भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 160 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 60

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५६ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद पुनः उसी की पुष्टि करते हैं:— अपरिसंख्यानाच्च स्मृतिविषयस्य ॥ १५ ॥ उ०-स्मृतिविषय का परिगणन न करने से भी (यह शङ्का उत्पन्न हुई है) ॥ स्मृतिविषय के विस्तार और सत्व पर ध्यान न देकर प्रतिवादी ने यह आक्षेप किया है कि "स्मर्त्तव्य विषयों को स्मरण करना स्मृति का काम है" वास्तव में स्मृति का विषय बड़ा लम्बा और गहरा है । " मैंने इस अर्थ को जाना, मुझ से यह अर्थ जाना गया, इस विषय में मुझ से जाना गया, इस विषय का मुझ को ज्ञान हुआ, यह जो चार प्रकार का परोक्षज्ञान है, यही स्मृति का मूल है, इसमें सर्वत्र ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों की उपलब्धि होती है । अब प्रत्यक्ष अर्थ में जो स्मृति होती है, उस से तीन प्रकार के ज्ञान एक ही अर्थ में उत्पन्न होते हैं । उदाहरण—" जिस को मैंने पहले देखा था, उसी को अब देख रहा हूं" इस में दर्शन, ज्ञान और प्रत्यय ये तीनों संयुक्त हैं । तो यह एक अर्थ तीन प्रकार के ज्ञानों से युक्त हुवा न तौ अकर्त्तृक है और न नानाकर्त्तृक किन्तु एककर्त्तृक है, क्योंकि एक ही सब विषयों का ज्ञाता अपने सम्पूर्ण ज्ञानों का प्रतिसन्धान करता है । "इस अर्थ को जानूंगा, इस को जानता हूं, इसे जाना और अमुक अर्थ की जिज्ञासा करते हुवे बहुत काल तक न जानकर फिर मैंने जाना" इत्यादि ज्ञानों का निश्चय करता है । यदि इस को केवल संस्कारों का फैलाव मात्र ही माना जाय तो हो नहीं सकता, क्योंकि प्रथम तो संस्कार उत्पन्न होकर विलीन हो जाते हैं, इस के अतिरिक्त कोई संस्कार ऐसा नहीं है जो तीनों काल के ज्ञान और स्मृति का अनुभव कर सके । बिना अनुभव के "मैं और मेरा" यह ज्ञान और स्मृति का प्रतिसन्धान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । इस से अनुमान किया जाता है कि एक सब विषयों का ज्ञाता प्रत्येक देह में अपने ज्ञान और स्मृति के प्रबन्ध को फैलाता है, देहान्तर में उस की प्राप्ति न होने से उस के ज्ञान और स्मृति का प्रतिसन्धान हो नहीं सकता" ॥ ५ ॥ यदि कहो कि शरीर को ज्ञानाश्रय होना सिद्ध न हो, न सही, परन्तु आत्मा को ज्ञानाश्रय होना भी तौ सिद्ध नहीं हो सकता । क्योंकि आत्मा और ज्ञान में तादात्म्य सम्बन्ध नहीं ? तो उत्तर- १२३-अन्यदेव हेतुरित्यनपदेशः ॥ ७ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.