॥ वह (आत्मा) विचित्र होने से, देहादि से भिन्न (वस्तु) है ॥ देह, इन्द्रियां, मन इत्यादिसंघात जड़ है, आत्मा इस से विचित्र चेतन है, इस लिये देहादि का ही नामान्तर आत्मा नहीं है, किन्तु इस से भिन्न आत्मा विचित्र है ॥ २ ॥ षष्ठीव्यपदेशादपि ॥ ३ ॥ षष्ठी (विभक्ति) के व्यपदेश से भी (आत्मा देहादि से भिन्न सिद्ध है)।

संस्कृत की षष्ठी विभक्ति का अर्थ "का, के, की" होता है। उदाहरण- देवदत्त का शिर, यज्ञदत्त के हाथ, विष्णुमित्र की जङ्घा इत्यादि । इस से पाया जाता है कि देवदत्त और शिर एक ही होते तो 'देवदत्त का शिर' यह षष्ठी ( का ) प्रयोग में न आती । आती है, इस से पाया जाता है कि शिर, हाथ, जङ्घा आदि से देवदत्त यज्ञदत्तादि संज्ञा वाले आत्मा भिन्न हैं । जैसे 'देवदत्त का घोड़ा' कहने से देवदत्त और घोड़ा एक नहीं हो सकते, इसी प्रकार देवदत्त का शिर, हाथ, पांव कहने से देवदत्त ही शिर हाथ पांव नहीं हो सकते । इस से पाया जाता है कि आत्मा ही देहादि संज्ञक नहीं है ॥ १३०-प्रसिद्धिपूर्वकत्वादपदेशस्य ॥ १४ ॥ ( अपदेशस्य ) लिङ्ग के ( प्रसिद्धिपूर्वकत्वात् ) प्रसिद्धिपूर्वक होने से ॥ सूत्र ९ में कह आये हैं कि इन्द्रियार्थों की प्रसिद्धि, इन्द्रियार्थों से भिन्नार्थ का हेतु है । क्योंकि लिङ्ग प्रसिद्धिपूर्वक हुआ करता है, इस कारण प्रसिद्धि से जिस की जिस के साथ व्याप्ति ज्ञात हो, उस को उस का लिङ्ग समझना चाहिये । जैसे अग्नि की धूम के साथ व्याप्ति है, इस लिये धूम अग्नि का लिङ्ग है ॥ " व्याप्ति " क्या पदार्थ है, इस के विषय में लगभग एक दूसरे से मिलते जुलते कई प्रकार के मत हैं । कोई तो कहते हैं कि-किसी वस्तु का स्वा- भाविक और अव्यभिचारी ( अटल ) सम्बन्ध जो साध्य और साधन में है, वह व्याप्ति कहाता है । इसी को कोई अविनाभाव सम्बन्ध कहते हैं, इस का भी वही तात्पर्य है कि एक का दूसरे के बिना न होना, अर्थात् व्यभिचारराहित्य से नित्य सम्बन्ध । कोई इसी व्याप्ति को साहचर्य नियम कहते हैं। नवीन लोग इसी व्याप्ति पदार्थ को बड़े जटिल शब्दों में कहते हैं कि- साध्यवत्प्रतियोगिकभेदाधिकरणनिरूपितवृत्तित्वाऽभाव= व्याप्ति है, अथवा:- हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताभावा- ऽप्रतियोगिसाध्यसमानाधिकरणता=

६० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

व्याप्ति है। उस व्याप्तिज्ञान को या तो व्यभिचाररहित बहुधा साहचर्य से वा एक बार साहचर्य से, जिस का जिस के साथ ग्रहण हो उस को उस का अनुमान कराने वाला लिङ्ग समझना चाहिये ॥ जैसा कि रसोई घर आदि बहुत स्थानों में साधन धर्म धूमादि को अग्नि आदि से साहचर्य देखते हैं, इस से यह निश्चित ज्ञान होता है कि जहां २ धुवा है, वहां २ अग्नि का अनुमान करना चाहिये । यह तो निश्चित साध्यवाला सपक्ष है । और जहां पर्वतादि में साध्य धर्म विषयक यह संदेह हो कि यहां अग्नि आदि है वा नहीं? यह संदिग्ध साध्यवान् पक्ष है ॥ अनुमान करने के साधन ( करण ) को " अनुमान " कहते हैं । क्रिया करने के असाधारण क्रियायुक्त साधन को " करण "कहते हैं। जो कारण से उत्पन्न होकर किसी कार्य को उत्पन्न करती है, वह " क्रिया " कहाती है, इसी को " व्यापार " भी कहते हैं । जैसा कि छेदन एक क्रिया वा व्यापार है, उस क्रिया का क्रियायुक्त असाधारण साधन कुठार है, उस कुठार को 'करण' कहेंगे । और छिन्न होने वाले काष्ठ से छेदन उत्पन्न होकर छेदनानन्तर हुवे द्वैधीभाव का उत्पादक होने से छेदन ( काष्ठ पर कुठार के आघात ) का नाम " क्रिया " हुआ ॥ भाव यह है कि जो छेदन क्रिया में साधन रूप कुठार करण है, उस लिङ्ग का ज्ञान, बिना व्याप्ति ज्ञान के हो नहीं सकता । व्याप्ति ज्ञान प्रसिद्धि से होता है, प्रसिद्धि बहुतायत से अनुभव द्वारा होती है । जब बहुत बार कुठार से आघात करके काष्ठ का छेदन अनुभव में आता है तब तब काष्ठ और कुठार के संयोग से छेदन क्रिया में अनुमान होने लगता है ॥ जैसे अग्नि का धुंवे से अविनाभाव सम्बन्ध = व्याप्ति है । इसी प्रकार रस से भी अविनाभाव सम्बन्ध है । पृथिवी जल तेज इन तीनों में रूप सदा रहता है, और पृथिवी तथा जल में रस सदा रहता है । अर्थात् जहां पृथिवी है वहां गन्ध है, जहां तेज है वहां रूप है, जहां जल है वहां रस है, तथा जहां पृथिवी जल तेज हैं वहां रूप है, यह व्याप्ति पाई जाती है। इस प्रकार गन्ध पृथिवीत्व का व्यापक है, पृथिवीत्व गन्ध का भी व्यापक है तथा पृथिवीत्व गन्ध का व्याप्य है और गन्ध पृथिवीत्व का भी व्याप्य है अर्थात् दोनों में परस्पर व्याप्य व्यापक सम्बन्ध है । इसी को समानव्याप्ति

तृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ६१ वा समव्याप्ति कहते हैं । जो वर्त्ताव सब देशों और सब कालों में पाया जावे, वह ' व्याप्यवृत्ति' कहाता है, तथा जो एक देश या एक काल में वर्त्तता है उस को 'अव्याप्यवृत्ति' कहते हैं ॥ जो देश विशेष के कारण से हो उस को ' देशकृताऽव्याप्यवृत्ति ' और जो काल विशेष के कारण से हो उस को ' कालकृताऽव्याप्यवृत्ति ' कहते हैं । अधिक बात यह है कि अव्याप्यवृत्ति पदार्थ की भी अधिकरणता व्याप्य- वृत्ति होती है, अव्याप्यवृत्ति नहीं हुआ करती । जैसे-दण्डी पुरुषः = दण्ड- वाला पुरुष । इस में यद्यपि पुरुष के एक देश ( हाथ) में दण्ड का संयोग है, तथापि समग्र पुरुष को दण्ड की अधिकरणता ( आश्रय ) कही जाती है, न कि पुरुष के एक देश ( हाथ वा अङ्गुलियों ) को । इस कारण देशकृत ऽव्याप्यवृत्ति हुई ॥ अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्याप्ति इस प्रकार भी व्याप्ति के दो भेद हैं । साध्य साधन की व्याप्ति अन्वयव्याप्ति और साध्याऽभाव और साधनाऽभाव की व्याप्ति व्यतिरेकव्याप्ति कहाती है । जैसे-जहां धुंवां है वहां अग्नि है। यह अन्वयव्याप्ति हुई, तथा जहां अग्नि नहीं वहां धुंवां नहीं। यह व्यतिरेकव्याप्ति हुई । नवीन नैयायिक गदाधरादि लोग अन्वयव्याप्ति का लक्षण इस प्रकार करते हैं कि-हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताऽभावाऽप्रतियोगिसाध्यसामानाधि- करण्यं व्याप्तिः। हेतु के समानाधिकरणस्थ अत्यन्ताऽभाव को 'हेतुसमानाधिकर- णाऽत्यन्ताऽभाव' कहते हैं। जिस का अभाव हो उस को प्रतियोगी और जिस का अभाव न हो (भाव हो) उस को अप्रतियोगी कहते हैं । साध्य के साथ समान (एक) अधिकरण में रहना = साध्यसामानाधिकरण्य कहाता है। अब नवीनों के लक्षण का अर्थ यह हुवा कि “हेतु के साथ समानाधिकरणस्थ अत्यन्ताऽभाव के अप्रतियोगी साध्य के साथ हेतु की समानाधिकरणता = अन्वयव्याप्ति है”। अर्थात् जो साध्य के हेतु के अधिकरणस्थ अत्यन्ताऽभाव का प्रतियोगी नहीं, उस के साथ हेतु की एकाधिकरणता वा समानाधिकरणता होना = हेतु में साध्य की व्याप्ति = अन्वयव्याप्ति कहाती है । जैसे-पर्वत अग्नि वाला है, धूम से, जैसा-रसोई घर । इस अनुमान में पर्वत तो पक्ष है, अग्नि वाला होना साध्य है, धूम हेतु है और रसोईघर दृष्टान्त है । हेतु के अधि- करण पर्वत वा रसोई घर आदि में अग्नि = साध्य के वर्त्तमान होने से अग्नि