वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ५१ (हेतुः) हेतु (अन्यत्) साध्य से भिन्न (एव) ही होता है (इति) इस से (अनपदेशः) यह हेतु नहीं ॥ यद्यपि सौगतादि मत के लोग मानते हैं कि जिस का जिस से तादात्म्य सम्बन्ध हो, वा जिस की जिस से उत्पत्ति हो वही उस का हेतु होता है, परन्तु हम (वैशेषिकाचार्य) इतनी बात तो मानते हैं कि जिस की जिस से उत्पत्ति हो वह उस का साधक हेतु होता है, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि हेतु और साध्य में तादात्म्य सम्बन्ध भी हो ही हो । बहुत स्थलों में तादात्म्य सम्बन्ध है, पर हेतुता नहीं, तथा तादात्म्य संबन्ध नहीं और हेतुता है। जो आगे १३ वें सूत्र तक स्पष्ट होगी ॥ ७ ॥ यदि कहो कि साध्य से अन्य ही हेतु हुआ करता है जैसे अग्नि से अन्य धूम अग्नि का हेतु है तो हम कहते हैं कि यदि अन्य ही हेतु हुआ करता हो तो धूम को अग्नि का ही हेतु क्यों मानें, गधे का हेतु भी क्यों न जान लें, क्योंकि गधे से भी धूम "अन्य" तो है ? तो उत्तर- १२४-अर्थान्तरं ह्यर्थान्तरस्याऽनपदेशः ॥ ८ ॥ (अर्थान्तरम्) अन्य अर्थ (अर्थान्तरस्य) अन्य अर्थ का (हि) भी (अनपदेशः) हेतु नहीं हुआ करता ॥ अर्थात् यह भी नियम नहीं कि एक अर्थ दूसरे अर्थ का हेतु हो ही हो, होता भी है, नहीं भी होता ॥ ८ ॥ १२५-संयोगि समवाय्येकार्थसमवायि विरोधि च ॥९॥ (संयोगि) संयोग वाला, (समवायि) नित्यसम्बन्ध वाला, (एकार्थ समवायि) एकार्थसमवायी (च) और (विरोधि) विरोध रखने वाला [लिङ्ग होता है] ॥९॥ आगे उदाहरण सूत्रकार स्वयं देते हैं। एकार्थसमवायी का उदाहरणः- १२६-कार्यं कार्यान्तरस्य ॥ १० ॥ (कार्यम्) एक कार्य (कार्यान्तरस्य) अन्य कार्य का [लिङ्ग होता है] ॥ एक कार्य 'रूप' है जो अन्य कार्य 'स्पर्श' का एकार्थसमवायी लिङ्ग है ॥ अर्थात् जिस अर्थ (वस्तु) में 'रूप' गुण समवायसम्बन्ध से वर्त्तमान है, ८